मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
विज्ञापन का जादू PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Thursday, 14 August 2014 11:20

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

जनसत्ता 14 अगस्त, 2014 : विज्ञापनों की अपनी दुनिया है। वह दुनिया सृजनात्मक, कल्पनाशील, संदेशवाहक और रचनात्मक है। विज्ञापनों में वे सभी गुण होते हैं जो किसी भी साहित्यिक विधा में पाए जाते हैं। इसमें थोड़े में अधिक कह देने की क्षमता है। वे उतने ही धारदार हैं, जितने कि कार्टून। मुझे विज्ञापनों में शब्दों से अधिक जोर से और असरदार तरीके से अपनी बात कह देने की ताकत नजर आती है। मूक विज्ञापन बोले गए शब्दों से अधिक मुखर होते हैं।

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि देखी गई बात का सुनी गई बात से ज्यादा असर होता है। तभी तो श्रव्य-दृश्य का अपना महत्त्व है। विज्ञापन आपको दिखाते हैं और सुनाते भी हैं। यही कारण है कि उनका असर बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी पर होता है। कुछ लोग तो उन्हीं की भाषा बोलते दिखाई देते हैं। इस बारे में ‘आइडिया’ का जवाब नहीं। एक उदाहरण ‘बुद्धू बनाविंग’ का जुमला है, जिसमें विद्यार्थी से लेकर कार चालक और पुलिस वाले की बातचीत है। संदेश यही है कि ‘आइडिया’ का नेटवर्क अधिक चौकन्ना और जागरूक है। एक और विज्ञापन याद आता है, किसी टूथपेस्ट का था। एक व्यक्ति सुबह बिना पेस्ट किए बगीचे में जाता है और उसके मुंह से आती बदबू से घबरा कर दो खिले हुए फूल कुम्हला जाते हैं। संदेश कितना प्रभावशाली है, यह आप भी मानेंगे। इसी तरह, दीवार खराब कर रहे बच्चे और उसे डांटते हुए पिता के शब्द- ‘सुनते नहीं हो’, और जवाब में बच्चे का कहना कि ‘शुक्ला अंकल ने फिक्साइट की पुट्टी लगवाने का कहा था’ और उसका कमरे के चारों ओर पपड़ी दिखाते हुए उसी अंदाज में बोलना- ‘सुनते नहीं हो’ भी लाजवाब है।

आप पाएंगे कि विज्ञापनों में रचनाधर्मिता, संप्रेषण की तीव्रता तो है ही, लोकप्रियता है और पैसा भी। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी और अभिनेता उनमें नजर आते हैं। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, सैफ अली खान, बोमन ईरानी, ऐश्वर्या राय, रितिक रोशन जैसे तमाम कलाकार विज्ञापनों में आने के लिए करोड़ों रुपए तक लेते होंगे। वे जानते हैं कि वे समाज सेवा या धर्मार्थ नहीं, बल्कि धंधा कर रहे हैं। महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली, गेल और रॉस टेलर, सचिन तेंदुलकर या युवराज सिंह जैसे खिलाड़ी भी पैसों के लिए ही विज्ञापनों में आते हैं। यहां तक कि बीमारी और बुढ़ापे से टूट कर बेहद कमजोर और दयनीय दिखने वाले राजेश खन्ना भी पैसे के लिए ही पंखे का विज्ञापन करते नजर आए थे। अधिकतर विज्ञापन गहने, साबुन, मोबाइल, बैंकों के मसले, टूथपेस्ट, शैम्पू, क्रीम और पाउडर जैसे सौंदर्य


प्रसाधनों के होते हैं। कंपनियां भी जानती हैं कि लोग इन्हें देखना चाहते हैं और इनकी बात सुन कर वे इनके द्वारा सुझाई गई चीजों की ओर आकर्षित होंगे। पता नहीं, छोटे-छोटे स्लोगन लिखने वालों को भी पर्याप्त धन मिल पाता है या नहीं। इतना जरूर है कि विज्ञापनों की दुनिया से टेलीविजन धारावाहिक और फिल्मों में आने वालों के उदाहरण हैं और सिनेमा से विज्ञापनों में आने वाले भी कम नहीं हैं।

अमेरिका, इंग्लैंड और चीन में भी विज्ञापनों का काफी असर देखा गया है। विज्ञापनों को अधिक से अधिक आकर्षक, लुभावना और असरदार बनाने के लिए सभी संभव प्रयास किए जाते हैं। कोशिश की जाती है कि दृश्य और शब्द दोनों ऐसे हों जो तीर की तरह दर्शकों-श्रोताओं पर असर करें और उनके दिल और दिमाग में गहराई तक उतर जाएं। कम से कम में अधिक से अधिक असर छोड़ने की यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है।

दरअसल, कम में बहुत कुछ कह देने की कला में ही विज्ञापनों का राज छिपा है। विज्ञापन बनाने और तैयार करने के लिए पेशेवर कंपनियां होती हैं। वे हर काम के लिए विशेषज्ञों की सेवाएं लेती हैं, जिनमें मनोवैज्ञानिक भी होते हैं। इतनी तैयारी से बनाया गया विज्ञापन अपने लक्षित वर्गों और लोगों पर काफी असर डालता है। किस विज्ञापन में किसे लेना है, यह भी काफी सोच-विचार के बाद तय किया जाता है। संवाद का शब्द चयन भी सटीक और ऐसा मारक होता है कि लोग रोज अपनी जिंदगी में दोहराते हैं। आम आदमी की जुबान पर चढ़ जाए, वही तो जुमला है और यह काम विज्ञापन बखूबी कर रहे हैं। हालांकि कुछ विज्ञापन कमजोर भी होते हैं और उनका असर नहीं हो पाता। कमजोर विज्ञापनों का जीवन भी छोटा ही होता है। विज्ञापन असरदार भले ही हों, लेकिन सिर्फ उनके प्रवाह में बहने के बजाय, अपने विवेक का इस्तेमाल करने में ज्यादा समझदारी है।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta  



आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?