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भारतीय समाज की त्रिशंकु दशा PDF Print E-mail
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Saturday, 09 August 2014 12:09

एनके सिंह

 जनसत्ता 9 अगस्त, 2014 : कोलकाता की एक बयालीस वर्षीय महिला ने फेसबुक पर पंद्रह दिन की ‘चैट’ के बाद बीरभूम के रहने वाले

एक तैंतीस वर्षीय युवक को अपने घर बुलाया। जब वह महिला के घर पहुंचा तो महिला ने पाया कि फेसबुक पर दी गई तस्वीर से यह युवक अलग है, नाटा है और मोटा है। यानी बदसूरत है। युवक उससे शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डालने लगा। महिला के एतराज करने पर युवक ने उसकी चाकू मार कर हत्या कर दी। फेसबुक पर जिस रफ्तार से दोस्ती, शादी और तलाक हो रहे हैं उसे देख कर भारतीय समाज में एक लगातार फैलते विकार से अजीब खतरा पैदा हो गया है। लिव-इन रिलेशन और कुछ दिन बाद अनबन से उपजी दुर्भावना से साथ रहने वाली महिला का पुरुष-मित्र पर बलात्कार का मुकदमा भी उसी पतन की तार्किक परिणति है।

पश्चिमी मूल्य-बोध से प्रभावित भारतीय सत्तापक्ष और अभिजातवर्गीय सोच का एक और नमूना देखिए। अचानक बलात्कार की शिकायतें इतनी बढ़ गई हैं कि ऐसा लगने लगा है कि पुलिस के लिए कानून-व्यवस्था से बड़ा काम इन मामलों को निपटाना हो गया है। दस साल बाद कोई युवती अचानक थाने में आकर बताती है कि अमुक व्यक्ति जिसके साथ वह दस साल से रह रही है, उससे उसकी मर्जी के खिलाफ बलात्कार कर रहा है और अब शादी भी नहीं कर रहा है। 

प्रश्न यह है कि कब कोई रिश्ता स्त्री-पुरुष का अंतरंग संबंध बनता है जिसे कोई कानून बाधित नहीं कर सकता और समाज का कोई नैतिकता का दबाव प्रभावित नहीं कर सकता और कब यही रिश्ता बलात्कार बन जाता है यह समझना कानून के लिए मुश्किल हो जाता है। समाज इसलिए विरोध नहीं कर सकता क्योंकि एक तर्क के हिसाब से नारी-स्वातंत्र्य किसी समाज का मोहताज नहीं है। लेकिन वहीं जब उस नारी को अपेक्षित स्थान या धन नहीं मिलता तो वह इसे बलात्कार बताने लगती है और पुलिस इस ‘बलात्कारी’ को कानून के सामने लाने को मजबूर होती है। 

प्रश्न यह है कि क्यों समाज या पुलिस झेले उस नारी के ‘गलत फैसले’ का दंश जिसके तहत वह दस साल तक ‘लिव-इन’ रिलेशन में रहती है और ग्यारहवें साल उसे उस संबंध में बलात्कार नजर आने लगता है?   

लोकसभा में जब तेलुगू देशम पार्टी के एक सदस्य ने कहा कि महिलाएं कम कपड़े न पहनें और पहनावे में शालीनता बरतें भारतीय संस्कृति के मद्देनजर, तो मानो भूचाल आ गया। गोवा के एक मंत्री ने भी यही कहा तो पूरा बुद्धिजीवी वर्ग तन कर खड़ा हो गया। आखिर क्या वजह है कि इस पश्चिमी परिधान को ही भारत में लाकर नारी-स्वातंत्र्य को बहाल करने में बुद्धिजीवी वर्ग लगा हुआ है। क्या कन्या भ्रूण-हत्या पर रोक, लड़कियों की शिक्षा और परिवार में समानता का अधिकार अभी देश की प्राथमिकता नहीं हैं? भारतीय नारी को दुर्गा की शक्ति देने के लिए पश्चिमी परिधान ही क्यों जरूरी लगता है इन बुद्धिजीवियों को?   

