मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
कभी-कभार: नीरंध्र युवा सामाजिकता PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Sunday, 10 August 2014 09:52

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : इधर युवा कवियों के एक काव्यपाठ को सुनने का सुयोग हुआ। पांच कवि थे और उनकी लगभग पंद्रह कविताएं थीं। प्रभाव यह पड़ा कि इस समय बहुत से युवा कवि हमारी भाषा के सामाजिक-नैतिक अंत:करण की तरह मुखर हैं। पहले निजी और सामाजिक के बीच जो द्वंद्व या तनाव था वह युवा कविता में मौजूद नहीं है: सामाजिक ही अब निजी है। समाज में कवि का अंत:करण की तरह बोलना समाज की एक जरूरी लोकतांत्रिक अपेक्षा है, भले कई बार यह लग सकता है कि ऐसी अपेक्षा हमारा साहित्य-विमुख समाज कर स्पष्टत: नहीं रहा है, पर वह वांछनीय है। जो हो रहा है उसके पीछे जो छिपा है या नहीं हो रहा है उस पर युवा कवि की तीखी नजर है, यह अच्छा है। 

जब एक युवा कवि से इस सिलसिले में बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि आज का कवि, इंटरनेट के जमाने में और उसके कारण, जानता बहुत है, पर सीधा अनुभव उसके पास कम है। इस कविता के अधिकांश में अगर निजी स्मृतियां-छवियां-अंतर्ध्वनियां आदि कम हैं, तो यह शायद इसी कारण है: वह दुनिया पर तो टिप्पणी कर सकता है, उसे कविता में रिपोर्ट कर सकता है, पर उसकी अपनी अंतरंग और आंतरिक दुनिया उसमें कम ही आ पाती है। कई बार यह संदेह हो सकता है कि ऐसी दुनिया लगभग है ही नहीं। इस अनुपस्थिति से कोई बेचैनी या कमी कवियों को महसूस होती है, इसका बहुत कम साक्ष्य कविता में मिलता है, वक्तव्यों में अलबत्ता उसके रेशे नजर आ सकते हैं। 

बाजार, लोकतंत्र, राजनीति, संचार, सामाजिक तनाव और अभाव आदि को लेकर इस कविता में मुखर संवेदनशीलता और सजगता है। पर यह संवेदनशीलता अक्सर जल्दबाजी में फैसला देती रहती है: वह हड़बड़ी में इस कदर क्यों है, यह समझना थोड़ा कठिन है। इस हड़बड़ी में बहुत सारे सामान्यीकरणों और सामान्यीकृत छवियों-बिंबों का सहारा लिया जाता है। कविता की दुनिया की अपनी नैतिकता है: कविता का काम दूसरों को अदालत में खड़ा करना या उन पर फैसला देना नहीं है। वह जो हो रहा है उसका बखान तो करती है, उसकी विसंगतियों-विडंबनाओं को भी उभारती है, पर सच्चाई में अपनी हिस्सेदारी और जो हो रहा है उसमें अपनी जिम्मेदारी को भी शामिल करती है। ऐसी हिस्सेदारी इस कविता में कम दिखाई-सुनाई देती है। भाषा की अधिक लयात्मक और जटिल प्रक्रिया से ही कविता बनती है: इधर की कविता लगातार वक्तव्य-प्रधान होती गई है और उसमें भाषा का ऐसा रचाव या विन्यास कम ही है। 

कविता अखबार नहीं होती। कहा गया है कि वह ऐसी खबर है, जो खबर बनी रहती है और अखबार की खबरों की तरह बासी नहीं पड़ती। कविता विपक्ष में रहे यह साहित्य, भाषा और लोकतंत्र सभी के लिए अच्छा है। पर उसे अपने पर संदेह भी कर सकना चाहिए, अपने अंतरंग मर्म का हमसे साझा भी करना चाहिए। हड़बड़ी, मुखरता आदि की जगह है, पर वे धीरज, मर्म, हिस्सेदारी और जिम्मेदारी, शिल्पगत सुघरता और श्रम को अपदस्थ नहीं कर सकते, न ही उन्हें अप्रासंगिक बना सकते हैं। 


‘क्या आकाश में काफी जगह है?’

इधर गाजा पट्टी पर इजराइल द्वारा बमबारी में एक हजार से अधिक फिलस्तीनी नागरिकों के मारे जाने की खबर है: हमारे समय में हिंसा रुकने के बजाय लगातार फैल रही है। मैं इराकी कवयित्री दुन्या मिखैल की न्यू डायरेक्शंस द्वारा अरबी और अंगरेजी अनुवाद में प्रकाशित पुस्तक पढ़ रहा हूं: ‘डायरी ऑफ ए वेव आउटसाइड द सी’। डायरी की तरह लिखी गई इस अद्भुत लंबी कविता में पंक्तियां हैं:

क्या आकाश में काफी जगह थी पक्षियों के लिए 

जब हवाई जहाजों ने हमारे सपनों पर हमला किया

और हर चीज को चूर-चूर कर डाला? 

