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निनाद: हकीकत और हंगामा PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 10:14

altकुलदीप कुमार

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : उन्नीस सौ तिहत्तर के अगस्त माह की बात है। मैंने बीएससी की परीक्षा दी थी और पहले कभी इतिहास न पढ़ने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास से एमए करने के लिए आवेदन कर दिया था। वहां से तार आया कि आप अमुक तारीख को दस बजे सुबह इंटरव्यू के लिए उपस्थित हों, आने-जाने के लिए दूसरे दर्जे का रेल किराया दिया जाएगा। तब लिखित परीक्षा नहीं होती थी। उस समय जेएनयू को कम लोग जानते थे। एक मित्र के साथ जब मैं कई जगह भटक कर वहां पहुंचा तो साढ़े ग्यारह बज चुके थे। एक कमरे में दस-बारह लड़के-लड़कियां बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हम भी बैठ गए और उनकी बातचीत सुनने लगे। वे सब अंगरेजी बोल और इतिहास पर चर्चा कर रहे थे। 

पूछने पर पता चला कि केवल बीस सीटें हैं, आज पांचवां और अंतिम दिन है और हर दिन लगभग बीस उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया गया है। सुनते ही मैं इतिहास विभाग के दफ्तर किराया लेने पहुंच गया, क्योंकि प्रवेश की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी। दफ्तर में बताया गया कि बिना इंटरव्यू दिए किराया नहीं मिल सकता। साथ गए मित्र ने कहा, जब आए हो तो इंटरव्यू दे डालो। किराया तो मिल जाएगा। सो, नाम पुकारे जाने पर मैं उस कमरे में दाखिल हो गया, जहां इंटरव्यू चल रहे थे। 

उस समय तक मैंने किसी भी इतिहासकार का नाम नहीं सुना था, उनकी किताब पढ़ना तो दूर। फिर, अब तो इंटरव्यू देने का उद्देश्य प्रवेश नहीं, किराया लेना था। इसलिए मैं एकदम बेधड़क था। इंटरव्यू बोर्ड की अध्यक्ष रोमिला थापर थीं और वहां उपस्थित प्राध्यापकों में सव्यसाची भट््टाचार्य, सुवीरा जायसवाल, बृजदुलाल चट््टोपाध्याय और मुजफ्फर आलम आदि शामिल थे। लेकिन मुझे नहीं पता था कि ये सब लोग कौन हैं। मैंने बैठते ही कहा कि मैं एक छोटे-से कस्बे नजीबाबाद से आया हूं, जहां कोई अंगरेजी नहीं बोलता, और मैंने कभी इतिहास नहीं पढ़ा है। इसलिए मुझसे यह न पूछा जाए कि फलां युद्ध कब हुआ था। दूसरे, मुझसे सवाल अंगरेजी में किए जा सकते हैं, लेकिन जवाब मैं हिंदी में ही दूंगा। मेरा अनुरोध सुन कर सब सकते में आ गए। लेकिन उसे मान लिया गया। इंटरव्यू लगभग पौन घंटे चला और यह इन बड़े इतिहासकारों की उदारता ही थी कि मुझ जैसे छात्र को प्रवेश मिला, जिसे न अंगरेजी आती थी और न इतिहास। 

प्रवेश तो मिल गया, लेकिन मेरी हालत खराब हो गई। मेरे सहपाठी इतिहास में बीए (आॅनर्स) करके आए थे और मैं एकदम कोरा। ऊपर से अंगरेजी का ज्ञान बहुत कम। पहली बार ऐसा हुआ कि मैं कक्षा के फिसड््डी विद्यार्थियों में शुमार होने लगा। मैंने अंगरेजी का कामचलाऊ ज्ञान कैसे हासिल किया, यह कहानी फिर कभी। अभी तो इतना ही कि आज भी लाखों-करोड़ों विद्यार्थियों की हालत वैसी ही है जैसी उस समय मेरी थी। क्योंकि न तो हमारी शिक्षा-व्यवस्था बदली है और न देश की हालत। आज भी यही स्थिति है कि बिना अंगरेजी ज्ञान के जीवन में तरक्की करना लगभग असंभव है। 

आजादी के वक्त अंगरेजी का जितना वर्चस्व था, आज उससे अधिक है। जहां तक हिंदी का सवाल है, वह अभी तक ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं बन सकी है। उसमें प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और मानविकी के विषयों में मूल लेखन नाममात्र होता है। अगर किसी विषय पर श्रेष्ठ साहित्य पढ़ना है, तो वह अंगरेजी में ही उपलब्ध है। कुछ किताबें जरूर हिंदी में अनुवाद होकर आ जाती हैं, लेकिन अनुवाद कभी-कभी ही ऐसा होता है, जिसे पढ़ कर विषय आसानी से समझ में आ जाए। जहां तक राजकाज की भाषा का सवाल है, पिछले लगभग सात दशकों के दौरान एक ऐसी कृत्रिम हिंदी गढ़ी गई, जिसे आम आदमी के लिए तो क्या, अच्छे-खासे पढ़े-लिखे आदमी के लिए भी समझना असंभव है। 

