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एक रंगभेद भारतीय भाषाओं के खिलाफ PDF Print E-mail
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Monday, 11 August 2014 11:30

योगेंद्र यादव

 जनसत्ता 11 अगस्त, 2014 : बरसों पहले एक दफे हिंदुस्तान की एक विख्यात विदुषी के साथ खाने की मेज पर गपशप करते वक्त मुझे जोर का झटका लगा था।

बातचीत के बीच मेरे मुंह से निकला कि मैं हिंदी और अंगरेजी दोनों भाषाओं में लिखता हूं। इस पर विदुषी की राय थी कि शैक्षणिक लिहाज से हिंदी में लिखना ठीक है। मैंने तपाक से कहा कि मैं तो अपने कुछ लेख मूल रूप से हिंदी में ही लिखता हूं, उन्होंने मुझे विस्फारित आंखों से देखा और अचरज से बोलीं कि ‘हिंदी या तमिल जैसी भाषाएं गली-मुहल्ले की बातचीत के लिए ठीक हैं लेकिन इन भाषाओं में वैसा गंभीर चिंतन नहीं किया जा सकता जैसा कि फ्रेंच या अंगरेजी में।’ जाहिर है, इतना सुनने के बाद उनके साथ भोजन का स्वाद मेरे लिए थोड़ा कड़वा हो गया।

मेरे मन के किसी कोने में यह बातचीत अभी तक बैठी रह गई है क्योंकि अंगरेजी भाषा में लिखने-पढ़ने वाले ज्यादातर लोग जिस चीज को स्वयंसिद्ध मान कर चलते हैं वह इस बातचीत में एक झटके में उजागर हो गई थी। भारतीय भाषाओं को हीन समझा जाता है, और इसी तर्क से उन लोगों को भी हीन माना जाता है जो इन भाषाओं में लिखते-पढ़ते और बोलते हैं। नस्ली और लैंगिक गैर-बराबरी की तरह भाषागत भेदभाव भी कुछ इतना जाहिर और आमफहम है कि हम इसे सहज मान लेते हैं। 

यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के सीसैट पर्चे को लेकर उठे विवाद के मूल में है भाषाई गैर-बराबरी का सवाल। पिछले डेढ़ महीने से और खासतौर पर पिछले हफ्ते भर में इस विवाद पर आई प्रतिक्रियाओं से भाषाई भेदभाव की इस जानी-पहचानी राजनीति की पुष्टि होती है। बिना प्रदर्शनकारियों की मांगों को समझे, बिना तथ्यों की जांच किए अंगरेजी का मीडिया सीसैट-विरोधी आंदोलन पर पिल पड़ा है। उधर जनप्रतिनिधियों को शर्माशर्मी इस सवाल पर बोलने को मजबूर होना पड़ रहा है। विवाद को अंगरेजी बनाम हिंदी और हिंदी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के फंदे में फंसाने की कोशिश हो रही है। सत्ताधारी दल के नेता घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं लेकिन सरकार राज्यसत्ता के चरित्र के अनुरूप आचरण कर रही है। सीसैट विवाद पर हुई सरकारी घोषणा से लग सकता है कि चलो आखिर सरकार ने प्रदर्शनकारियों के विरोध की सुध तो ली, लेकिन अगर यह सुध लेना है तो फिर बेसुध होना किसे कहते हैं? सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राहत के तौर पर वह दिया है जो उन्होंने मांगा ही नहीं था। प्रदर्शनकारी यह थोड़े ही मांग कर रहे हैं कि सीसैट के पर्चे में पूछी गई अंगरेजी के अंकों की गणना मेरिट लिस्ट में आप न करें!

सीसैट के विरोधी युवाओं में असल मुद्दों को लेकर विचारों की स्पष्टता कहीं ज्यादा है, हालांकि बात को और भी ज्यादा धारदार बना कर रखा जा सकता था। विरोध एप्टीट्यूड टेस्ट को लेकर कतई नहीं है, हालांकि सीसैट के विरोधियों में से कुछ की बातों से ऐसा लग सकता है। किसी नौकरी के लिए कोई उम्मीदवार कितना उपयुक्त है- इसे जांचने के लिए पूरी दुनिया में एप्टीट्यूड टेस्ट का उपयोग एक मानक के रूप में किया जाता है। हां, इस बात पर बहस जरूर हो सकती है कि किसी प्रशासक के लिए आवश्यक योग्यताओं में किन-किन बातों को किस मात्रा में शामिल किया जाय। ठीक इसी तरह मानविकी बनाम विज्ञान के विवाद में कुछ दम तो है जरूर लेकिन यह भी मुद्दे की मुख्य बात नहीं है। यह बात सच है कि जो छात्र इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई से जुड़े हैं वे बाकियों की तुलना में इधर कई साल से सिविल सेवा परीक्षा में अच्छा परिणाम ला रहे हैं। हो सकता है, ऐसे उम्मीदवार जिस तरह के परीक्षा पैटर्न से परिचित हैं वह सिविल सेवा परीक्षा को पार करने के मामले में उनके लिए तनिक मददगार साबित होता हो। 

