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प्रसंग: प्रेमचंद साहित्य में आदिवासी PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 09:51

गंगा सहाय मीणा

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : प्रेमचंद का मूल्यांकन करते वक्त उनके आलोचक यह कहना नहीं भूलते कि उनके साहित्य में समाज के हर तबके को प्रतिनिधित्व मिला है। स्त्री और दलित संदर्भ को लेकर इस बारे में काफी लिखा-कहा गया है। विकलांग, विधवा, वेश्या, वृद्ध से लेकर विविध समस्याओं पर प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई है। ऐसे में यह जानना भी दिलचस्प होगा कि प्रेमचंद आदिवासियों के बारे में क्या सोचते थे। उन्होंने आदिवासियों के बारे में कुछ लिखा भी है या नहीं, इस सवाल पर जैसे ही हम बात या शोध करना चाहते हैं, उनके प्रशंसक शोर मचाने लगते हैं कि प्रेमचंद आदिवासियों के बारे में क्यों लिखते, जबकि वे आदिवासियों के इलाके में रहे ही नहीं। आदिवासी विमर्श के दौर में प्रेमचंद साहित्य की आदिवासी संदर्भ में पड़ताल गैर-जरूरी नहीं लगनी चाहिए। 

ऐसा नहीं कि प्रेमचंद आदिवासियों के आसपास रहे ही नहीं। उनकी पहली तैनाती चुनार के पास एक मिशनरी स्कूल में हुई। इस इलाके में गोंड आदिवासी रहते हैं। इसके अलावा प्रेमचंद के कार्यक्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक दर्जन से अधिक आदिवासी समुदाय रहते हैं। जनगणना विभाग और आदिवासी मंत्रालय के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पंद्रह आदिवासी समुदाय और इनके उप-समुदाय रहते हैं, जिनमें प्रमुख हैं- भोटिया, जौनसारी, राजी, थारू, गोंड, खैरवाड़, बैगा, भूइया आदि। इन सब पर न प्रेमचंद ने ध्यान दिया और न ही उनके बाद के रचनाकारों ने। पूरी कहानी का सबसे विडंबनापूर्ण पक्ष आदिवासियों से शेष समाज का अपरिचय ही है। 

प्रेमचंद किसानों के लेखक माने जाते हैं और किसानों की सबसे बड़ी समस्या जमीन से संबंधित रही है। उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में चले बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ आंदोलन के बाद मजबूर होकर अंगरेजी सरकार ने छोटा नागपुर काश्तकारी कानून (1908) बनाया, जिसके तहत आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते। इस कानून का विस्तार दलितों और पिछड़ों के संदर्भ में भी किया गया, यानी उनकी जमीन अपने समुदाय के भीतर ही बेची या हस्तांतरित की जा सकती है। इस कानून का मसविदा ईसाई मिशनरी फादर हाफमैन द्वारा तैयार किया गया था। 

यह आश्चर्यजनक है कि गांव और किसानों पर लिखने वाले भारत के सबसे महान लेखक ने इस कानून का कोई नोटिस नहीं लिया। उनके समय में घटित हो रही इतनी बड़ी घटना और उसकी पृष्ठभूमि के रूप में रही आदिवासी आंदोलनों की परंपरा पर उनका ध्यान नहीं गया। 

समझ में नहीं आता कि तीन सौ से अधिक कहानियां और दर्जन भर से ऊपर उपन्यास लिखने वाला, आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़ा लेखक जिसके देश-विदेश की समस्याओं पर हजार से अधिक लेख हों, कैसे देश की आबादी के एक बड़े हिस्से यानी आदिवासी समाज की उपेक्षा कर सकता है? हमें राजनीति और इतिहास की किताबों में बचपन से पढ़ाया जाता है कि अंगरेज देश का कच्चा माल यानी प्राकृतिक संसाधन यहां से ले जा रहे थे और महंगे दामों में तैयार माल बेच कर देश का शोषण कर रहे थे। यह आश्चर्यजनक है कि किसी के जेहन में यह सवाल नहीं आता कि ये प्राकृतिक संसाधन किसकी जमीन पर थे? इनके दोहन से देश के कौन-से तबके का जीवन प्रभावित हो रहा था? अंगरेजों द्वारा चलाई गई रेलगाड़ी और ‘विकास’ की अन्य योजनाओं के लिए कोयला, बॉक्साइट, लौह अयस्क जैसे प्राकृतिक संसाधन कहां से आ रहे थे? 

आदिवासी क्षेत्रों में हो रहे इस बाहरी दखल के खिलाफ आदिवासियों ने शुरू से प्रतिरोध किया है। पूरी उन्नीसवीं सदी आदिवासी विद्रोहों की गवाह है। कोल विद्रोह, संथाल विद्रोह (हूल) और बिरसा मुंडा का आंदोलन (उलगुलान) इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। समाज के लगभग हर मुद्दे पर लिखने वाले प्रेमचंद इस पर खामोश क्यों हैं? 

