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मतांतर: गुणवत्ता बनाम भेदभाव PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 09:56

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : पहले लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा का माध्यम केवल अंगरेजी था। तब सबके सामने एक ही सवाल था कि क्या पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ही इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर सफल हो सकते हैं। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आयोग को लिखा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को परीक्षा का माध्यम क्यों नहीं बनाया जा सकता? आयोग ने उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। एक लंबा नोट बना कर प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया गया। पीएमओ ने पुनर्विचार करने को लिखा। फिर वही नकारात्मक उत्तर। मेरे एक सांसद मित्र ने बताया कि एक दिन प्रधानमंत्री खुद धौलपुर हाउस पहुंच गए। सीधे अध्यक्ष के कमरे में पहुंचे। आयोग में अफरा-तफरी मच गई। 

उन्होंने कहा, मैं चाहता हूं कि एक घंटे के लिए अपने सब सदस्यों को बुला लें, मैं मिलना चाहता हूं। सब सदस्य, जो उपस्थित थे, आ गए। प्रधानमंत्री ने कहा आपके काम में हस्तक्षेप करने का मुझे दुख है, लेकिन मैं भी आयोग का काम करने ही आया हूं। हिंदी और भारतीय भाषाओं को सिविल सेवा परीक्षाओं का माध्यम बनाने के बारे में आयोग का नोट और चेयरमैन से हुआ पत्र-व्यवहार मेरे पास है। अगर उसके अलावा किसी को कुछ और कहना हो तो खुल कर कहें। सदस्यों ने एक-एक करके बोलना शुरू किया। सब बोल चुके तो अध्यक्ष ने कहा कि सदस्य अनुभव करते हैं कि हिंदी को माध्यम बनाने से प्रशासन प्रभावहीन हो जाएगा। उन्होंने केवल हिंदी का नाम लिया। 

कुछ देर चुप रहने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा: मैंने आप सबकी राय सुनी, लेकिन मैं और मेरी सरकार इससे सहमत नहीं है। हमने निर्णय किया है कि देश के युवावर्ग के हित में तत्काल प्रभाव से सिविल सेवाओं में हिंदी माध्यम से परीक्षा लेने की तैयारी शुरू कर दें। भाषा के नाम पर हम अपने युवावर्ग को नहीं बांट सकते। आजादी की लड़ाई के जमाने से हम देश की भाषाओं को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अगले साल से भारतीय भाषाओं में परीक्षा लें। औपचारिक आदेश और धन के आबंटन की सूचना आपको प्राप्त हो जाएगी। यह सब विवरण मेरे सांसद मित्र ने बताया था। 

उसके बाद हिंदी और भारतीय भाषाओं में परीक्षा होने लगी। नतीजा यह हुआ कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रत्याशियों के चयन का प्रतिशत बढ़ने लगा। लेकिन इन भाषाओं को माध्यम के रूप में स्थायित्व नहीं मिला। समय-समय पर नौकरशाही या अंगरेजी पसंद मंत्रियों के कारण बदलाव होता रहता है। इस परिवर्तन के कारण प्रवेश परीक्षा में बैठने वाले बच्चों का असमंजस बढ़ता जाता है। बहुत से बच्चे तो हिम्मत हार बैठते हैं। जो परीक्षा में बैठते भी हैं उनका आत्मविश्वास डगमगाया रहता है। 

पिछली सरकार ने विकल्प हटा कर तीस नंबर का अंगरेजी का प्रश्न अनिवार्य कर दिया, जिसे लेकर व्यापक विरोध हुआ। संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ‘गुणवत्ता जरूरी है’ (जनसत्ता, 27 जुलाई) लेख में लिखा है कि यूपीएससी ने सीसैट का प्रस्ताव सरकार को भेजा था। तब अंगरेजी बोध-क्षमता के अंक पूरे पर्चे के दस प्रतिशत ही रखने की सिफारिश की थी। इन्हें तत्कालीन सरकार के अफसरों ने बढ़ा कर तैंतीस प्रतिशत कर दिया था। 

यह स्थिति मुझे विरोधाभासपूर्ण लगी। एक तरफ तो स्वायत्तता की दुहाई, दूसरी तरफ अपने प्रश्नपत्रों की अंक योजना को सरकार के अनुमोदन के लिए भेजना! अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाना तो एक तरह से स्वायत्तता की गर्दन सरकार के अफसरों के हाथ में दे देना है। अगर सरकार के पास संस्तुति के लिए भेजी भी थी, तो हर स्वायत्त संस्था इस अधिकार को अपने पास रखती ही है कि वह उसे माने या न माने। पर आज संस्थाएं सरकार को खुश करने के लिए अपने परिभाषित अधिकारों को भी खोती जा रही हैं। खैर, इतना तो किया जा सकता था कि आयोग अपने मत के साथ मंत्रालय को उस संशोधन को वापस भेज देता। जब आयोग स्वायत्तता और प्रत्याशियों के हित के प्रति जागरूक नहीं है, तो मंत्री को दोष देने का क्या लाभ कि उन्होंने संसद में आयोग की संस्तुति को स्पष्ट करने की जरूरत नहीं समझी। 

