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Friday, 08 August 2014 11:47

जनसत्ता 8 अगस्त, 2014 : बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं को लेकर चर्चा कराने की मांग पर जिस तरह संसद में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आक्रामक रुख अपनाया, अब उसी को भाजपा ने जैसे असल मुद्दा बना दिया है। इस तरह सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को किनारे करने की कोशिश शुरू हो गई है। संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू का कहना है कि देश में शांति है, कहीं से किसी दंगे की खबर नहीं है। वित्तमंत्री अरुण जेटली राहुल गांधी के आक्रामक रुख को कांग्रेस की हताशा बताने में जुट गए। हालांकि राहुल गांधी ने जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष के आसन तक पहुंच कर सांप्रदायिक घटनाओं पर तुरंत चर्चा कराने की मांग की और नारे लगाए, लोकसभा अध्यक्ष पर पक्षपात का आरोप लगाया उसे संसदीय गरिमा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। सदन में किसी विषय पर चर्चा को लेकर नियम-कायदे बने हुए हैं, उन्हीं के अनुरूप लोकसभा अध्यक्ष को कार्यवाही का संचालन करना पड़ता है। मगर जिस तरह कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बना हुआ है, उसे लेकर चर्चा को टालना उचित नहीं कहा जा सकता। पिछले करीब ढाई महीनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में करीब चार सौ सांप्रदायिक घटनाएं हो चुकी हैं। ये घटनाएं खासकर उन्हीं इलाकों में हुई हैं, जहां उपचुनाव होने हैं। इन घटनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि हिंदू बहुल इलाकों में मुसलिम समुदाय के लोगों को परेशान करने की नीयत से सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। इनसे दलितों और मुसलिम समुदाय के बीच टकराव की स्थितियां भी पैदा हुर्इं। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि भाजपा नेता और समर्थक उपचुनावों में मतों का ध्रुवीकरण करने की नीयत से ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए इस विषय पर चर्चा को टालने से भाजपा पर संदेह गहराना स्वाभाविक है। 

अब भाजपा भले संसदीय गरिमा की बात कर रही हो, पर उसे नहीं भूलना चाहिए कि यूपीए सरकार के समय उसने अनेक मौकों पर बेवजह हंगामा करके संसद का कामकाज बाधित किया। इस तरह कई सत्र बिना अपेक्षित कार्यवाही


के समाप्त हो गए। जिन मसलों पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी, उन पर मंत्रिमंडल की बैठकों में फैसले करने पड़े। अब सांप्रदायिक घटनाओं पर चर्चा की मांग को लेकर वह मुद्दे को गलत दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश की घटनाओं को लेकर वहां की सरकार को काफी किरकिरी झेलनी पड़ी है। पर इस तथ्य से आंख नहीं चुराई जा सकती कि लोकसभा चुनाव के दौरान मुजफ्फरनगर की घटनाओं में कुछ भाजपा नेताओं की संलिप्तता भी उजागर हुई थी। फिर क्या वजह है कि उन्हीं इलाकों में सांप्रदायिक घटनाएं हो रही हैं, जहां उपचुनाव होने हैं। जिस तरह मोबाइल के जरिए संदेश प्रसारित कर और नमाज के विरोध में लाउडस्पीकरों के जरिए भजन-कीर्तन आदि का प्रसारण कर मुसलिम समुदाय के प्रति नफरत पैदा करने की कोशिश की जा रही है, उसे क्या कहा जा सकता है! ऐसी घटनाएं अब तेज हो गई हैं तो इसकी कोई तो वजह होगी। फिर यह मामला केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। जब से नरेंद्र मोदी ने केंद्र में कमान संभाली है, देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक उभार बढ़ा है। क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इस बीच हिंदुत्ववादी ताकतों का मनोबल बढ़ा है। भाजपा अगर सचमुच ऐसी घटनाएं रोकने को लेकर संजीदा होती, तो विपक्षी दलों की मांग को इस तरह टालने या फिर मुद्दे को गलत दिशा में मोड़ने का प्रयास न करती। 


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