मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
आसियान की राह PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Tuesday, 12 August 2014 11:29

जनसत्ता 12 अगस्त, 2014 : हालांकि भारत ने लुक ईस्ट यानी पूरब की ओर देखो की नीति काफी पहले घोषित कर दी थी, मगर उसकी विदेश नीति इस दिशा में कुछ देर से सक्रिय हुई। पर उसके बाद से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के दस सदस्यीय समूह के साथ भारत के संवाद और व्यापारिक साझेदारी का सिलसिला लगातार बढ़ता गया है। म्यांमा की राजधानी ने पी तॉ में हुए आसियान के विदेशमंत्री स्तर के ताजा शिखर सम्मेलन और पूर्वी एशिया शिखर बैठक में भारत की मौजूदगी पहले के ऐसे अवसरों की तुलना में कहीं अधिक असरदार रही। आसियान से सांस्कृतिक तार जोड़ने की कोशिश करते हुए सुषमा स्वराज ने बताया कि नालंदा में नए बन रहे विश्वविद्यालय में अगले महीने से इतिहास अनुसंधान और पर्यावरणीय अध्ययन के पाठ्यक्रम शुरू हो जाएंगे। सम्मेलन में यों आतंकवाद, साइबर अपराध और परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने से लेकर समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण और आपसी व्यापार तक अनेक मुद्दों पर चर्चा हुई, मगर दक्षिण चीन सागर का ही विवाद छाया रहा। दक्षिण चीन सागर के मामले में चीन के रुख को लेकर पहले से ही आसियान के सदस्य देशों में नाराजगी रही है, अमेरिका के प्रस्ताव से भी कोई सहमत नहीं दिखा। 

दोनों शिखर बैठकों को संबोधित करते हुए विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भारत की लुक ईस्ट नीति का जिक्र करते हुए आसियान के साथ व्यापार और विकास-कार्यों में सहयोग बढ़ाने के अपनी सरकार के संकल्प का इजहार किया। उन्होंने एलान किया कि भारत इस बारे में पांच साल की अपनी एक योजना का खाका जल्द पेश करेगा, जिस पर 2016 से अमल करने का उसका इरादा है। आतंकवाद को एक नजरिए से देखने और उससे साझा लड़ाई की जरूरत रेखांकित करते हुए उन्होंने अफगानिस्तान को मदद करने की अपील की। मगर इन सारे मुद््दों पर दक्षिण चीन सागर का विवाद हावी रहा। यों पहले भी आसियान के सम्मेलनों में यह मसला उठ चुका है, लेकिन इस बार कहीं ज्यादा तल्खी दिखी। इसका अंदाजा पहले से था। दक्षिण चीन सागर के कई द्वीपों के पास भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी-विदेश विएतनाम से हुए करार के


आधार पर तेल की खोज में लगी हुई है। चीन इस पर एतराज जताता रहा है। इन द्वीपों पर विएतनाम का दावा है, जबकि चीन इन्हें अपना बताता है। इस समुद्री क्षेत्र में चीन का ऐसा झगड़ा कई दूसरे देशों से भी है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि चीन इस मामले में अलग-थलग नजर आया। अपनी इसी स्थिति को भांप कर चीन के विदेशमंत्री ने कहा कि उनका देश इस विवाद को द्विपक्षीय आधार पर हल करने का इच्छुक है। 

दरअसल, चीन जानता है कि आसियान के सामूहिक रुख का सामना करने के बजाय विएतनाम और फिलीपींस से अलग-अलग निपटना आसान होगा। अमेरिका के विदेशमंत्री जॉन केरी की राय थी कि विवाद को देखते हुए दक्षिण चीन सागर में आर्थिक गतिविधियां मुल्तवी कर दी जाएं। लेकिन वहां तेल खोजने के इच्छुक देशों को यह कैसे मंजूर होता? इसलिए केरी के प्रस्ताव पर पानी फिरना ही था। सुषमा स्वराज ने मुक्त नौवहन की वकालत करते हुए कहा कि समुद्री सीमा का विवाद अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों के मुताबिक हल किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री सीमा से संबंधित 1982 में हुई संधि इसका पुख्ता आधार हो सकती है। दक्षिण चीन सागर के विशेष संदर्भ में 2002 में एक आचार संहिता भी बनी थी, उसे भी क्रियान्वित किया जाए। चीन ने इन बातों पर कोई रजामंदी नहीं दिखाई, न सहमति की संभावना के संकेत दिए हैं। ऐसे में दक्षिण चीन सागर मामले में आगे भी खटास बनी रह सकती है। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta  


आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?