मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
प्रतिक्रिया: बड़बोलेपन का मर्ज PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Sunday, 10 August 2014 10:04

महेंद्र राजा जैन

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : कमल किशोर गोयनका ने ‘प्रेमचंद की दुकानदारी’ (जनसत्ता, 27 जुलाई) में हिंदी लेखकों, संपादकों, आलोचकों, अकादमियों-संस्थाओं के निदेशकों, प्रोफेसरों आदि द्वारा प्रेमचंद के संबंध में कुछ भी झूठ-सच लिखने-समझने और प्रकाशित करने के संबंध में जो लिखा है, उससे शायद ही कोई असहमत हो। जो जिसके मन में आता है, बिना तथ्यों की खोज के झूठा-सच्चा कुछ भी लिख और झूठी शान बघारने के लिए प्रकाशित भी कर देता है। ऐसे लेखन की ओर या तो लोग ध्यान ही नहीं देते, या पढ़ने पर किसी प्रकार की गलती का पता चलता है, तो यह सोच कर चुप रह जाते हैं कि क्यों इन ‘बेकार’ की बातों में सिर खपाया या समय बर्बाद किया जाए। अगर प्रतिवाद स्वरूप कोई कुछ कहता-लिखता भी है, तो उसकी बात पूरी तरह दबा दी या ऐसा करने की कोशिश की जाती है। कभी-कभी तो प्रतिवाद करने वाले का उस पत्रिका, संस्था या प्रकाशक द्वारा पूरी तरह बहिष्कार कर दिया जाता है, उसका नाम ‘काली सूची’ में डाल दिया जाता है। 

क्या यह महज संयोग है कि कमल किशोर गोयनका ने ‘प्रेमचंद का पहला उपन्यास’ शीर्षक विज्ञापन ‘नया ज्ञानोदय’ के जिन संपादक महोदय के काल में छपना बताया है (उन्होंने उनका नाम नहीं बताया, पर हम जानते हैं), उन्हीं ने उसके दो वर्ष पूर्व ‘वागर्थ’ के एक अंक में लगभग इसी प्रकार का एक और गुल खिलाया था, जिसे हिंदी साहित्येतिहास की ‘ब्लंडर’ कहना गलत नहीं होगा। ‘वागर्थ’ के पाठक, हिंदी के विद्वान, प्रोफेसर आदि तब भी चुप रह गए थे। या तो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया या किसी में इतना साहस नहीं था कि ‘वागर्थ’ के संपादक या प्रकाशक का ध्यान इस ओर दिलाए। 

उस समय ‘वागर्थ’ में लिखे अपने संपादकीय में संपादक महोदय ने यह लिख कर हिंदी जगत के साथ मंत्रालयों, संस्थाओं, संपादकों और विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागाध्यक्षों का ध्यान आकर्षित किया था कि ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के महत्त्वपूर्ण विश्वकोश में हिंदी और भारतीय भाषाओं और साहित्य की पूरी तरह अनदेखी की गई है। यह हम सबके लिए बड़े शर्म की बात है और ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा जाना चाहिए। 

संपादकीय में यह भी बताया गया था कि लेखकों, संपादकों, हिंदी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों की हिंदी विभागों, मंत्रालयों आदि को भी इस संबंध में सूचित किया गया और उनसे आशा की गई थी कि वे ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ को पत्र लिख कर इसका प्रतिवाद करेंगे। 

जब मैंने वह संपादकीय पढ़ा तो पहले विश्वास ही नहीं हुआ कि ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ में इतनी बड़ी गलती हो सकती है। मैंने अपने परिचित कुछ संपादकों, साहित्यकार मित्रों, हिंदी संस्थाओं के अधिकारियों और विश्वविद्यालयों के विभागाध्यक्षों से इस संबंध में पूछा तो पता चला कि भारतीय भाषा परिषद या किसी भी अन्य सूत्र से उनके पास ऐसा कोई पत्र नहीं आया है और न ही उन्हें ऐसी कोई सूचना मिली है। आश्चर्य तो यह जान कर हुआ कि कुछ लोगों को ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ के संबंध में ही कुछ पता नहीं था (दरअसल, उन्होंने पहली बार मुझसे ही इस विश्वकोश का नाम सुना था)। इससे पता चलता है कि संपादक महोदय ने हिंदी जगत के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया था। 

