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सपने के सामने PDF Print E-mail
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Friday, 15 August 2014 09:44

सुमेर चंद

जनसत्ता 15 अगस्त, 2014 : अपने स्कूल के दिनों में मैंने भी सीना तान कर और सिर उठा कर गाया था- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।’ चार लड्डू भी मिले थे। गुरुजी और गांव के एक स्वतंत्रता सेनानी ने बताया था- ‘हम आजाद हो गए हैं, अब हमारा राज होगा, हमारा कानून होगा!’ सब इसलिए भी खुश थे कि झंडा लहराने के बाद स्कूल की छुट्टी हो गई थी। इसके बाद हर वर्ष पंद्रह अगस्त को यही औपचारिकता निभाई जाने लगी। हमारे बहुत सारे साथी गुजर चुके हैं और अब हम भी तैयारी में हैं। अंगरेजों के खिलाफ झंडा उठा कर हमने जीत के गीत जरूर गाए, मगर हमारा तिरंगा तो अपने देश का भी विजयी नहीं बन सका। गंगा उलटी बहने लगी है। जो कुछ हमारा था, वह भी हम दिनोंदिन खोते जा रहे हैं। आश्चर्य यह है कि फिर भी हम खुश हैं।

सदियों पहले अफगानिस्तान से डेढ़ हजार घुड़सवार चले, भारत को पहले लूटा और फिर अगले छह सौ सालों तक यहां राज किया। उनकी पकड़ देश पर ढीली पड़ी तो सात समंदर दूर से केवल व्यापार के इरादे से आए अंगरेजों ने हम पर जम कर डंडा चलाया। यानी लगातार आठ सौ सालों तक हम पर विदेशियों ने राज किया, मनमानी की। हो सकता है, ऊपर के पांच-दस फीसद लोग राज करने वालों के रंग-ढंग से चले हों। मगर आम भारतीय मन और विश्वास से पूरी तरह भारतीय ही रहा। यहां पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का अकाल नहीं पड़ा। हमारी संस्कृति अक्षुण्ण रही। आपसी भाईचारा, मेल-मिलाप यहां की जीवनशैली का केंद्रीय बिंदु रहा। यहां की बोली और रीति-रिवाज हमारे साथ रहे।

कहते हैं पराधीन सपने में भी सुखी नहीं। मगर पता नहीं क्यों, यहां के उस साधारण मानव को यह कहावत छू भी नहीं सकी, जो मन और अंतरात्मा से पाक-साफ रहा। यहां झूठ बोलना पाप माना जाता रहा, सामान्य लोग लोभ से दूर रहे। यहां मानवीय रिश्तों को धन के नापतोल से नहीं मापा गया। मुसलमान आए, फिर अंगरेज आए, मगर इस देश में हमारी असल शक्ति आपसी भाईचारे की रही। आपसी मेल-मिलाप हमारे सुख-दुख का सही और एकमात्र हकदार था।

अब तिरंगा फहराते और लालकिले से उसे सलामी देते सड़सठ वर्ष हो गए हैं। मगर इन वर्षों ने हमारा कई सदियों का मानव खजाना खाली कर दिया। कौन जानता था दूर नगर में कचहरी को? कहां थी चप्पे-चप्पे पर पुलिस? कहां थे हर चौराहे पर शराब के ठेके? कहां था भाई पर भाई का अविश्वास? कितनी घटनाएं होती थीं दो साल की छोटी बच्चियों तक से बलात्कार की? कहावत यह भी थी कि किसी का


दिया हुआ खाने से पेट थोड़े ही भरता है, पेट तो अपने नाखूनों की कमाई से भरता है। मगर आजादी के बाद के सालों में यह सब उलटा हो गया है। जिन घरों में रोजाना आने-जाने वाले लोग भोजन और रात को आसरा पाते थे, आज उन घरों की महिलाएं-पुरुष वृद्धावस्था पेंशन के लिए हाथ फैलाए कई-कई घंटे लाइन में खड़े रहते हैं। जो लोग रिश्वत लेना और देना गलत मानते थे, वे अपने बच्चों की नौकरी लगवाने की खातिर रिश्वत देने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। दूसरी ओर, जिनके बच्चे नौकरी में लगे हैं, वे कहते नहीं थकते कि वेतन तो बस पांच हजार रुपए ही है, लेकिन बीस हजार रुपए घर में आ जाते हैं। टैक्स बचाने और चोरी करने के गुर बताने वाले बाकायदा दफ्तर खोले बैठे हैं। जो करों की चोरी नहीं करता, रिश्वत नहीं लेता या झूठ नहीं बोलता, उसे बेवकूफ समझा जाता है।

अब इस उम्र में आकर अक्सर सोचता हूं कि क्या क्रांतिकारियों ने फांसी का फंदा ऐसी ही आजादी के लिए चूमा था? क्या देश के लाखों लोगों ने अंगरेजों की गोलियों का सामना इसी देशप्रेम के लिए किया था? क्या करोड़ों लोगों ने तिरंगा झंडा उठा कर ‘भारत मां की जय’ इसी उपलब्धि के लिए बोली थी? क्या सुभाषचंद्र बोस और उनके मतवाले सैनिक पहाड़ियों में कई-कई दिनों तक भूखे पेट इसी आजादी के लिए लड़ते रहे थे? हर पांच साल बाद राज बदलने की औपचारिकता निभाई जाती है। लेकिन क्या किसी राजनीतिक दल ने भारत की उस शान को फिर से वापस लाने की बात कही? क्या किसी दल ने फिर से मानवीय मूल्यों के प्रसार के लिए कुछ खास किया? तो फिर हम किस बात पर खुश हों! क्या यह हमारे उन क्रांतिकारियों की भावनाओं के साथ धोखा नहीं है, जिन्होंने एक वास्तविक आजादी के सपने के साथ खुद को देश पर होम कर दिया?


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