जैसे हमने अपनी अर्थ-व्यवस्था को वैश्विक अर्थ-व्यवस्था (मूल रूप से पश्चिम के संपन्न राष्ट्रों से संचालित) में समेकित (इंटीग्रेट) किया है जिसके तहत 2007-08 में पैदा हुए अमेरिकी वित्तीय बाजार का संकट भारत की कृषि पर असर डालता है, शायद उसी तरह जाने-अनजाने में अपने मूल्य-बोध को भी पश्चिमी मूल्य-बोध में समाहित कर रहे हैं। या पूरे के पूरे पश्चिमी मूल्य-बोध को अंगीकार कर रहे हैं। कोलकाता की महिला को किसी युवक से महज पंद्रह दिन के ट्वीट से दोस्ती करने से रोकना पश्चिमी मूल्य-बोध के अनुसार नारी स्वातंत्र्य को बाधित करने वाला है। 

भारत में जो इसकी मुखालफत में आवाज उठाता है वह दकियानूसी, गैर-प्रगतिशील और नारी स्वतंत्रता न चाहने वाला करार दिया जाता है। हमारा कानून भी सहमति पर आधारित शारीरिक संबंधों की इजाजत देता है (अगर इसमें धन का आदान-प्रदान नहीं है) और यहां तक कि विवाहेतर संबंध भी तब तक मान्य है जब तक पत्नी इसकी शिकायत नहीं करती।     

यह सच है कि कोई भी समाज सभ्यता या संस्कृति की गति को रोक नहीं सकता, मात्र देर कर सकता है। पहनावे में बदलाव, संबंधों की गुणवत्ता में बदलाव, मूल्यों की जकड़ से बाहर होने की तड़प समाज को गतिशील बनाती है। मार्क्सवादी सिद्धांत की मानें तो आर्थिक संबंध भी कई बार सामाजिक संस्थाओं में बदलाव का बड़ा कारण बनते हैं। संयुक्त परिवार की संस्था में टूटन भी इसी कारण है। 

मूल्य-व्यवस्था भी बदलेगी ही। लेकिन जरूरी नहीं कि हम पश्चिमी मूल्य-व्यवस्था को ही अंगीकार करें। क्या हम एक नया मूल्य-ढांचा, जो हमारी पूर्व की व्यवस्था के आगे का पड़ाव हो, नहीं ला सकते? समस्या इसलिए पैदा हो रही है कि संप्रेषण के नए साधनों का इस्तेमाल कर हम पश्चिमी मूल्य व्यवस्था को अंगीकार करने में बेहद तेजी दिखा रहे हैं। 

कभी बैंकाक, रोम या पेरिस जाएं। आठ इंच की पैंट पहने लड़की की ओर विदेशी तो छोड़िए, उस देश का युवक भी ‘दूसरी नजरों से’ नहीं देखता, क्योंकि यह उसके यहां का सामान्य पहनावा है। भारत की समस्या यह है कि भारतीय महिलाओं ने अभी कोई दो दशक से (आमतौर पर) छह मीटर की साड़ी छोड़ी है और सलवार या जींस पर आई हैं। 

गांव का एक मजदूर जब शहर में


आता है तो उसकी मूल्य-चेतना और समझ पुरानी होती है जिसमें उसको यह बताया गया है कि शहरों में जो महिलाएं कम कपड़े पहनती हैं वे ‘अच्छी’ नहीं होतीं और कई बार ‘उपलब्ध’ होती हैं। लिहाजा, जब वह अकेले में या एकांत में या अपने समूह के साथ किसी महिला को कम कपड़े पहने, या सिगरेट या शराब पीते देखता है तो अपने मूल्य-बोध से आंकता है और जब उसे तात्कालिक ऐसा परिवेश नहीं मिलता जो नए मूल्य-बोध के अवरोध के रूप में होता है (जैसे सीसीटीवी, एअरपोर्ट के माहौल की दहशत या सिक्युरिटी गार्ड) तो उसे लगता है कि वह इस महिला के साथ कुछ कर सकता है। 

यही महिला अगर हवाई अड्डे से पांच सितारा होटल के एक सुप्रशिक्षित ड्राइवर की गाड़ी में बैठे तो उस पर शारीरिक हमले की गुंजाइश कम हो जाती है क्योंकि वह ड्राइवर नए मूल्य-बोध को समझने लगता है। पुलिस, कानून, सीसीटीवी और होटल में नौकरी छूटने का डर भी उसके अंदर होता है। लेकिन यही डर मध्यम या निम्न वर्ग के रिहायशी रूट पर चलने वाले उस ड्राइवर, कंडक्टर या खलासी को नहीं होगा जब वह  पाएगा कि सोलह दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड की रात में दस बजे एक लड़का और एक लड़की सीट के पीछे बैठ प्यार की बात या प्यार कर रहे हैं। 

