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त्याग का सच और सच का खुलासा PDF Print E-mail
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Thursday, 14 August 2014 11:24

सुधांशु रंजन

 जनसत्ता 14 अगस्त, 2014 : अधिकतर आत्मकथाएं या संस्मरण आत्मश्लाघा होते हैं जिनमें दुश्मनों से बदले भी लिए जाते हैं।

रूसो या महात्मा गांधी अपवाद हैं जिन्होंने अपनी कमजोरियों को सार्वजनिक करने का अद्भुत साहस दिखाया। फिर भी आत्मकथाओं और संस्मरणों में कुछ ऐतिहासिक तथ्य तो दर्ज हो ही जाते हैं जिनसे सच्चाई सामने आती है और आगे की पीढ़ी को अतीत में झांकने का अवसर मिलता है। इधर कई पुस्तकें आई हैं जिनमें यूपीए सरकार और सोनिया गांधी के बारे में कई खुलासे किए गए हैं। इनमें दो पुस्तकें प्रमुख हैं- संजय बारू की ‘द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ और कुंवर नटवर सिंह की ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’। कुछ और पुस्तकें प्रकाश्य हैं जिनमें एक मनमोहन सिंह की बेटी ने लिखी है और सोनिया गांधी ने घोषणा की है कि वे भी आत्मकथा लिखेंगी। अगर वे ऐसा करती हैं तो यह स्वागतयोग्य होगा, क्योंकि पिछले लगभग पचास वर्षों की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की वे गवाह और कई वर्षों से संचालिका हैं। उन्होंने देश की राजनीति को प्रभावित किया है।

संजय बारू और नटवर सिंह ने जो खुलासे किए हैं उनमें कुछ भी नया नहीं है। लेकिन अगर एक गुप्त बात जो सर्वविदित है, उसे कोई ऐसा व्यक्ति सार्वजनिक करता है जो उस व्यवस्था का एक अंग रहा है तो वह प्रामाणिक हो जाती है। बारू और नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के त्याग के बारे में यही किया है। 2004 में जब उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर प्रधानमंत्री बनने से मना किया था तब भी लोगों ने इसे त्याग का आभासक ही माना था, त्याग नहीं। 

आज कोई राजनीतिक दल या नेता आलोचना बर्दाश्त नहीं करता। चापलूसों से घिरे राजनेताओं की आंखों से सत्य ओझल हो जाता है और फिर उनकी वही दुर्दशा होती है जो कांग्रेस, द्रमुक, समाजवादी पाटी, राष्ट्रीय जनता दल या जद (एकी) की हुई। करारी हार के बाद भी कांग्रेस में एक परिवार की वंदना करने की होड़ है और सोनिया की आलोचना के विरुद्ध कांग्रेस नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया आई है। महान व्यक्ति वह होता है जो आत्मालोचना करे। आज तो कोई आलोचना सुनने को तैयार नहीं है। 

जब 1957 का आम चुनाव हो रहा था तो उस समय संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। 28 दिसंबर 1954 से 7 दिसंबर 1960 तक वे लगातार मुख्यमंत्री रहे। वे पहले सोशलिस्ट पार्टी में थे। इसलिए आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि से उनके आत्मीय संबंध थे। 1957 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी का घोषणापत्र आचार्य नरेंद्र देव स्वयं बना रहे थे। उन्होंने यह जिम्मेदारी संपूर्णानंद को दी। घोषणापत्र बनाने का सीधा मतलब था कि उन्हें अपनी ही सरकार की आलोचना करनी पड़ती। पर उन्होंने लिखा और नरेंद्र देव को दे दिया। नरेंद्र देव ने उनसे कहा कि वे पढेंÞगे नहीं; उसे वे (संपूर्णानंद) छपवा कर लाएं। फिर संपूर्णानंद ने वह छपवा कर उन्हें सौंपा। वह घोषणापत्र उनकी अपनी सरकार की सबसे कटु और वस्तुपरक आलोचना थी। विडंबना यह है कि आज हर आलोचना को विद्वेष से की गई कह कर खारिज करने का रिवाज बन चुका है।