वह एक रात थी अतिरेकों की।

निवासियों में से कुछ सो नहीं पाए,

जबकि दूसरे हमेशा के लिए सो गए।

और जब अंधेरे में रोशनी के चिकत्ते बढ़ गए

उड़ती चीजों का दिमाग फिर गया।

कोई नहीं कह सकता था कि पक्षी बदल गए जहाजों में

या कि जहाज बदल गए धधकते पक्षियों में।

वे कहती हैं:

अपने समय में हमने हर सितारे के लिए जगह बनाई थी

और हमारे मृतक कब्रों के बिना हैं। 

उसमें एक मार्मिक इंदराज है:

मौत हमेशा हमारे लिए तरसती है।

वह महाद्वीपों के पार से आती है।

वह बड़ी दूरियां पार करती है अपने हाथों में आग की टोकनी लिए हुए।

वह हमें खेलने के


लिए देती है आग की गेंदें

जब तक कि हम धूप का अर्थ भूल न जाएं! 

दुन्या को अपनी इस लंबी कविता के एक अंश के प्रकाशन के बाद इस कदर तंग किया गया था कि उन्हें इराक छोड़ कर अमेरिका में बसना पड़ा है। कविता का समापन उन्होंने अमेरिका में ही किया। समापन के पहले की कुछ पंक्तियां हैं:

बहुत बड़ी राहत है कि मेरी बेटी

खतरे से बहुत दूर है

लाशों की तरह के बादलों से 

अपहर्ताओं के मुखौटों से

पासपोर्ट दफ्तरों की लंबी कतारों से

कटी हुई अंगुलियों से रेत में


अंगरेजी में कालिदास

पेंगुइन ने हाल ही में मेरे पास अपने दो नए प्रकाशन भेजे: कालिदास के ‘कुमारसंभवम्’ और ‘मालविकाग्निमित्रम्’ के अंगरेजी अनुवाद। पहली पुस्तक हैंक हीफेट्ज का ‘द ओरिजिन ऑफ द यंग गाड’ उपशीर्षक से किया अनुवाद है, जो 1990 में प्रकाशन के बाद बहुप्रशंसित हुआ था। भूमिका में यह स्पष्ट किया गया है, भले इस कविता की कीर्ति धर्मनिरपेक्ष होने की है, उसका ऐंद्रिक रहस्यवाद से संबंध है, आत्मनिषेध के रहस्यवाद के बिल्कुल विरुद्ध। कालिदास दृश्य संसार के सौंदर्य को उद्बुद्ध करते हैं। अनुवाद आज की अंगरेजी में है और उसमें, सौभाग्य से, व्यर्थ की प्राचीनता को पुनरवतरित करने के बजाय इस महान कविता को आज की कविता की तरह लगने देने की कोशिश की गई है। 

‘मालविकाग्निमित्रम्’ का अंगरेजी अनुवाद श्रीनिवास रेड्डी ने किया है, जो अनेक वर्ष अमेरिका में रहने के बाद इन दिनों आइआइटी अमदाबाद से संबद्ध हैं। इससे पहले उन्होंने एक तेलुगू महाकाव्य का भी अंगरेजी में अनुवाद किया है। पुस्तक का उपशीर्षक है ‘द डांसर ऐंड दि किंग’। इस नाटक का एक आकर्षण इस बात में है कि उसके चरित्र नश्वर, वास्तविक लोग हैं: वे दैवी या आधिभौतिक चरित्र नहीं हैं। शास्त्रीय साहित्य की अंगरेजी में अनुवाद की परंपरा पर लगभग एक सदी से भी ज्यादा विक्टोरियन मुहावरे हावी रहे हैं और उसे आधुनिक पाठक के लिए सहज और समकालीन बनाने के बजाय उनमें प्राचीनता का वैभव उकसाने की चेष्टा की जाती रही है। यह नया अनुवाद आज की भाषा और मुहावरे में आज के पाठकों के लिए है और उस पर प्राचीनता का व्यर्थ बोझ नहीं है। 

यह बात नोट करने की है कि पश्चिम में तो हमारे ही गौरवग्रंथों के नए और आधुनिक अनुवाद हो रहे हैं, पर हमारे यहां परंपरा अवरुद्ध-सी है। यह याद करना कठिन है कि कालिदास का पिछला अच्छा और पठनीय अनुवाद हिंदी में कब हुआ था। जिस जातीय स्मृति के लगभग लोप हो जाने पर हम जैसे धवलकेशी लोग विलाप करते रहे हैं, उसका यह एक अच्छा प्रमाण है। पश्चिम में तो अपने आधुनिक क्लैसिकों के नए-नए अनुवाद करने की परंपरा है, जैसे कि काफ्का, रिल्के आदि के। टाल्स्टाय, दोस्तोवस्की आदि के नए अनुवाद हुए हैं। हमारे यहां ऐसा नहीं होता। 

हमने जब दशकों पहले उज्जैन में कालिदास अकादेमी स्थापित की थी, जिसे कई बरस बहुत सूझबूझ और कल्पनाशीलता से डॉ. कमलेशदत्त त्रिपाठी ने संचालित किया था, तो उसकी एक सभा में याद आता है कि शमशेरजी ने (जो उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ पर थे) यह सवाल उठाया था कि आधुनिक मुहावरे में हमारे पास कालिदास और अन्य महान संस्कृत-प्राकृत कवियों के अनुवाद क्यों नहीं हैं? संस्कृत की जगह वैसे ही सिकुड़ती गई है और उसमें भी आधुनिक वृत्ति पर शास्त्रीय मानस रखने वाले लोग कम से कमतर होते जाते हैं। हिंदी में संस्कृत जानने वाले लेखक गिने-चुने ही हैं। हम अपने को एक महान और उजले उत्तराधिकार से स्वयं ही वंचित कर रहे हैं और हमें इसे लेकर कोई क्लेश या पछतावा नहीं होता!


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?