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पुस्तकायन: लोकरंगी कथा-रस PDF Print E-mail
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Sunday, 10 August 2014 09:47

सुबोध कुमार श्रीवास्तव

जनसत्ता 10 अगस्त, 2014 : एकांत श्रीवास्तव के उपन्यास पानी भीतर फूल की आंचलिकता लुभाती है, अपनी ओर खींचती है। यह कृति छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल की मिट्टी की खुशबू से महमह है। उपन्यास का ‘कथा-इलाका’ आज का अशांत छत्तीसगढ़ नहीं है। पर ‘सतबहनी’ के प्रसंग से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ‘पानी भीतर फूल’ का काल आज से चालीस-पैंतालीस साल पहले का है। 

इस उपन्यास को पढ़ने के बाद किसी की भी इच्छा ‘कुसुमपानी’ गांव देखने की हो सकती है। निताई, श्यामली, बैशाखू, मोंगरा, रामबाई, मरही दाई, सोरदहिन, केवड़ा, भगोली, घेंचकटा (मोहन) आदि पात्रों से मिलने की हो सकती है। उपन्यास की खूबी यही है कि इसके पात्रों के साथ पाठक का अपनापा-सा हो जाता है, वे गैर नहीं लगते। 

इस गांव में नवमी के दिन गांव-भोज की परंपरा है और हर परिवार का कुछ न कुछ योगदान है- ‘सब मिल-जुल बनाते और मिल-जुल कर खाते। स्त्री-पुरुष एक साथ परोसते और एक साथ पंगत में बैठते।’ कुसुमपानी गांव में गजब का भाईचारा है, परस्पर प्रगाढ़ प्रेम है- ‘ऐसे गांव-भोज के अवसर पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई बहुत बड़ा कुनबा हो, कुटुंब हो, जो बहुत दिनों के बाद इकट्ठा हुआ हो।’ या ‘यहां कोई मेहमान नहीं होता। सभी मेजबान होते। जो मेहमान बन कर आते, वे भी जल्द मेजबान बन जाते। इस प्रकार सबको मेहमानी और मेजबानी का मिला-जुला आनंद आता।’ यह एक ऐसा गांव है, जहां सभी लोग भले हैं। कोई खलनायक नहीं। 

उपन्यास निताई-श्यामली के सुखद ग्रामीण दांपत्य जीवन के इर्दगिर्द घूमता है, जो अभावों में भी सुख तलाशते रहते और दूसरों के दुख को बांटने का प्रयत्न करते हैं। ‘सुनो, इस बार तनख्वाह मिलेगी तो मेरी पायल में घुंघरु लगवा देना।’ उपन्यास के अन्य पात्र भी ऐसी या इससे भी गई-बीती स्थिति के हैं, लेकिन वे अभावों के बीच भी निराश नहीं हैं, सुख की तलाश कर ही लेते हैं। छोटे से छोटा उत्सव उनका बड़ा सुख है, जो उनकी दुनिया को खूबसूरत बना देता है। निताई और बैशाखू का घटोल तालाब में मछली पकड़ने का सुख, मरही दाई का कोतरा मछली मिल जाने का सुख, अमराई में श्यामली और निताई का गरती (पका हुआ) आम चूसने का सुख, चंडी डोंगरी (देवी की पहाड़ी) पर चढ़ने, वहां पूजापाठ करने और पूरा दिन बिता देने का सुख, लखना गांव की मड़ई (छोटा मेला) में श्यामली और मोंगरा का रइचूली (उड़नखटोला) में झूलने का सुख और झूले में न बैठते हुए भी तेज उड़नखटोले को देख कर निताई और बैशाखू का यह सुख कि वे भी उड़ रहे हैं- सभी कुछ तो अद्भुत है। मड़ई (मेले) का ऐसा सशक्त वास्तविक अंकन कि ऐसा लगने लगता है जैसे- ‘संसार जैसे लखना गांव में सिमट कर रह गया था।’ 

पुरुष और स्त्री पात्रों के प्रति ही नहीं, पशु-पक्षियों के प्रति भी उपन्यासकार बेहद सजग है। मिट््ठू, झब्बू (कुत्ता), श्यामा गाय, यहां तक कि बत्तखें भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। इनके बिना गांव का जीवन अधूरा है। आम पाठकों को हरदुलिया, बाम्हन चिरई, भरदा चिरई, परमुटकी, फुलचुहकी यानी चिड़ियों के नामों से भी एकांत श्रीवास्तव परिचित कराते चलते हैं, जिनके नाम शायद युवा पीढ़ी के लिए अबूझ ही होंगे। पर्यावरण के प्रति भी उपन्यास के प्रमुख पात्र निताई-श्यामली की सजगता यह संकेत देती है कि प्रकृति के साथ समझौता कर ही एक स्वच्छ और सभ्य जीवन जिया जा सकता है। 

एकांत श्रीवास्तव लिखते हैं- ‘प्रकृति मनुष्य को संस्कार देती है। उसके अंत:करण में निराकार को आकार देती है। मनुष्य के क्रोध में बादलों की गर्जना सुनाई देती है और प्रेम में ‘पीपल पात सरिस मन’ डोलने लगता है। प्रकृति मनुष्य के मनोभावों को रंग और आकार देकर चित्रित करती है।’ प्रकृति के प्रति लेखक का लगाव और झुकाव मुग्ध करता है। 

एकांत श्रीवास्तव की पहचान पहले समर्थ कवि की है, इसलिए ‘पानी भीतर फूल’ की भाषा में जो कोमल प्रवाह है, वह कई बार कविता-सा आनंद देता है- ‘जिंदगी में हर चीज की एक जगह बनती जाती है- फिर चाहे वह कोई वस्तु हो, मनुष्य या पशु-पक्षी। ये जगहें जब रिक्त होती हैं तो तकलीफ देती हैं। सूर्य के डूब जाने पर आकाश रिक्त हो जाता है- तब तारे उसकी जगह भरने चले आते हैं। कौन आता है हर बार किसी की खाली जगह भरने! क्या खाली पिंजरे में मिट्ठू की जगह कोई दूसरा मिट्ठू आएगा!’ 

