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अपराध की उम्र PDF Print E-mail
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Friday, 08 August 2014 11:47

जनसत्ता 8 अगस्त, 2014 : दिल्ली में चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना में एक किशोर को भी दोषी पाया गया, तभी से यह मांग हो रही थी कि गंभीर अपराधों में लिप्त होने पर सजा दिलाने के लिए बालिग मानने की उम्र घटाई जानी चाहिए। इस मसले पर पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की गई थी। मगर मौजूदा कानूनों के तहत अदालत ने नाबालिगों की उम्र में कोई फेरबदल करने से इनकार कर दिया था। समाजशास्त्रियों और बच्चों या किशोरों के लिए काम करने वाले संगठनों ने भी कानून में बदलाव करने के मसले पर असहमति जताई और इस समस्या की बुनियादी वजहों पर गौर करने पर जोर दिया। लेकिन आंकड़ों का हवाला देते हुए कई हलकों से बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों के मामले में नाबालिगों की उम्र से संबंधित कानून बदलने की मांग की जा रही थी। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किशोर न्याय (देखभाल और बाल संरक्षण) अधिनियम 2000 में बदलाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अगर संसद के दोनों सदनों में यह मसविदा पारित हो जाता है तो नए कानून के तहत बलात्कार और हत्या जैसे अपराध करने वाले सोलह साल के किशोर पर भी भारतीय दंड संहिता की धाराओं तहत मुकदमा दर्ज होगा। हालांकि उसे बालिग नहीं माना जाएगा और उम्र कैद या फांसी की सजा नहीं दी जा सकेगी। इसके अलावा, किशोर न्याय बोर्ड ही यह तय करेगा कि ऐसे आरोपी पर मुकदमा वयस्कों की तरह चले या फिर उसे सुधार गृह भेजा जाए। फिलहाल किशोर न्याय (देखभाल और बाल संरक्षण) अधिनियम 2000 के तहत अठारह साल से कम उम्र के अपराधियों को किशोर माना जाता है और सजा के तौर पर उन्हें तीन साल तक के लिए बाल सुधार गृह में भेज दिया जाता है। 

दरअसल, पिछले कुछ सालों के दौरान हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में सोलह से अठारह साल के किशोरों की संलिप्तता बढ़ी है। निश्चित रूप से यह चिंता का विषय है। लेकिन सिर्फ वयस्कों के बराबर रख कर क्या इन अपराधी बच्चों की समस्या से निजात पाई


जा सकती है? सजा के भय से अपराधों पर काबू पाने में कितनी मदद मिली है? भारत में बाल सुधार गृह या जेलों की स्थिति छिपी नहीं रही है। कई बार वहां जाने वाला कोई साधारण अपराधी भी शोषण और यातना जैसी स्थितियों से गुजर कर और विकृत हो जाता है। सवाल है कि क्या हमारे समाज और व्यवस्था ने यह मान लिया है कि कम उम्र के बच्चों के अपराधों में शामिल होने में सामाजिक या सांस्कृतिक माहौल की कोई भूमिका नहीं होती? यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किशोरावस्था में बच्चे शारीरिक और मानसिक विकास के एक नाजुक दौर से गुजर रहे होते हैं। ऐसे हजारों बच्चे हैं, जिन्हें परिवार तो दूर, माता-पिता तक की देखभाल नसीब नहीं हो पाई; वे स्कूल नहीं जा सके या गरीबी जैसी कई वजहों से उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। उनमें से बहुत सारे बच्चे छोटे-मोटे अपराधों के चक्कर में फंस जाते हैं और यही सामाजिक स्थिति उन्हें गंभीर अपराधों की ओर भी ले जाती है। जाहिर है, एक तरह से समाज में अभाव और उपेक्षा का शिकार होकर ऐसे बच्चे अपराधों की ओर प्रवृत्त होते हैं और दूसरी ओर सरकार के पास इनके लिए कोई ऐसी कोई सामाजिक विकास नीति नहीं है, जो इन्हें एक सभ्य इंसान बनने में मदद कर सके। इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। 


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