यही डर बीरभूम के उस युवक को भी नहीं होगा जो फेसबुक पर गलत अकाउंट बना कर अपने फोटो की जगह किसी स्मार्ट युवक की तस्वीर लगा कर आया है। उन दोनों को नारी स्वतंत्रता का पश्चिमी मतलब नहीं मालूम, मात्र यह मालूम है कि ऐसे लोग ‘उपलब्ध’ या ‘कमजोर’ होते हैं और इनके साथ अपनी काम-पिपासा शांत की जा सकती है। 

जब हम गाहे-बगाहे (आजकल कुछ ज्यादा ही) सुनते हैं किसी मंत्री ने कहा ‘औरतें कम कपडेÞ न पहनें’ तब एक जबर्दस्त प्रतिक्रिया ‘आधुनिकता के हिमायती’ बुद्धिजीवियों के द्वारा होती है। लगता है मानो भूचाल आ गया हो। 

प्रश्न यह नहीं है कि कम कपड़े पहनें या ज्यादा। प्रश्न यह है कि दो अलग-अलग मूल्य-बोध को जब आप झटके से जोड़ते हैं तो यह समस्या आती है। आधुनिकता या नारी स्वातंत्र्य के लिए जार-जार आंसू बहाने वाले यह नहीं सोच पा रहे हैं कि इस तरह के स्वातंत्र्य की शर्तें हैं सख्त कानून और उन्हें अमल में लाने वाली ताकतवर संस्थाएं, सीसीटीवी से हर क्षण और हर जगह नजर रखना, न्यायपालिका की फौरी कार्रवाई का खौफ और महिलाओं में स्थिति को समझने की सलाहियत।        

भारतीय समाज में हजारों साल में संस्थाएं विकसित हुई थीं। परिवार, प्राथमिक संबंधों पर आधारित सामाजिक तानाबाना, विवाह के जन्म-जन्मांतर के रिश्ते, मां-बाप का बच्चों के प्रति शर्त-शून्य अगाध ममत्व, ‘सोशल पुलिसिंग’ की अद्भुत व्यवस्था, ये सभी समाज में व्यक्ति को नैतिक-चारित्रिक फिसलाव से रोकते थे। इस लिहाज से भारतीय समाज तथाकथित पश्चिमी समाजों से अलग रहा है। पश्चिमी समाज ‘कॉन्ट्रैक्ट’ (संविदा) पर आधारित रहा है जहां न तो प्यार या ममत्व में पूर्ण समर्पण है न ही व्यक्तिगत नैतिकता के प्रति सार्थक आग्रह। भारत का समाज संबंधों पर आधारित रहा है। 

किसी भी समाज में धार्मिक संस्थाओं की इस पतन को रोकने में एक बड़ी भूमिका रही है। भारत में हजारों साल से ये संस्थाएं रही हैं। पर हाल के दौर में इनकी भूमिका ही नहीं, विश्वसनीयता भी खत्म हो चुकी है। व्यक्तिगत पसंद-नापसंद वाले बाबा हैं। संस्थाएं या मूल्य विकसित करना इन बाबाओं की हैसियत से बाहर है। पुरानी रूढ़ियां भी एकल परिवार और शहरीकरण के कारण दम तोड़ चुकी हैं। जब इनमें से एक-आध बाबा बलात्कार के मामले में सलाखों के पीछे चला जाता है या उसकी अकूत संपत्ति का खुलासा होता है तो बचा-खुचा विश्वास भी खत्म हो जाता है। 

नई मूल्य-व्यवस्था तो आएगी, पर क्या उसे बगैर पूरे समाज को तैयार किए लाना नई समस्याएं पैदा नहीं करेगा? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि नारी स्वतंत्रता के पश्चिमी भाव से हट कर हम इस नारी स्वतंत्रता को कम कपड़े तक महदूद न करें बल्कि इसमें दुर्गा की शक्ति दें ना कि निर्भया (दिल्ली बलात्कार कांड, सोलह दिसंबर, 2012) की बेचारगी? क्या यह उचित नहीं होगा कि पहले बदलते मूल्य-बोध से उस बस कंडक्टर और खलासी को भी रूबरू कराएं और तब उसे दिल्ली में गाड़ी चलाने का लाइसेंस दें। और जब तक यह प्रक्रिया, कानून, टेक्नोलॉजी का अपराध रोकने में प्रयोग पश्चिमी समाज के स्तर तक न आ जाए, कम कपड़े ना पहनने की वकालत करें?


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