सीसैट को लेकर उमड़ा विरोध न तो हिंदी की तरफदारी में है और न ही अंगरेजी की मुखालफत में। प्रदर्शनकारियों ने जोर-शोर से कहा है कि वे हिंदी की हिमायत में यह सब नहीं कर रहे बल्कि उनका संघर्ष सभी भारतीय भाषाओं का पक्षधर है। प्रदर्शनकारियों ने बार-बार कहा है कि वे अंगरेजी के विरोध में नहीं हैं। अंगरेजी भाषा संबंधी योग्यता की जांच वाले पर्चे का वे विरोध नहीं कर रहे। अंगरेजी मीडिया यह बात समझ ही नहीं पा रहा कि हिंदी-हिमायती या फिर अंगरेजी-विरोधी हुए बगैर भी कोई भाषाई गैर-बराबरी के सवाल को उठा सकता है।

यह विरोध-प्रदर्शन अंगरेजी के खिलाफ नहीं बल्कि अंगरेजी के दबदबे के खिलाफ है। राष्ट्र की सारी प्रतिभा अंगरेजीभाषी एक छोटे-से समूह के अंदर ही विराजती है- यह विरोध-प्रदर्शन इस धारणा के खिलाफ है। यह हिंदी की हिमायत का नहीं बल्कि अंगरेजी के बरक्स बाकी भारतीय भाषाओं को होड़ के लिए बराबर की जमीन दिलाने की लड़ाई है। सीसैट के पर्चे के खिलाफ इस सीधे-सादे मगर तूल पकड़ते विरोध-प्रदर्शन की जड़ में है इस देश में अनौपचारिक रूप से जारी वह भाषाई भेदभाव जो किसी रंगभेद से कतई कम नहीं। 

बात यह है कि सीसैट बड़े चुप्पा ढंग से अंगरेजी को बुलंद बनाता है। एप्टीट्यूड टेस्ट के भीतर निश्चित ही भाषाई योग्यता-क्षमता की जांच होनी चाहिए। लेकिन क्या इस बात का भी कोई तुक है कि भाषाई योग्यता-क्षमता की जांच सिर्फ अंगरेजी भाषा में हो? सीसैट में फिलहाल यही व्यवस्था है। यह अलग बात है कि सीसैट में भाषाई योग्यता की जांच के लिए पूछी जाने वाली अंगरेजी दसवीं-बारहवीं के स्तर की होती है। यहां मुद््दे की बात यह है कि एप्टीट्यूड टेस्ट में भाषाई योग्यता की


जांच के लिए किसी भारतीय भाषा पर विचार तक नहीं किया गया है। सीसैट के प्रश्नपत्र में प्रस्तुत अनुवाद को लेकर उठा हंगामा बेजा नहीं है। इससे साबित होता है कि एप्टीट्यूड की जांच भाषा-निरपेक्ष नहीं है। 

प्रदर्शनकारी ठीक ही नाराज हैं कि उनके साथ सिविल सेवा की परीक्षा में दोयम दर्जे के परीक्षार्थी की तरह बरताव किया जा रहा है। अंगरेजी माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों का दर्जा कुछ वैसा ही है जैसा कि घरेलू मैदान पर खेलने वाली टीम या फिर टेनिस या बैडमिंटन में वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों का होता है, जबकि भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों को प्रतीक्षा करनी होती है कि काश, कोई करिश्मा होता और वाइल्डकार्ड एंट्री मिल जाती। सीसैट के विरोध में प्रदर्शन करने वाले उस अन्यायी शक्ति-समीकरण से जूझ रहे हैं जिसे वस्तुनिष्ठ यानी भेदभाव से परे मानी जाने वाली परीक्षा-पद्धति के भीतर ही गूंथ दिया गया है।