मैं स्वायत्त संस्था में काम कर चुका हूं। वहां इन दोनों स्थितियों से गुजरना पड़ा। हिंदी का मसला तो वहां एक तरह जानलेवा था। क्योंकि उस


समय आइआइटीज निखालिस अंगरेजी-पोषित संस्थाएं थीं। हिंदी बहिष्कृत थी। उस समय वहां हिंदी को लाना रोजी-रोटी को ठोकर मारना था। आंतरिक विरोध झेलना और कचहरी के चक्कर भी काटने पड़े। दूसरी ओर सरकार से बहुत से निर्देश आते थे, जिनके कारण स्वायत्तता पर संकट मंडराने लगता था। पर वहां फैकल्टी जम कर विरोध करती थी। सरकार के निर्णयों के खिलाफ प्रशासन ने एक से ज्यादा बार लिखित असहमति व्यक्त की और वह मानी गई। दिल्ली विश्वविद्यालय में जो स्थिति हुई कि हर मुद्दे पर पीछे हटना पड़ा, वह स्वायत्तता के लिए अच्छा नहीं। स्वायत्त संस्थाएं अगर सोच-समझ कर निर्णय करती हैं, तो उनके सामने यह स्थिति नहीं आती। स्वायत्तता का यह भी मतलब नहीं कि संस्था अपने को खुदमुख्तार समझने लगे। लेकिन प्रतिवाद का अधिकार सबको है। 

जहां तक गुणवत्ता का सवाल है, वह किसी एक भाषा की बपौती नहीं है। मैं पुरुषोत्तम अग्रवाल की दो बातों से सहमत हूं कि इस तरह की संस्थाओं में खुली चर्चा होनी चाहिए। गुपचुप चर्चा संस्था तो संस्था, सरकार के गले की हड््डी बन जाती है, जैसे सीसैट में अंकों का विभाजन। किसी भी उच्च स्तरीय प्रतियोगिता में एक ही प्रश्नपत्र का तैंतीस प्रतिशत अंकों का मूल्य मेधावी से मेधावी बच्चों के कैरियर को बर्बाद कर सकता है। यह बच्चों की सामर्थ्य को कुचलने से कम नहीं। 

जब अंगरेजी के पक्ष में यह अहितकारी निर्णय किया गया था, मैंने पुरुषोत्तमजी से फोन पर कहा भी था। उसका जवाब उनके इस लेख में मिला कि जिस रूप में सीसैट आज है उसके एक-एक ब्योरे से आयोग का हर सदस्य सहमत रहा हो, ऐसा नहीं है। दूसरी बात जान कर दुख हुआ कि सीसैट का हिंदी अनुवाद मशीनी होता है। उसे समझना खुदा के बस का भी नहीं। सीसैट के विरोध का कारण यह समझना कि हिंदी माध्यम के छात्र कड़ी मेहनत से कतराते हैं, ठीक नहीं। यह विरोध सीसैट का उतना नहीं है, जितना अंगरेजी लादने का। उनको मालूम है कि हिंदी माध्यम के छात्र सिविल सेवाओं की प्रतियोगिताओं में उच्चतर दर्जा पाते रहे हैं। पहले पांच दर्जे तक पा चुके हैं। 

सीसैट की जरूरत पहले नहीं थी। अंगरेजी माध्यम से पढ़े बच्चे गुणवत्ता का भंडार समझे जाते थे। जब हिंदी समेत भारतीय भाषाओं का सवाल सामने आया, तो सीसैट को गुणवत्ता से जोड़ दिया गया। मेरा आशय यह नहीं कि सीसैट जमीनी भाषा से जुड़े लोगों को छांटने का माध्यम है। अगर उसी भाषा में सीसैट तैयार हो, जो माध्यम प्रत्याशी लेता है, तो गुणवत्ता बढ़ेगी। जहां विज्ञान के विषयों का सवाल है, वह तो सबके लिए समान है, पर भाषा या समाजशास्त्रीय विषयों में भाषा का महत्त्व बढ़ जाता है। वैसे तर्क यह भी हो सकता है कि अगर अंगरेजी का तैंतीस प्रतिशत हो सकता है, तो दूसरी भाषाओं का क्यों नहीं? अंगरेजी कितने प्रतिशत लोग जानते हैं? 

चूंकि आजादी के बाद सरकारों के प्रयत्नों से अंगरेजी का वर्चस्व हो गया है, दूसरी भाषाओं की स्थिति गड़बड़ा गई। सीसैट का विरोध नहीं, पर भाषा का प्रयोग छंटाई करने का आभास दे, तो विरोध होना स्वाभाविक है। बेहतर होता सीसैट में सब प्रश्नों की अंक योजना समान होती। 

सरकार संशय में है कि वह क्या करे। यूपीएससी ने परीक्षा की तारीख बढ़ाने से मना कर दिया। वर्मा समिति की रिपोर्ट आ गई है। पहले कानून-व्यवस्था की बात की जाती थी, अब वह नारा खतरे में है। पहले भी हिंदी के मसले पर सरकार ने कदम पीछे खींचा था। दरअसल, गुणवत्ता का सवाल इतना बड़ा नहीं, जितना हीनता का है।


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