एक बात और, बिरसा मुंडा और प्रेमचंद समकालीन थे। बिरसा का जन्म 1875 में हुआ था और प्रेमचंद का 1880 में। यानी उलगुलान के समय प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया था। उसी दौरान छोटा नागपुर काश्तकारी कानून लागू हुआ। तभी उनका मशहूर कहानी संग्रह ‘सोज़े-वतन’ आया। मगर देश ही नहीं, विदेश की छोटी-छोटी घटनाओं पर लिखने वाला ‘कलम का सिपाही’ न जाने क्यों अपने समकालीन परिदृश्य के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से-


आदिवासी और उसके आंदोलनों से अपरिचित रह गया!

प्रेमचंद साहित्य में दो-एक जगह आदिवासी प्रसंग मिलते भी हैं। एक प्रसंग है ‘गोदान’ उपन्यास का और दूसरा ‘सद्गति’ कहानी का। गोदान में राय साहब के यहां चल रहे उत्सव के क्रम में जब राय साहब और उनके दोस्त शिकार खेलने के लिए तीन टोलियां बनाते हैं तो मेहता और मालती की टोली शिकार ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जंगल के एक ऐसे हिस्से में पहुंच जाती है, जहां वे एक आदिवासी लड़की से मिलते हैं। प्रेमचंद ने ‘बाहरी’ नजरिए से उस आदिवासी लड़की का चित्रण किया है। वे पहले उसे कुरूप साबित करते हैं, फिर उसके मांसल शरीर का वर्णन करते हैं। बाहरी समाज में स्त्री या तो दया की पात्र हो सकती है या श्रद्धा की। दोस्ती की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं। 

‘गोदान’ को प्रेमचंद की क्रांतिकारिता के लिए याद किया जाता है। इसमें उन्होंने अन्य प्रसंगों के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों के संदर्भ में भी मेहता-मालती, गोबर-झुनिया, मातादीन-सिलिया के रूप में बिना विवाह के साथ रहने के अपने समय से आगे के प्रसंगों और पात्रों की रचना की है। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद ये प्रसंग अपने समय के हिसाब से क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं। उन्हीं प्रेमचंद का आदिवासी लड़की के प्रति नजरिया निराश करने वाला है। मेहता पूरे प्रसंग में आदिवासी लड़की के ‘अंगों का विलास’ देखते रहते हैं और मालती से डांट खाने के बाद आते समय कहते हैं, ‘अब मुझे आज्ञा दो बहन’। 

सवाल सिर्फ मेहता का नहीं है, स्वयं लेखक की भाषा मध्यवर्गीय हिंदूवादी नैतिकता से मुक्त नहीं है, जो स्त्री को या तो दया की दृष्टि से देखती है या श्रद्धा की। प्रेमचंद पूरे प्रसंग में उस आदिवासी लड़की को नाम भी नहीं देते और उसे ‘गंवारिन’ बनाने की कोशिश करते हैं। 

‘सद्गति’ कहानी आदिवासी संदर्भ में प्रेमचंद के लेखन में आशा की किरण की तरह देखी जा सकती है। आमतौर पर ‘सद्गति’ दलित प्रतिरोध की कहानी के रूप में पढ़ी जाती है, जबकि इसमें दलित प्रतिरोध कहीं भी नहीं है। कहानी का नायक भले दुखी चमार हो, लेकिन कहानी में विद्रोही चेतना से लैस एकमात्र पात्र है चिखुरी गोंड़। वह दुखी को पंडित घासीराम के शोषण से बचाने की हर संभव कोशिश करता है, लेकिन धर्मसत्ता के आत्मसातीकरण से उपजे भय के कारण दुखी उससे निकल नहीं पाता और त्रासद मौत का शिकार होता है। उसकी मौत के बाद चमरौने में जाकर वही दलितों को इस अन्याय की खबर देता और आंदोलित करने की कोशिश करता है, ‘खबरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे।’ 

इसके बाद पुलिस के भय से कोई भी दलित लाश उठाने नहीं जाता। इस तरह यह कहानी हिंदू धार्मिक संस्कारों से मुक्त एक गोंड़ के माध्यम से ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई की कहानी है, जिसमें दलित और आदिवासी एकता की जरूरत की ओर संकेत भी है। 

मुमकिन है कि ढूंढ़ने पर प्रेमचंद साहित्य में कुछ आदिवासी प्रसंग और मिल जाएं। लेकिन यह निराशाजनक है कि प्रेमचंद अपनी किसी रचना में आदिवासी पात्र या समस्या को केंद्रीय नहीं बनाते। उनके लेखन के दायरे को देखते हुए उपर्युक्त प्रसंग गौण ही कहे जाएंगे। निष्कर्षत: आदिवासियों की उपेक्षा के सवाल पर प्रेमचंद के आलोचकों को पूज्यभाव से मुक्त होकर प्रेमचंद साहित्य का मूल्यांकन करना चाहिए।


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