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अध्यात्म और तानाशाही PDF Print E-mail
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Saturday, 09 August 2014 12:04

संदीप जोशी

जनसत्ता 9 अगस्त, 2014 : शुरुआती शिक्षा का लेना-देना तानाशाह रवैए से कैसे हो सकता है? और आध्यात्मिक शिक्षा का लेना-देना तानाशाही या वकालतवाद से तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल आर दवे जब प्राथमिक शिक्षा को लेकर तानाशाही की बात करते हैं तो उनका वकालतवाद भी आर-पार होता है। शुरुआती शिक्षा में अध्यात्म का तानाशाही वकालतवाद कैसे पचाया जा सकता है? न्यायमूर्ति दवे ने आध्यात्मिक शिक्षा की वकालत करते हुए देश भर में कक्षा पहली से भगवद्गीता पढ़ाए जाने का फरमान जारी करने की इच्छा जताई है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के द्वारा प्राचीन परंपरा की ओर देश को लौटने की बात भी की है। उनके कहे के आशय के मुताबिक तानाशाही रवैए का सहारा लेकर भी बच्चों को ‘महाभारत’ और ‘भगवद्गीता’ जैसे ग्रंथ पढ़ाए जाने चाहिए। शिक्षा में अध्यात्म की जरूरत तो समझ आती है। लेकिन तानाशाही के साथ उसे लागू करने की वकालत को क्या कहा जाए! इस बहस में पड़ने से ज्यादा जरूरी होगा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति का बच्चों की शुरुआती शिक्षा पर विचार। आखिर एक न्यायमूर्ति या अनेक न्यायालय तो देश को नहीं चलाते हैं!

महाभारत के युद्ध में गीता उसी समान है, जैसे जीवन संघर्ष में नैतिकता। अपन चाहें तो इसके महत्त्व को मानें या न भी मानें, तो भी इसे मिटाया नहीं जा सकता है। गीता के ज्ञानमय उपदेश में उसे कहने वाले कृष्ण, उसे सुनने वाले अर्जुन और गुनने वाले व्यासदेव, सभी निमित्त मात्र हैं। पंथीय परंपराओं और मजहबी मान्यताओं के बीच गीता जीवन के मूल और सार्वभौमिक धर्म की बात करती है और विभिन्न पंथों और मजहब से अलग धर्म को जीवन में धारण करने की शिक्षा देती है। अगर युद्ध ही दुनियावी सच्चाई है तो धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करती है।

गीता के अनंत टिप्पणीकारों में एक विनोबा भावे भी हैं। विनोबा ने माना कि उनका शरीर जितना मां के दूध पर पला, उससे कहीं अधिक उनके हृदय और बुद्धि का पोषण गीता के दूध पर हुआ। विनोबा कोई लोकप्रिय राजनीतिक धर्मगुरु या न्यायालय के न्यायमूर्ति नहीं थे। वे जीवन भर राजनीतिक संतई में लगे सामाजिक सेवक थे। विनोबा मानते थे कि महाभारत और रामायण के पात्रों ने ही भारतीय जनमानस को हजारों वर्षों से मंत्रमुग्ध किया है। उनके लिए महाभारत व्यापक समाजशास्त्र था। सन 1932 में विनोबा भावे महाराष्ट्र की धुलिया जेल में स्वाधीनता सेनानियों के साथ बंदी थे। अपने साथी बंदियों के बीच में विनोबा ने


गीता पर प्रवचन दिए। प्रवचनों को उनके साथी साने गुरुजी ने ‘लॉन्गहैंड’ से ‘शार्टहैंड’ में लिखा और कालजयी किताब बना दी। विनोबा भावे ने समय के सत्य को भावपूर्ण तरीके से ‘गीता प्रवचन’ में प्रस्तुत किया है। 

सवाल इससे अलग है। क्या प्राथमिक पढ़ाई में आध्यात्मिक शिक्षा की जरूरत है और क्या इसे अन्य पंथों की होड़ में तो नहीं देखा जा रहा है? मदरसे में कुरान, मिशनरी स्कूलों में बाइबिल और सरस्वती शिशु मंदिरों में कई पंथीय ग्रंथ वर्षों से पढ़ाए जाते रहे हैं। लेकिन केवल पेशे के लिए पढ़ाई जाने वाली शिक्षा से सामाजिक गिरावट आई है। आज माना जा रहा है कि प्राथमिक शिक्षा में नैतिक और आध्यात्मिक कमी के कारण सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है। समाज में लगातार बढ़ते अपराध, असभ्य व्यवहार और अथाह लालसा के कारण नैतिक आध्यात्मिक शिक्षा की जरूरत बढ़ी है। शिक्षा शैली और पढ़ाई पद्धति पर फिर से विचार करने का समय यही है। लेकिन यह तानाशाही या अदालती फरमान से नहीं होने वाला है।

तानाशाही से आध्यात्मिक शिक्षा तो क्या, पेशेवर शिक्षा भी नहीं दी जा सकती है। सही है कि प्राथमिक शिक्षा में आध्यात्मिक और नैतिक पाठ पढ़ाना सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है। यहीं विनोबा भावे की किताब ‘गीता प्रवचन’ सबसे सार्थक सिद्ध हो सकती है। इसमें विभिन्न पंथ और मजहब से लिए गए कहानी-किस्से हैं, जो प्रवचन के रूप में रोचक, रूमानी और रस भरे तो हैं ही, मगर सामाजिक साहित्य और पंथनिरपेक्षता के धर्म को सरल-सहज भी बनाते हैं। साधारण भाषा में कहे गए आध्यात्मिक प्रवचन अपने समय और समाज को समझने के लिए सही पहल हो सकते हैं। गीता का मुख्य उपदेश कर्मयोग है। न्यायमूर्ति दवे ने तो तानाशाही की वकालत कर दी है।


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