‘तट पर बचपन की रेत थी और खेल-खेल का


घरौंदा था। घरौंदा अब सचमुच के घर में बदल गया था- और घर- कभी कोई खेल नहीं था। घरौंदा टूटता तो दोबारा बन जाता था। घर टूटता तो दोबारा नहीं बन पाता था।’ 

‘गांव का समाज एक फूल था, जो मेले में अपनी सारी पंखुरियां खोल देता था।’

लेखक के पास आंचलिक बोली के भूले-बिसरे शब्दों का भंडार है। झिपारी, खपच्ची, पैरा, छानी, कंडिल, फोरन, औटाना, कोटना, बरदी, सुखीयार, अंगाकार रोटी, जांता, कउहा, धुटी, कोठार, तसमई, टीकाटीक दोपहर, गरती, भुइयां, रइचूली, नूनचरा आम का अचार, डोंगरी, कांचना, बनी (मजूरी), मांदी (भोज), रांचर, कोलिहा (लोमड़ी), खुमरी, पहटिया-बरदिहा, बांटी, नार (बेल), गुंगुवाना, जेवर (साल में एक बार दिए जाने वाला धान), हुमरना, निझांव (खाली समय), ब्यारा, पठेंवा, ढेलवानी, रूख (पेड़), गार (अंडे), दंगर-दंगर (जल्दी-जल्दी), मन (देशी मदिरा), आदि सैकड़ों ऐसे शब्द हैं, जिनका प्रयोग हमारी दादी-नानी करती रही होंगी, लेकिन आज ये हमारी बोलचाल में लगभग लापता हैं। संभव है, कुछ शब्द शब्दकोश में भी ढूंढ़े न मिलें। 

उपन्यास में सतबहनी यानी सात बहनों की प्रेतकथा भी है, जो सन सड़सठ के अकाल में भूख से मरी थीं और जलाशय के किनारे लगे नीम के पेड़ पर रहती हैं। यह वही जलाशय है, जिसमें निताई लाल फूल तोड़ने के लिए उतरता है। आज भी गांवों में लोग भूत-प्रेत, चुड़ैल, पिशाच, मसान आदि पर विश्वास करते हैं। भले पढ़े-लिखे लोग इसे न मानते हों। खोखमा का लाल फूल लेकर निताई मौत के मुंह से बाहर निकल आता है। इस पर गांव के लोगों की प्रतिक्रिया मरही दाई के शब्दों में यही होगी- ‘ये भली चुड़ैलें हैं। ये सामान्य तौर पर किसी का कुछ अहित नहीं करती थीं और भले लोगों को सताती नहीं थीं। लेकिन दुष्टों और दुर्जनों को छोड़ती भी नहीं थीं।’ निताई चूंकि भला मानुष था, उसका अहित नहीं हुआ। वह तालाब में डूबता नहीं, बल्कि बच कर निकल आता है।

लेकिन निताई के बचे रहने की एक वजह यह भी हो सकती है और संभव है, उपन्यासकार की मंशा भी यही रही हो कि अगर पत्नी या प्रेयसी के प्रति सच्चा और पवित्र प्रेम है तो हर बाधा पर विजय प्राप्त की जा सकती है। 

निताई-श्यामली के प्रगाढ़ दांपत्य जीवन के अलावा जो अन्य कथाएं इस उपन्यास में पिरोई गई हैं, वे भी पाठक को अभिभूत करती हैं और कृति की खूबसूरती में इजाफा भी। घेंचकटा-रामबाई की कहानी पाठक को न सिर्फ भावुक कर देती, बल्कि यह अहसास भी कराती है कि पुरुष भी अपने बचपन के पहले प्यार को उसी शिद्दत से याद रखता है जैसे कि एक स्त्री। बचपन में हाथ आए रामबाई के दो फूल बने गुलाबी रिबन को घेंचकटा हमेशा अपने साथ रखता है। इस निशानी के सहारे ही वह अपना फक्कड़ जीवन जीता है, लेकिन रामबाई के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता। कथा मार्मिक है। इसी तरह सब्जी वाली केवड़ा और भगोली मिस्त्री की नटखट-सी प्रेमकथा का दुखांत पाठकों को विचलित करता है। कोई भी कथा कई उपकथाओं के साथ ही आगे बढ़ती है और इस उपन्यास में इस कला को बखूबी साधा गया है। 

निताई-श्यामली का श्यामली की सहेली वसंता के गांव हथबंध जाना और सालों बाद बचपन की दो सहेलियों का भावुक मिलन, बचपन की स्मृतियां, कुलेश्वर महादेव के दर्शन के बहाने वनभोज, कोंदा का जंगल में भटक जाना और उसकी खोज, सुखरू धीवर का साधु होकर घर से चले जाना- ये छोटे-छोटे किस्से ही तो ‘पानी भीतर फूल’ को समृद्ध करते हैं। कुल मिला कर ‘पानी भीतर फूल’ अपने आस्वाद और पठनीयता में ही महत्त्वपूर्ण नहीं, बल्कि अपनी काव्यात्मक संवेदना और सर्वथा अलग शिल्प से ध्यान आकृष्ट करता है। 

पानी भीतर फूल: एकांत श्रीवास्तव; वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए। 


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