आंकड़े इस आशंका को पुष्ट करते हैं। बीते तीन दशकों में भारतीय भाषा के उम्मीदवारों की संख्या सिविल सेवा में बढ़ी थी और आभिजात्य मानी जाने वाली इस सेवा के दरवाजे साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए खुले थे। सिविल सेवा परीक्षा की नई पद्धति साल 2011 में शुरूहुई और इस शुरुआत के साथ बीते तीन दशकों का रुझान उलट गया। 2008-10 के बीच भारतीय भाषाओं को माध्यम बना कर सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों की संख्या चौवालीस प्रतिशत थी जो 2011-12 में घट कर महज अठारह प्रतिशत रह गई। हालांकि 2013 के लिए औपचारिक तौर पर आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं तो भी कहा जा सकता है कि सिविल सेवा परीक्षा के लिए भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाने वाले उम्मीदवारों की स्थिति पहले की तुलना में बदतर ही हुई है। खबरों के मुताबिक अंतिम रूप से चयनित उम्मीदवारों में हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों की संख्या तीन प्रतिशत रह गई है जबकि 2009 में यह संख्या पच्चीस प्रतिशत थी।

दरअसल, सीसैट का पर्चा या फिर सिविल सेवा परीक्षा तो एक बड़ी सच्चाई का सिरा भर है। उच्च शिक्षा की पूरी प्रणाली भारतीय भाषाओं को पढ़ाई और परीक्षा का माध्यम बना कर स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थियों के विरोध में खड़ी है। देश में उच्च अध्ययन के नामी-गिरामी संस्थानों में प्रवेश के लिए उन्हें आनन-फानन में अंगरेजी अपनानी पड़ती है। समाज विज्ञान और मानविकी के विषयों की पढ़ाई वाले छात्रों के लिए यह कोशिश कुछ इतनी कठिन साबित होती है कि बहुधा छात्र इस आजमाइश में ही नहीं पड़ते। अगर संस्थान एक या एक से अधिक भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने की अनुमति देने वाला हुआ तो भी हर कदम पर बाधाएं खड़ी मिलती हैं: पाठ्यक्रम और उनमें दर्ज जरूरी किताबें अंगरेजी में होती हैं, प्रश्नपत्र भले ही ‘ज्ञानी गूगल जी’ के सहारे अन्य भाषाओं में अनूदित करवा लिया जाय लेकिन शायद ही कोई परीक्षक इन भारतीय भाषाओं का जानकार मिलता है। भारतीय भाषा को पढ़ाई का माध्यम बनाने वाले छात्र अपेक्षाकृत कमतर माने जाने वाले संस्थानों में दाखिला ले पाते हैं या फिर बेहतर संस्थानों के भीतर कमतर दर्जे के अकादमिक पद को हासिल कर पाते हैं। उन्हें हर वक्त धारा के विरुद्ध तैरना पड़ता है। सिविल सेवा परीक्षा के खिलाफ होने वाला प्रदर्शन उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन है जो भारतीय भाषाओं में पढ़ाई-लिखाई करने वाले के विरुद्ध खड़ी है।

सरकार के अल्पकालिक बेबसी के तर्क झूठे हैं। अगर सरकार समस्या को लेकर गंभीर है तो तीन घोषणाएं तुरंत कर सकती है। एक, प्रारंभिक परीक्षा की तारीख को कुछ हफ्तों के लिए आगे खिसका दिया जाय ताकि पिछले छह हफ्तों से अनिश्चय से जूझ रहे परीक्षार्थियों को तनिक तैयारी का समय मिले। दो, कम से कम इस साल के लिए सीसैट परीक्षा के अंकों को मेरिट के लिए जोड़ना नहीं चाहिए, इस पर्चे को पास करने के लिए न्यूनतम जरूरी अंक को तय कर दिया जाय और जो इतने अंक लाए उसे इस पर्चे में पास माना जाय। तीन, सरकार इस हकीकत को स्वीकार करे कि सिविल सेवा परीक्षा भाषा-निरपेक्ष नहीं है, वह भेदभाव करती है और अगले साल तक इस भाषाई भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकार एक नई व्यवस्था बनाने का आश्वासन दे।

सीसैट विरोधी आंदोलन भाषाई भेदभाव के खिलाफ उपजे आक्रोश का आंदोलन है। इसी वजह से मैं इस विरोध-प्रदर्शन को देख कर खुश हूं और उसे सलाम भेजता हूं। विरोध-प्रदर्शन अगर मुख्य मुद्दे से न भटके, सिविल सेवा परीक्षा देने का एक और अतिरिक्त मौका जैसे फुसलावनों या फिर सत्ताधारी पार्टी और उसके एजेंटों के फांस-फंदों में न उलझे तो फिर यह विरोध-प्रदर्शन देसी भाषाओं के खिलाफ जारी रंगभेदी बरताव के असर को एक हद तक कम करने की दिशा में बढ़ा कदम साबित हो सकता है। और हां, एक बात यह भी कि ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते!


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