कुंवर नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ में सोनिया गांधी के त्याग के ‘ढकोसले’ का पर्दाफाश किया है कि ऐसा उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर नहीं, बल्कि राहुल गांधी के दबाव पर किया जिन्हें मां की हत्या किए जाने की आशंका थी। मगर सोनिया ने त्याग का एक आभामंडल अपने चारों ओर तैयार किया क्योंकि भारतीय मानस को सफलता से अधिक त्याग प्रभावित करता है। यह कोई त्याग नहीं था क्योंकि शासन की डोर उन्होंने अपने हाथ में रखी। 

नटवर ने वही दोहराया है जो बारू ने लिखा है कि संवेदनशील फाइलें सोनिया गांधी के पास ले जाई जाती थीं। यह प्रधानमंत्री/ मंत्री द्वारा ली गई गोपनीयता की शपथ का उल्लंघन है। मनमोहन सिंह ने इसका जोरदार खंडन किया है। नटवर सिंह ने डीडी न्यूज पर इस लेखक के साथ एक साक्षात्कार में कहा, ‘तो मनमोहन सिंह और कह क्या सकते हैं?’ 

यह हकीकत है कि सोनिया ने कभी सत्ता का परित्याग नहीं किया। अगर यह उनका त्याग था तो 1999 में संसद में वाजपेयी सरकार गिरने के बाद वे सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करतीं कि उन्हें दो सौ बहत्तर सांसदों का समर्थन प्राप्त है। चूंकि मुलायम सिंह यादव ने समर्थन देने से दो टूक इनकार कर दिया, इसलिए वे सरकार नहीं बना पार्इं। 2004 में भी उन्होंने शुरू में पद लेने से इनकार नहीं किया था। जब उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन करवाया और उसके अध्यक्ष के रूप में कैबिनेट मंत्री का ओहदा प्राप्त किया। 

परिषद को ‘सुपर कैबिनेट’ के रूप में जाना जाता था। यह सर्वविदित है कि मनमोहन सिंह सरकार के मंत्री उनके प्रति वफादारी का इजहार करते थे, प्रधानमंत्री के प्रति नहीं। त्याग करने वाले इस तरह की तिकड़मों का सहारा नहीं लेते। मणिशंकर अय्यर ने स्वीकार किया है कि राहुल का दबाव भी एक कारण था। राहुल या सोनिया ने इसका प्रतिवाद नहीं किया है।

महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों ने सच्चे अर्थ में सत्ता का परित्याग किया और कभी रिमोट से उसे नियंत्रित नहीं किया। गांधीजी ने स्वाधीनता संग्राम का सफल नेतृत्व किया, मगर सत्ता प्राप्त होने पर अपने को उससे अलग कर लिया। यह विश्व इतिहास का अनुपम उदाहरण है कि आंदोलन का सबसे बड़ा नेता उसकी सफल समाप्ति पर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में


नहीं लेता। लोकनायक जयप्रकाश नारायण महात्मा के पदचिह्नों पर चले। दादा धर्माधिकारी को मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बनाने की पेशकश की गई जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। 

कृष्णदास जाजू चरखा संघ के प्रमुख थे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें वित्तमंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने को कहा। जाजू ने मना करते हुए कहा कि इस काम के लिए बहुत व्यक्ति मिल जाएंगे, लेकिन चरखे के काम के लिए कोई नहीं मिलेगा। पर नेहरू ने कभी कोई पद लेने से इनकार नहीं किया- चाहे पार्टी में या सरकार में। जब साहित्य अकादेमी की स्थापना हुई तो 1953 में वे उसके पहले अध्यक्ष बनाए गए और इस पद पर भी जीवनपर्यंत बने रहे। अब सोनिया पंद्रह वर्षों से कांग्रेस अध्यक्ष हैं। उनके पहले किसी अध्यक्ष को इतना लंबा कार्यकाल नहीं मिला और इसे छोड़ने की फिलहाल उनकी कोई मंशा नहीं दिखती। 

बहरहाल, नटवर सिंह की पुस्तक को लेकर सवाल उठे हैं कि निजी बातचीत को सार्वजनिक करना कितना नैतिक है। यह साफ है कि उन्होंने प्रतिशोध की भावना से पुस्तक लिखी है। पुस्तक से एक छोटा अंश उद्धृत करना समीचीन होगा: ‘वोल्कर रिपोर्ट में मेरा नाम आने के समय सोनिया का व्यवहार बुरा तथा विषैला था, और इससे मुझे तकलीफ हुई।... जिस दिन से उन्होंने भारतीय भूमि पर पांव रखे हैं उनके साथ राजवंशी व्यवहार किया गया।... बीते वर्षों में वह एक संकोची, घबराई हुई, शर्मीली महिला से महत्त्वाकांक्षी, अधिनायकवादी और सख्त नेता बन गई हैं। उनकी नाखुशी कांग्रेसजनों के मन में भय पैदा करती है।’