चूंकि ‘वागर्थ’ जैसी पत्रिका के संपादकीय में यह लिखा गया था, इसलिए सोचा कि यह सब सोच-समझ कर काफी जांच-पड़ताल करने के बाद ही लिखा गया होगा।


फिर भी पता नहीं क्यों, मन दुविधा में था। इसलिए संपादकीय में लिखी बात की पुष्टि के लिए एक बार ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ देख लेना उचित समझा। 

तब पता चला कि संपादक महोदय ने कितनी बड़ी ‘ब्लंडर’ की थी। ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ में भारतीय और हिंदी भाषा और साहित्य के संबंध में लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों में काफी विस्तार से लिखा गया था। कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों और ग्रंथों पर छोटी-बड़ी स्वतंत्र टिप्पणियां भी थीं। इससे जान पड़ता है कि संपादक महोदय ने खुद ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ को देखे बिना और किसी से सुनी-सुनाई बात के आधार पर यह सब लिख दिया। 

मैंने तुरंत इस संबंध में भारतीय भाषा परिषद को सूचना दी, पर वहां से मेरे पत्र की प्राप्ति की सूचना मिलना तो दूर, उसके अगले अंक के संपादकीय में और भी जोर-शोर से फिर वही भूल दोहरा दी गई। कमल किशोर गोयनका ने ठीक ही लिखा है कि किसी संस्था का निदेशक (या पत्रिका का संपादक) ज्ञान-विज्ञान का विशेषज्ञ बन जाए और उपलब्ध ज्ञान की उपेक्षा करके मनमाने फैसले करे तो ऐसा ही परिणाम निकलेगा। ‘वागर्थ’ के संपादक और भारतीय भाषा परिषद के संज्ञान में ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ संबंधी सारे तथ्य लाने पर भी भूल-सुधार करना तो दूर, उसके बाद की घटनाओं से पता चला कि भारतीय भाषा परिषद ने अघोषित रूप से एक प्रकार से मेरा बहिष्कार कर रखा है। 

जो हो, ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ के संबंध में ‘वागर्थ’ द्वारा किए दुष्प्रचार का एक सुखद पहलू यह कहा जा सकता है कि भले संपादकीय में दावा किया गया था कि ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ को भी इस संबंध में लिखा गया है, पर मुझे पूरा विश्वास है कि संपादकीय दावे के प्रतिकूल ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ को कुछ भी नहीं लिखा गया, अन्यथा उसका क्या परिणाम होता- उसकी कल्पना मात्र से मैं सिहर उठता हूं। पाठकों को पता होगा कि विदेशों में किसी पत्र-पत्रिका या पुस्तक में किसी के संबंध में अगर कोई ऐसी बात छप जाती है, जो पूरी तरह बेबुनियाद या झूठी वाहवाही बटोरने और पुस्तक या पत्रिका की बिक्री बढ़ाने के लिए लिखी गई होती है, तो अक्सर संबंधित व्यक्ति या संस्था द्वारा प्रकाशक और लेखक को नोटिस भेज कर भूल-सुधार करने के साथ ही मानहानि का दावा भी ठोंक दिया जाता है। परिणामस्वरूप प्रकाशक और लेखक को गलत बात छापने और लिखने के लिए माफी तो मांगनी ही पड़ती है, लाखों-करोड़ों रुपए का हर्जाना भी देना पड़ता है। ऐसे कई मामले वहां हो चुके हैं। सोचिए भला, अगर ‘एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ ने इसकी जानकारी होने पर भारतीय भाषा परिषद के साथ संपादक पर भी मानहानि का दावा कर दिया होता तो उनकी क्या हालत होती? 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?