एक ओर यह स्थिति है, तो दूसरी ओर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को अंगरेजी की जगह देने का वैचारिक अभियान है, जो आजादी के पहले से चल रहा है और भविष्य में भी न जाने कितने दशकों तक और चलेगा। हिंदी के पैरोकार कितना भी कहें कि वे सभी भारतीय भाषाओं के पक्ष में


बोल रहे हैं, पर सच्चाई यही है कि अन्य भाषाओं के लोग इसमें हिंदी द्वारा अपने को अंगरेजी का उत्तराधिकारी बनाने और अन्य भारतीय भाषाओं पर वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश देखते और उसका विरोध करते हैं। अहिंदी भाषियों का सवाल है कि अगर अंगरेजी की जगह हिंदी देश के राजकाज की भाषा, यानी केंद्र सरकार और उसके साथ राज्य सरकारों के संवाद की भाषा बन गई, तो उन्हें एक और भाषा सीखनी पड़ेगी, जबकि हिंदीभाषी कोई अन्य भारतीय भाषा सीखने को तैयार नहीं। 

हकीकत यह है कि हिंदीभाषी अपनी भाषा सीखने के लिए भी मेहनत करने को तैयार नहीं। हिंदी प्रदेशों में ऐसे छात्रों की संख्या काफी है, जो शुद्ध हिंदी (यहां मेरा आशय वर्तनी और व्याकरण की शुद्धता से है, संस्कृतनिष्ठ हिंदी से नहीं, जिसे भ्रमवश बहुत-से लोग शुद्ध हिंदी समझते हैं) नहीं लिख सकते। त्रिभाषा सूत्र बुरी तरह फेल हो चुका है। आजादी मिलने से पहले भारतीय भाषाओं के साहित्यों के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया अपनी स्वाभाविक गति से विकसित हो रही थी। हिंदी से अन्य भाषाओं में और अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद किए जा रहे थे। ये अनुवाद लोग अपनी पहल पर कर रहे थे। अब इन्हें सिर्फ कुछ सरकारी संस्थाएं कराती हैं और यह प्रक्रिया पूरी तरह राज्याश्रित हो गई है। 

चाहे हम इस सच्चाई से कितनी ही नफरत क्यों न करें और हमें अपने अतीत पर कितना ही अफसोस क्यों न हो, हम उसे बदल नहीं सकते। सच्चाई यह है कि हमारा देश चीन, जापान, फ्रांस और जर्मनी की तरह नहीं है। उसका एक औपनिवेशिक इतिहास है, जिसके दौरान अंगरेजी ज्ञान-विज्ञान, शासन-प्रशासन और वर्ग-श्रेष्ठता की भाषा बन गई। इन देशों के साथ उसकी तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि वहां इतनी अधिक भाषाई बहुलता भी नहीं है। तमिल दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है और आज भी जीवंत है। तमिलभाषी अगर अपनी भाषा और उसके समृद्ध साहित्य पर गर्व अनुभव करते हैं, तो इसमें गलत क्या है? 

हिंदी के पैरोकारों को यह सोचना चाहिए कि बार-बार यह दावा करके कि हिंदी देश की संपर्क भाषा है (जो कि वह है, लेकिन जनता के स्तर पर, शासन और ज्ञान-विज्ञान के स्तर पर नहीं) वह हिंदी का कुछ भी भला नहीं कर रहे हैं। इससे अन्य भाषाभाषी आशंकित हो जाते हैं। दूसरे, भाषा के प्रति वैचारिक आग्रहों के कारण देश के गरीब और निम्न मध्यवर्ग के बच्चे उन स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जहां अंगरेजी की शिक्षा या तो उपलब्ध ही नहीं है, और अगर है भी तो बराएनाम। अंगरेजी हटाने के अभियानों ने इन बच्चों का सबसे अधिक अहित किया है और इनकी तरक्की के रास्ते बंद किए हैं। 

इस समय स्थिति यह है कि अच्छी अंगरेजी की शिक्षा सिर्फ प्रभुवर्ग को उपलब्ध है। नतीजतन, उसका वर्चस्व भी सुरक्षित है। हिंदी के अधिकतर पैरोकारों के बच्चे भी हिंदी माध्यम वाले सरकारी स्कूलों में नहीं, अंगरेजी माध्यम के निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। आज के भूमंडलीकृत विश्व में जहां संचार क्रांति ने जीवन के हर हिस्से को प्रभावित किया है, अंगरेजी से दामन बचाना संभव नहीं रह गया है। सवाल यह नहीं कि कितने लोग अंगरेजी बोलते हैं। सवाल है कि अंगरेजी बोलने और लिखने वालों के हाथों में कितनी सत्ता है। अगर इस सत्ता का लोकतांत्रिकीकरण करना है, तो अंगरेजी को उसकी हाथी दांत की मीनार से नीचे उतारना और सर्वसुलभ बनाना होगा। अंगरेजी हटाओ अब बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प नहीं रह गया है।


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