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बीच बहस में PDF Print E-mail
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Wednesday, 13 August 2014 01:06

जनसत्ता 13 अगस्त, 2014 : उच्च न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस ने तल्ख मोड़ ले लिया है। सोमवार को सरकार ने न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के मकसद से लोकसभा में विधेयक पेश किया। इसी दिन सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने जजों के चयन की अब तक चली आ रही व्यवस्था यानी कॉलिजियम प्रणाली की खुल कर तरफदारी की। उन्होंने यह तक कहा कि न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए एक भ्रामक अभियान चलाया जा रहा है जिससे लोकतंत्र में जनता का भरोसा डगमगा जाएगा। अगर कई जजों के बारे में भ्रष्टाचार की उड़ी-उड़ाई बातों से दुखी होकर न्यायमूर्ति लोढ़ा ने ऐसी टिप्पणी की है, तो उनकी नाराजगी की जायज वजह है। लेकिन क्या कॉलिजियम प्रणाली को लेकर सारी बहस को गलत मंशा से प्रेरित करार देना सही होगा? पिछले दिनों विधिमंत्री रविशंकर प्रसाद की पहल पर बुलाई गई बैठक में कई पूर्व प्रधान न्यायाधीशों समेत अनेक न्यायविदों ने कहा कि कॉलिजियम पद्धति प्रासंगिक नहीं रह गई है, इसका विकल्प ढूंढ़ा जाना चाहिए। अलबत्ता तमाम न्यायविदों ने यह चेताना भी जरूरी समझा कि वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे सरकार की दखलंदाजी का रास्ता खुल जाए।

विधेयक को इसी कसौटी पर देखना होगा। अगर वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए चयन की प्रक्रिया को अधिक संतुलित बनाएगा तो ठीक है, वरना उसके लिए कॉलिजियम की बलि क्यों दी जाए? वर्ष 1993 से पहले तक उच्च न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को था, यानी व्यवहार में कार्यपालिका के पास। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के चलते यह अधिकार प्रधान न्यायाधीश वाली वरिष्ठतम जजों की समिति यानी कॉलिजियम के पास आ गया। एक लिहाज से यह ठीक हुआ, क्योंकि इसने कार्यपालिका के बजाय न्यायपालिका को निर्णायक भूमिका दे दी। सरकार को यह विकल्प जरूर दिया गया कि वह चाहे तो कॉलिजियम की तरफ से सुझाए गए किसी नाम को खारिज कर सकती है। मगर कॉलिजियम दोबारा सिफारिश करे तो सरकार को उसे स्वीकार करना होगा। ऐसे कुछ उदाहरण


दिए जा सकते हैं जब कॉलिजियम सरकार के दबाव में आ गया, या उसकी किसी सिफारिश को सरकार ने मंजूर नहीं किया। लेकिन इस आधार पर कॉलिजियम की स्वायत्तता को एक मिथक भर बताना सही नहीं है। इस पद्धति की खूबी ही यही है कि इसमें सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका रहती है। विधेयक लाने से पहले सरकार ने जिन न्यायविदों से चर्चा की, उन सबकी भी यही राय थी कि प्रस्तावित नियुक्ति आयोग में न्यायपालिका के सदस्यों की प्रमुखभागीदारी होनी चाहिए। 

छह सदस्यीय आयोग में प्रधान न्यायाधीश समेत सर्वोच्च न्यायालय के तीन जज शामिल होंगे। उनके अलावा दो और न्यायविद आयोग के सदस्य होंगे, जिनका चयन प्रधानमंत्री, नेता-प्रतिपक्ष और प्रधान न्यायाधीश की समिति करेगी। मौजूदा लोकसभा में किसी को नेता-प्रतिपक्ष की मान्यता नहीं मिली है, यह भूमिका कौन निभाएगा? विधेयक के मुताबिक किसी भी नियुक्ति के लिए पांच सदस्यों की सहमति से संस्तुति की जाएगी। अगर प्रधान न्यायाधीश को छोड़ कर बाकी सदस्य सहमत हों, क्या तब भी नियुक्ति के लिए हरी झंडी दे दी जाएगी? फिर प्रधान न्यायाधीश की राय को सर्वाधिक महत्त्व देने की परिपाटी का क्या होगा। न्यायमूर्ति लोढ़ा ने कॉलिजियम का जमकर बचाव किया है तो उसके पीछे ऐसे कई सवाल हो सकते हैं। शायद विधेयक कानून मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति के पास भेज दिया जाए। समिति को सभी पहलुओं पर गौर करना होगा।


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