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वक़्त की नब्ज़: लाल किले से लिखा नहीं भोगा PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 10:06

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : मुद्दतों बाद पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करेंगे एक असली प्रधानमंत्री जो जनता से जनादेश लेकर आए हैं। पिछले एक दशक से भारत की बागडोर एक ऐसे प्रधानमंत्री के हाथों में रही है जिन्हें आदेश मिला था सोनिया गांधी से। सो, उनका पंद्रह अगस्त वाला भाषण अति उबाऊ और किसी मुनीम की रिपोर्ट जैसा लगता था। 

इस बार दुआ कीजिए कि जब नरेंद्र मोदी इस ऐतिहासिक स्थान पर खड़े होकर अपना भाषण शुरू करेंगे तो वे यह याद रखेंगे कि उनके साथ कितनी आशाएं बंधी हुई हैं। दुआ यह भी कीजिए कि उन्हें याद रहे कि उन्हें जनादेश परिवर्तन के लिए मिला है। प्रशासनिक परंपराओं को कायम रखने के लिए नहीं। परंपराओं के पहरेदार बहुत हैं प्रधानमंत्री कार्यालय में और मोदी को इनसे नसीहत यही मिलेगी कि पंद्रह अगस्त को वही किया जाए जो दशकों से प्रधानमंत्री करते आए हैं। यानी वही बेमतलब हिसाब दिया जाए जिसे सुनते हुए जनता इतना ऊब चुकी है कि आजादी का यह जश्न बेमजा हो गया है। 

हम जैसे पत्रकारों के लिए मजबूरी है प्रधानमंत्री का भाषण ध्यान से सुनना। लेकिन सच पूछिए कि हम भी ऊब गए हैं। फीका सा भाषण और फीका सा अवसर हो गया है यह। वह दिन गए जब जनता आती थी प्रधानमंत्री को सुनने। लाल किले के आसपास सुरक्षा इतनी होती है अब कि जनता करीब पहुंच ही नहीं पाती है। पहुंचते हैं सिर्फ वीवीआइपी। मंत्री, आला अधिकारी, विदेशी मेहमान और कुछ स्कूलों से लाए हुए बच्चे जो करते हैं जनता की नुमाइंदगी। 

इस साल आजादी का यह जश्न खास है। नए प्रधानमंत्री हैं जो एक चायवाले के बेटे होने के नाते अच्छी तरह समझते हैं देश के आम आदमी की आशाएं और समस्याएं। उनके भाषण को सुबह-सवेरे उठ कर सुनेंगे आम लोग इस उम्मीद से कि प्रधानमंत्री दिल से बोलेंगे। इसलिए विनम्रता से अर्ज करती हूं प्रधानमंत्री से कि वे किसी और का लिखा हुआ भाषण न पढ़ें जैसा परंपरागत होता है। प्रधानमंत्री को याद रखना चाहिए कि उनके कार्यालय के आला अधिकारी इतने चतुर हैं कि इन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की भी लोकप्रियता कम कर दी थी उनसे लिखित भाषण पंद्रह अगस्त को पढ़वा कर। अटलजी, जो भारतीय राजनीति में सबसे अच्छे वक्ता माने जाते थे इन अधिकारियों की बातों में आकर पिट गए। सो सावधान हो जाएं प्रधानमंत्री और इनकी बातों में न आएं। भारत सरकार के आला अधिकारी बड़े साहब हैं। इनके जीवन में उन चीजों का कभी अभाव नहीं रहा है जिन्हें हासिल करने के लिए इस देश के आम लोग जीवन भर संघर्ष करते हैं। रोजगार, रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, स्कूल, सड़क। इसलिए जब कोई राजनेता उन्हें कहता है स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर कि देश का हाल बड़ा अच्छा है तो वे जान जाते हैं एकदम कि उनसे झूठ बोला जा रहा है। असलियत इस देश के अनपढ़ लोग भी जानते हैं। वे लोग तो रहते हैं शहरों, महानगरों में। जानते हैं कि आवास मिल जाए किसी झुग्गी बस्ती में तो वह भी गनीमत है। रोजगार मिले ढंग का तो दफ्तर पहुंचना होता है ठसाठस भरी ट्रेनों में सवार होकर या ऐसी बसों


में जिनमें इतने लोग होते हैं कि दम घुट जाता है। बच्चों को किसी अच्छे स्कूल में दाखिला मिल जाए तो मन से बहुत बड़ा बोझ उठ जाता है, और अगर इस स्कूल से लिखना-पढ़ना और थोड़ी बहुत गिनती सीख के निकले तो और भी बड़ी गनीमत। 

देहातों में जहां गांधी कहा करते थे असली भारत रहता है वहां जीवन और भी कठिन है। भारत का किसान कर्जे के बोझ तले अपना पूरा जीवन गुजारता है और एक साल बारिश न आए तो इतना बुरा हाल हो जाता है कि आत्महत्या की नौबत आ जाती है। उसके ऊपर रोजमर्रा की मुसीबतें। पीने के पानी का अभाव, बिजली का अभाव, रोजगार का अभाव और रिहाइश ऐसी गंदगी के बीच कि बच्चे अगर पांच साल की उम्र तक जीवित रहते हैं तो भगवान की मेहरबानी मानी जाती है।

आंकड़ों से भारत देश की सेहत का अंदाजा लगाया जाए तो मालूम होता है कि इस देश के आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। आधे से ज्यादा परिवार ऐसे जिनके घरों में निजी शौचालय नहीं है। खेतों में शौच करने पर मजबूर हैं इस देश के इतनी बड़ी तादाद में ग्रामीण नागरिक कि कई किस्म की बीमारियां फैलती हैं जो अन्य देशों में नहीं मिलती हैं। यानी भारत माता का हाल बिलकुल अच्छा नहीं है। यह स्थिति पैदा हुई है गलत आर्थिक नीतियों के कारण। गरीबों के नाम पर एक ऐसे देश को गरीब रखा गया है जिसे प्रकृति ने इतना कुछ दिया है कि गुरबत का सवाल ही नहीं होना चाहिए।

ये सारी बातें हमसे ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं नरेंद्र मोदी। ये सारी बातें उन्होंने खुद स्वीकार की थी कई बार अपने चुनावी भाषणों में। परिवर्तन और विकास पर इतना जोर दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं इतनी कि नरेंद्र मोदी की आवाज कम सुनने को मिली है। पिछले दिनों और ज्यादा सुनने को मिली हैं उनके मंत्रियों की आवाजें। ये मंत्री वही पुरानी भाषा बोल रहे हैं जो पिछली सरकार के मंत्री बोला करते थे। सो वही घिसी-पिटी बातें सुनने को मिली हैं जिन्हें सुन कर जनता ऊब गई है। परिवर्तन का नामो-निशान नहीं दिख रहा है अभी तक उनकी बातों में।

सो प्रधानमंत्री आप ही से बंधी हुई है इस देश के 1.25 करोड़ लोगों की आशाएं। आपको दिखाना होगा इस ऐतिहासिक अवसर पर कि आप वास्तव में रखवाले हैं हम भारतीयों की उम्मीदों के। बहुत अहम है 15 अगस्त का आपका यह भाषण।


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