यह सच है कि महान व्यक्ति निजी या विशेष सूचना का इस्तेमाल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करते हैं। जेपी ने पत्नी प्रभावती के नाम कमला नेहरू के पत्रों को इंदिरा गांधी को वापस कर दिया था, जबकि इंदिरा गांधी से उनके मतभेद सार्वजनिक हो चुके थे। पंद्रह अप्रैल 1973 को प्रभावती की मौत के बाद प्रभा स्मृति का प्रकाशन होने वाला था जिसके लिए उन पत्रों की बहुत जरूरत थी। 

ये पत्र बहुत व्यक्तिगत थे जिनसे दोनों के आत्मीय संबंध की झलक मिलती थी। कोई भी पत्र चार पृष्ठ से कम का नहीं था। उनके प्रकाशन से नेहरू परिवार की छवि प्रभावित हो सकती थी। इसलिए जेपी को ऐसा करना उचित नहीं लगा और वे पत्र उन्होंने इंदिरा गांधी को वापस सौंप दिए। भावुक होकर इंदिरा ने कहा, ‘आप अकेले ऐसा कर सकते थे।’ जो हो, सच को सामने लाना गलत नहीं है, पर बदले की भावना से प्रभावित होकर लिखने से आत्मगत तत्त्व हावी हो जाते हैं।

अभी सच बोलने की अचानक होड़ लग गई है। संजय बारू से लेकर न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और फिर नटवर सिंह, सब के सब सत्य परोस रहे हैं जबकि यूपीए की सत्ता से विदाई हो चुकी है। तकनीकी रूप से बारू की पुस्तक पूर्ववर्ती सरकार के समय में ही आ चुकी थी, पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी और यह स्पष्ट हो चुका था कि वह सरकार वापस नहीं आ रही है। 

इन खुलासों के समय के बारे में सवाल उठ रहे हैं। हालांकि काटजू का विलंब से हुआ हृदय परिवर्तन अवसरवाद का उदाहरण है, बारू और नटवर सिंह को संशय का लाभ मिल सकता है। काटजू से जब भी कोई पत्रकार उनके खुलासे के समय को लेकर सवाल करता था तो वे भड़क उठते थे और कहते थे कि समय से अधिक महत्त्वपूर्ण है तथ्य। बाद में उन्होंने एक लचर सफाई दी कि वे न्यायिक अनुशासन से बंधे थे। यह तर्क स्वीकार्य नहीं है क्योंकि मंत्री की तरह न्यायाधीश गोपनीयता की शपथ नहीं लेता; जज को केवल पद की शपद लेनी होती है। इसलिए किसी न्यायाधीश के लिए सच उजागर करना न्यायिक अनुशासन का किसी प्रकार उल्लंघन नहीं है। अगर वे सही समय पर खुलासा कर देते तो उस ‘भ्रष्ट’ अतिरिक्त जज की सेवा स्थायी नहीं की जाती। मगर तब काटजू की प्राथमिकता अपनी प्रोन्नति रही होगी और वे कॉलेजियम को नाराज नहीं कर सकते थे। 

अवकाशग्रहण के तीन वर्ष बाद तक भी वे खामोश रहे क्योंकि सरकार ने उन्हें भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनाया। यह भी एक तथ्य है कि इस पद के लिए उच्चतम न्यायालय के एक अन्य पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सिरपुरकर का नाम लगभग तय हो चुका था, लेकिन अंतिम क्षणों में नाम बदला गया। अगर यूपीए सरकार वापस आ जाती तो क्या काटजू यह खुलासा करते? विलियम ब्लेक ने लिखा है, ‘ए ट्रुथ टोल्ड विद बैड इंटेट, बीट्स आॅल द लायज दैट यू वैन इंवेंट।’ अर्थात बुरी नीयत से बोला गया सत्य उन सभी झूठों से बुरा है जो आप सोच सकते हैं। सत्य अवश्य बोला जाना चाहिए लेकिन अच्छी नीयत से।


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