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घपले की खान PDF Print E-mail
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Saturday, 09 August 2014 12:13

जनसत्ता 9 अगस्त, 2014 : अनियमितता की खबरें अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों से आती रही हैं। लेकिन नियम-कायदों का उल्लंघन और भ्रष्टाचार जितना खनन उद्योग में दिखाई देता है उतना किसी और क्षेत्र में नहीं। राजनीति और नौकरशाही के भ्रष्ट तत्त्वों और माफिया के गठजोड़ से अवैध खनन का जो जाल फैला है, उसने जहां एक तरफ देश को अरबों रुपए के राजस्व का नुकसान पहुंचाया है, लोकतांत्रिक राज-काज की प्रक्रियाओं को ध्वस्त किया है, वहीं पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। यह देश के किसी एक हिस्से में नहीं, खनिज-समृद्ध सभी राज्यों में हुआ है। अवैध खनन की पड़ताल के लिए न्यायमूर्ति एमबी शाह की अध्यक्षता में बने आयोग की रिपोर्ट ने इसके किस्से तथ्यों सहित विस्तार से बयान किए हैं। लोकसभा में पेश की जा चुकी यह रिपोर्ट बताती है कि अवैध खनन में छोटी और मझली इकाइयों के अलावा कई नामी-गिरामी कंपनियां भी शामिल रही हैं। ओड़िशा में खनन माफिया ने कई बड़े अधिकारियों से सांठगांठ करके वन संरक्षण अधिनियम और पर्यावरणीय मंजूरी के नियमों की धज्जियां उड़ार्इं। आयोग को ओड़िशा में लौह अयस्क और मैगनीज के गैर-कानूनी खनन की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। 

आयोग ने पाया कि ओड़िशा में कई जगह लीज की अवधि पूरी होने के बाद भी खनन जारी रहा, तो कई जगह अतिक्रमण करके यानी निर्धारित क्षेत्र से ज्यादा इलाके में खनन होता रहा है। इस सब में शामिल कंपनियों ने गलत तथ्य पेश किए और हर तरह की कर-चोरी की। यही हाल झारखंड का भी है, जहां बाईस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के खनिज अवैध रूप से निकाले गए। शाह आयोग की रिपोर्ट के हवाले से भारतीय जनता पार्टी ने ओड़िशा और झारखंड की सरकारों पर हमला बोला है। पर इस मामले में उसका भी दामन कम दागदार नहीं है। कर्नाटक में भाजपा सरकार के दौरान अवैध खनन के कैसे रिकार्ड कायम हुए, यह तब के लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े की विस्तृत जांच रिपोर्ट में आ चुका है। बेल्लारी के रेड्डी बंधु इसके प्रतीक बन गए, जो येदियुरप्पा सरकार में मंत्री थे। गोवा में अवैध खनन के लिए शाह आयोग ने न केवल वहां की पूर्व सरकार को दोषी ठहराया बल्कि पर्यावरण मंत्रालय को भी,


जो बराबर आंख मूंदे रहा। आयोग की रिपोर्ट कहती है कि यह गैर-कानूनी कारोबार बड़े अफसरों की नाक के नीचे चलता रहा है। लेकिन सत्तारूढ़ राजनीतिकों की मिलीभगत या उनके संरक्षण के बगैर यह नहीं हो सकता था। इस कुचक्र को देखते हुए सीबीआइ जांच होनी चाहिए। मोदी सरकार काले धन पर अंकुश लगाने का दम भरती है। लिहाजा, उसे आयोग की रिपोर्ट के मद्देनजर सीबीआइ जांच का आदेश देना चाहिए, पर केवल ओड़िशा नहीं, दूसरे राज्यों के मामलों में भी। 

अवैध खनन भ्रष्टाचार और नियम-कायदों को पलीता लगाने का बड़ा मामला तो है ही, यह स्थानीय आबादी के हितों और पर्यावरण से भी जुड़ा सवाल है। खनन कारोबारी चंद दिनों में मालामाल हो जाते हैं, मगर स्थानीय बाशिंदों को कुछ हासिल नहीं होता, उलटे बहुत-से लोगों को अपने घर-परिवेश से उजड़ना पड़ता है। इस्पात और कई दूसरे उद्योगों के लिए खनिज निकालना जरूरी है, पर ज्यादातर खनन पिछले बरसों में बिना लाइसेंस के हुआ और वह भी खनिजों को देश से बाहर भेजने के लिए। जाहिर है, कई राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र के संबंधित महकमे भी अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकते। खनिज के निर्यात पर पाबंदी लगनी चाहिए। खनिज संपदा की लूट ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि कुदरती संसाधन भावी पीढ़ियों के लिए बचेंगे या नहीं। लिहाजा, आयोग की रिपोर्ट के मद्देनजर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि ऐसी खनन नीति बनाई जाए जो खनिज संपदा को टिकाऊ विकास के नजरिए से देखे।


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