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बेनतीजा बहस PDF Print E-mail
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Friday, 15 August 2014 09:40

altजनसत्ता 15 अगस्त, 2014 : बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं पर संसद में हुई बहस का नतीजा आखिरकार वही निकला, जिसके कयास लगाए जा रहे थे। पिछले हफ्ते कांग्रेस नेताओं ने यह मुद्दा उठाया तो भाजपा ने इसे हल्के-फुल्के तरीके से टालने की कोशिश की, उसी से जाहिर हो गया था कि वह इस विषय को बहुत गंभीरता से नहीं लेने वाली। तब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा अध्यक्ष के आसन के करीब पहुंच कर तल्ख हो उठे थे, जिससे भाजपा नेताओं को पलट वार करने का आसान रास्ता मिल गया था। पर संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू ने यह कहते हुए कांग्रेस की मांग को हवा में उड़ा दिया था कि देश में सब तरफ शांति है, कहीं से भी किसी दंगे की खबर नहीं आई है। जब भाजपा ने इस मुद्दे की तरफ से पहले ही आंखें मूंद रखी हों तो उस पर बहस का नतीजा स्वाभाविक रूप से यही निकलना था। दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई और बेनतीजा बैठ गई। जबकि हकीकत यह है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद छह सौ से ऊपर सांप्रदायिक घटनाएं हो चुकी हैं। अनेक स्थानों पर सांप्रदायिक तनाव का माहौल है। ये घटनाएं खासकर उन्हीं इलाकों में हुर्इं या हो रही हैं, जहां  उपचुनाव होने हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से अंगुली उठ रही है कि भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मकसद से ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कर रही है। उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक घटनाओं के विश्लेषण से जाहिर हो चुका है कि हिंदू बहुल इलाकों में मुसलमानों को परेशान करने की नीयत से तनावपूर्ण माहौल बनाने की कोशिश की गई। फिर मुसलमानों को दलितों से भिड़ा कर वोटों का आधार खिसकाने की कोशिश भी इसमें नजर आती है। इसलिए यह कयास अनायास नहीं है कि उत्तर प्रदेश में बने जातीय व्यूह को धार्मिक उन्माद के जरिए ध्वस्त करने की रणनीति अपनाई जा रही है। अगर भाजपा इन आरोपों से मुक्त होने को लेकर संजीदा होती तो वह इस बहस को इस तरह बेनतीजा न जाने देती। 

यह ठीक है कि कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों का मामला है और पिछले कुछ


समय से सांप्रदायिक घटनाएं बढ़ रही हैं तो उसमें उनकी भी जिम्मेदारी है। मगर केंद्र सरकार इस तर्क पर सांप्रदायिकता रोकने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। भाजपा ऐसी घटनाओं को लेकर सदा से निशाने पर रहती आई है, अगर केंद्र की कमान अपने हाथ में होने के बाद वह इस मसले पर जानबूझ कर आंख चुराने या फिर झुठलाने की कोशिश करेगी तो यह उसकी कट््टरता को ही प्रमाणित करेगा। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों में भाजपा नेताओं की संलिप्तता जाहिर है। फिर उपचुनाव वाले इलाकों में लाउडस्पीकर बजाने जैसे मुद्दों को लेकर उसके कार्यकर्ताओं का भड़काऊ मोबाइल संदेशों के जरिए हिंदुत्व को भड़काने का प्रयास भी प्रकट है। कहां भाजपा की केंद्रीय कमान को अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं से संयमित और लोकतांत्रिक व्यवहार का पाठ पढ़ाना चाहिए, संसद में उठी बहस पर पानी डाल कर उसने एक तरह से प्रश्रय ही दिया। यह अकारण नहीं है कि इस बहस में सबसे अधिक योगी आदित्यनाथ मुखर नजर आए, सरकार का कोई जिम्मेदार मंत्री नहीं। सांप्रदायिकता के मसले पर योगी आदित्यनाथ के विचार बहुत पहले से उजागर हैं। उन्हें आगे करने का क्या अर्थ हो सकता है। संसद में हुई बहस से यही जाहिर हुआ कि भाजपा अपनी पुरानी छवि को सुधारने के बजाय और पक्का बनाने के पक्ष में है। मगर इस तरह क्या वह लोकतांत्रिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने में कोई उल्लेखनीय भूमिका निभा पाएगी!


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