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अप्रासंगिक: खामोशी के शिविर PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 10:19

altअपूर्वानंद

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : स्तब्धता क्या हमेशा भाषा के लोप या उसकी असमर्थता की अवस्था है? ऐसे अवसर होते हैं जब स्तब्धता अपने आप में भाषिक प्रतिकार या भर्त्सना बन जाती है। अगर चीखना एक छोर है भाषा-व्यवहार का, तो खामोश हो जाना दूसरा छोर। यह भी होता है, चीख इतनी तेज हो और इतनी तीव्र कि साधारण श्रवण-क्षमता के बाहर हो जाए। 

जिसे चुप्पी कहा जाता है, वह कुछ मौकों पर एकतरफा और कई बार दोतरफा फैसले का नतीजा होती है। खामोशी, मौन या स्तब्धता प्राय: इस बात का सूचक होती है कि भाषा के लिए जिस सामाजिक पर्यावरण की व्याप्ति को सहज माना जाता है, वह छिन्न-भिन्न हो गया है। यह नहीं कि बोलने को कुछ नहीं है, लेकिन बोलने वाला जान चुका होता है उसका बोलना व्यर्थ है, क्योंकि उसे सुनने की पात्रता सामने का पक्ष खो बैठा है। 

क्या आपने वे फिल्में देखी हैं, जिनमें जर्मन पुलिस की निगरानी में हजारों यहूदी बर्लिन की सड़कों पर सिर झुकाए चलते चले जा रहे हैं और दोनों तरफ इस मृत्यु-यात्रा को तमाशे की तरह देखने वाले जर्मन खड़े हैं: बच्चे, औरतें, जवान, बूढ़े, सब और यकायक आपको तालियों की आवाज सुनाई देती है, जो तमाशबीनों की कतार से उठी है। अपनी मौत की तरफ बढ़ रहे इस कारवां से उसके जवाब में सिर्फ खामोशी है, स्तब्धता है। कई बार तो इस नितांत मानवीय रूप से असंगत व्यवहार पर गर्दन उठाने की इच्छा भी नहीं! ऐसी ही चुप्पी या खामोशी उन यातना शिविरों में सुनाई देती है, जिनमें रोज-रोज यहूदी खुद अपने कत्ल के सामान या अपनी कब्रें तैयार कर रहे होते थे। 

ऐसे प्रसंगों में मुखरता या बोलना अश्लील मालूम पड़ने लगता है। बोलना अपने-आप  को उघाड़ने की तरह है, ऐसी नजर के सामने, जिसमें इस नग्नता या निष्कवचता के लिए कोई सहानुभूति नहीं है। यहां चुप रहने का निर्णय उसका है, जो शिकार है। उसकी चुप्पी हमलावर पर फिटकार या लानत है। आपने अगर गोविंद निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’ देखी हो तो उस दृश्य को याद कीजिए, जिसमें आदिवासी युवक की भूमिका में ओम पुरी अपने हमदर्द वकील के लाख मनाने पर भी बोलने से इनकार करता है। 

लेकिन चुप्पी और चुप्पी में फर्क होता है। एक चुप्पी आपकी आत्मिक शक्ति का सबूत है या नैतिक श्रेष्ठता का, तो दूसरी चुप्पी, और उसी प्रसंग में किसी और की नैतिक कायरता का प्रमाण है। वे जर्मन जिन्होंने अपने सामने से यहूदियों को यातना शिविरों या गैस चैंबरों तक जाने दिया और खामोश रहे, उनकी आत्मा को हुई क्षति की चिकित्सा करने में उन्हें दशकों लग गए। कुछ निर्णायक क्षण होते हैं, जिन पर आपकी चुप्पी से आपके मूल चरित्र का पता चलता है। 

कई बार चुप्पी को गंभीरता का चोगा पहना दिया जाता है। कहा जाता है कि स्थितियां इतनी जटिल हैं कि साफ बोलना मुमकिन नहीं, जबकि जटिलता एक खास तरह के नैतिक असमंजस से पैदा हुई है। मसलन, जब कहा जाए कि गाजा पर इजराइली आक्रमण और फिलस्तीनियों का संहार पेचीदा मसला है और उसके दो पक्ष हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है, तो ऐसा कहने वाले का पक्ष स्पष्ट है। वह हत्या को हत्या, हमले को हमला और कब्जे को कब्जा नहीं कहना चाहता। उस समय जटिलता की दुहाई देकर चुप रहने वाले, जो बोलते हैं उन्हें छिछला करार देते हैं। 

यह भी देखा जाता है कि गंभीर लोग बोलने का जिम्मा कुछ खास का ही समझते हैं। गाजा पर हमले के विरोध में भारत के भीतर प्रतिक्रियाओं को देख कर इस बंटवारे को समझा जा सकता है। क्यों इस हमले और फिलस्तीनी नागरिकों के कत्लेआम पर हिंदी जनसंचार जगत प्राय: चुप है और अंगरेजी अखबार क्यों इजराइल का पक्ष समझने का प्रयास करते दीखते हैं? क्यों इस अमानवीय, कू्रर और अस्वीकार्य इजराइली खूंरेजी पर सिर्फ वामपंथी और मुसलमान मुखर हैं? क्यों हमारे बाकी जनतांत्रिक दल इस प्रसंग पर बोलने की सोच भी नहीं रहे? क्यों गांधी और नेहरू, यहां तक कि इंदिरा की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस एक राजनीतिक दल की तरह मानवीय प्रतिक्रिया करने से भी लाचार है? हमारे उदारपंथी बुद्धिजीवी क्यों इसे बात करने लायक मसला नहीं मान रहे? क्यों इसे तथाकथित सैन्य मामलों के जानकारों और राजनयिकों के लिए छोड़ दिया गया है? 

कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसे हमले इतने होते हैं, हम कितनी बार बोलें! मानो दुहराव एक अवगुण हो!


जो इस वजह से इसे हीन कार्य मानते हैं कि यह दुहराव है, उन्हें पहले इस पर विचार करना चाहिए कि क्यों उन्हीं तर्कों के साथ इजराइल हर साल-दो साल पर यह खूंरेजी करता है। हत्या का यह दुहराव ज्यादा घातक है या हर बार हत्या के विरोध का दुहराव? 

क्यों और कैसे हमारे विश्वविद्यालय, राजनीतिशास्त्र विभाग अपनी कक्षाओं और परीक्षाओं में मुब्तिला हैं? क्यों उन्हें यह मानवता के लिए ही नहीं, अपने ज्ञानानुशासन के लिए आपदा का क्षण नहीं मालूम पड़ता? क्या यह आश्चर्य की बात है कि खुद को गांधीवादी कहने वाली संस्थाओं ने, दिल्ली से लेकर साबरमती तक इसे बोलने लायक प्रसंग नहीं माना है और वैसे ही नेहरू के नाम पर बनी शैक्षिक और शोध संस्थाओं ने भी इस पर अब तक कोई अकादमिक राय जाहिर नहीं की है? क्या शत-प्रतिशत शिक्षित, श्रेष्ठतम विज्ञान और टेक्नोलॉजी का आविष्कार करने वाले समाज की यह हिंसा ज्ञान या शिक्षा मात्र के लिए सबसे बड़ी समस्या नहीं है? क्या यह शिक्षा और ज्ञान के उद्देश्य पर पुनर्विचार का अवसर नहीं है? क्या मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, मानवशास्त्र और ज्ञान की सभी शाखाओं को इसका संधान करने की जरूरत नहीं कि एक ऐसी क्रूरता कैसे एक सामाजिक गुण बन जाती है? 

क्यों भारत के शिक्षाविद अपनी इजराइली हमपेशा बिरादरी को कह नहीं सकते कि उनके साथ बैठना अब या कम से कम अभी मुश्किल है? क्यों यह काम स्टीफेन हॉकिंग्स या नोम चोम्स्की कर सकते हैं और क्यों भारत के वैज्ञानिक और भाषाविद नहीं? क्या हत्या को सहने और हत्यारे के साथ तालमेल के बाद भी उनकी विद्या निष्कलंक रह जाती है और क्या उसे विद्या भी कहना संभव होगा? 

इजराइल द्वारा कत्ल किए गए एक-एक बच्चे का खून सिर्फ उसके हाथ नहीं, हम सबके हाथ लगा है। मृणाल सेन की फिल्म ‘खारिज’ का वह दृश्य याद आता है, जिसमें बुजुर्ग वकील युवा दंपत्ति को कहता है कि विश्व के किसी भी कोने में होने वाली हर मृत्यु के लिए हम सब जवाबदेह हैं। यह कोई नाटकीय कथन मात्र नहीं। हत्यारे को सामाजिकता का सम्मान प्रदान करने के बाद खुद को मनुष्य कहने की योग्यता हम खो बैठते हैं। 

अगर हम आज तक नहीं बोले तो यह आगे बोलने के लिए बाधा नहीं। ब्रिटेन की टोरी सरकार की विदेश मंत्री सईदा वारसी ने फिलस्तीन पर इजराइली हमले पर अपनी सरकार के रवैए से असहमति जताने के लिए कैमरून मंत्रिमंडल से इस्तीफा देते हुए कहा कि मैंने सीखा है कि हृदय के आवेग और आदर्शवाद का तालमेल यथार्थवादिता और व्यावहारिकता से कैसे बिठाया जाए। लेकिन अंत में मैं यह सोचती हूं कि जो फैसले मैं अभी कर रही हूं, क्या राजनीतिक जीवन के बाद उन पर सोचते हुए मैं खुद के साथ चैन से रह सकूंगी। वारसी ने अपने निर्णय को न तो फिलस्तीनियों और न मानवता के पक्ष के नाम पर उचित ठहराया। अंत में हम सब अपना सामना करते हैं। क्या हमारा निर्णय हमें उसके लायक बना रहा है? अकेले में अपने सवालों का जवाब देने लायक? या सवाल करने लायक ही? 

हिंसा और क्रूरता सिर्फ इंसानों को नष्ट नहीं करती। महमूद दरवेश अपनी एक लंबी कविता में कहते हैं: ‘हमारा नुकसान: दो से आठ शहीद/ रोज/ और दस घायल/ और बीस घर/ और पचास जैतून के वृक्ष,/ अलावा उस संरचनात्मक आघात के जो ग्रस लेगा कविता, नाटक और अधूरी पेंटिंग को।’ भाषा के अभ्यासियों को और किसी वजह से नहीं तो अपने रचनाकर्म को इस संरचनात्मक आघात से बचाने के लिए भी इजराइली आक्रमण और रक्तपात और फिलस्तीन पर उसके कब्जे का विरोध बिना थके और बिना ऊबे करते ही रहना होगा।


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