मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
इबोला का कहर PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Monday, 11 August 2014 11:31

जनसत्ता 11 अगस्त, 2014 : पिछले कुछ सालों से दुनिया के किसी न किसी हिस्से में किसी खतरनाक बीमारी का संक्रमण फैल जाता है और उसके सामने विकसित देशों का चिकित्सा तंत्र भी लाचार नजर आता है। स्वाइन फ्लू के खौफ से कई देशों के लोग दो-चार हो चुके हैं। अब तक उस बीमारी का कोई सटीक और सहज उपलब्ध इलाज सामने नहीं आ सका है। अब पश्चिमी अफ्रीका के कुछ देशों खासकर गिनी के दूरदराज वाले इलाके जेरेकोर से शुरू हुए इबोला वायरस के संक्रमण ने दुनिया भर में लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यह चिकित्सा सेवा के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इबोला के वायरस से उपजे खतरे के मद्देनजर बीते शुक्रवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी बताते हुए वैश्विक स्वास्थ्य-आपातकाल की घोषणा कर दी। गौरतलब है कि इस बीमारी की चपेट में आए सत्रह सौ से ज्यादा लोगों में से अब तक लगभग एक हजार की मौत हो चुकी है। इसका सबसे ज्यादा प्रकोप पश्चिमी अफ्रीका में सामने आया है, जिससे गिनी, सिएरा लियोन, लाइबेरिया और कुछ हद तक नाइजीरिया में रहने वाले लोगों के सामने गंभीर खतरा है। लेकिन इस बीमारी की प्रकृति को देखते हुए दुनिया में इसके कहीं भी फैलने और कहर बरपाने के अंदेशे से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि भारत में अभी इस बीमारी का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन इसके मद्देनजर एहतियाती कदम उठाए गए हैं। किसी दूसरे देश से शुरू होकर स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी ने अपने यहां भी कैसा आतंक मचा दिया था, लोग भूले नहीं हैं। 

बंदर, चमगादड़ और सूअर के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलने वाले इबोला वायरस की जद में अगर कोई इंसान आ जाता है तो यह दूसरे लोगों में फैलने की भी वजह बन जाता है। अभी तक चूंकि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है, इसलिए


बुखार आने से शुरू होकर यह बीमारी सिर और मांसपेशियों में दर्द के अलावा यकृत और गुर्दे तक को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लेती है और फिर भीतरी और बाहरी रक्तस्राव के बाद मरीज के बचने की गुंजाइश बेहद कम हो जाती है। हालत यह है कि इससे संक्रमित व्यक्ति की मौत के बाद अगर उसके शरीर को ठीक तरह से नष्ट नहीं किया गया तब भी उस वायरस के फैलने की आशंका बनी रहती है। इस तरह के खतरनाक रोगों की रोकथाम या इनसे लड़ने के मोर्चे पर कमजोरी के चलते ही इनके जीवाणु या विषाणु अपने अनुकूल आबोहवा पाकर पहले जानवरों और फिर लोगों में संक्रमित होते हैं और बेलगाम हो जाते हैं। इबोला के विषाणु सबसे पहले 1976 में सूडान और कांगो में पाए गए थे और उसके बाद उप-सहारा के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी फैले थे। तब से पिछले साल तक अमूमन हर साल कम से कम एक हजार लोग इसकी जद में आते रहे हैं। लेकिन हैरानी है कि दुनिया के विकसित देशों में चिकित्सा के क्षेत्र में लगभग हर समय चलते रहने वाले प्रयोगों में इस बीमारी का कोई कारगर इलाज खोजने के तकाजे को पिछले चार दशक के दौरान कभी गंभीरता से नहीं लिया गया।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?