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भाषा का वरीयता क्रम बदलें PDF Print E-mail
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Friday, 08 August 2014 11:45

महावीर सरन जैन

 जनसत्ता 8 अगस्त, 2014 : संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षाओं से सीसैट हटाने की छात्रों की मांग का दो-तीन दिन पहले तक भाजपा के अनेक नेता और प्रवक्ता समर्थन कर रहे थे। वक्तव्य आ रहे थे कि हमारी पार्टी देहातों, कस्बों, शहरों के करोड़ों किसानों, मजदूरों, कामगारों, गरीबों के बच्चों के हितों का पूरा ध्यान रखेगी। मंत्रियों ने भी जिस तरह संसद में वक्तव्य दिए, उन्हें सुन कर लग रहा था कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों की मांग मान ली जाएगी। सरकार ने अंगरेजी के बीस नंबरों का झुनझुना पकड़ा दिया। 

मगर सीसैट अंगरेजी के बीस नंबर तक सीमित नहीं है। मूल समस्या बोधन क्षमता (कॉप्रिहेंशन) के अस्सी नंबरों के साथ है, जिस पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया है। सीसैट प्रबंधन और तकनीकी विषयों में पारंगत छात्रों के हितों की रक्षा करता है। इससे महानगरों के उन रईसजादों को फायदा होता है, जिनके अभिभावक लाखों रुपए खर्च कर उनकी कोचिंग कराने में समर्थ होते हैं और लाखों रुपए दान देकर उनको कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी प्रबंधन और तकनीकी विषयों के संस्थानों में प्रवेश दिलाने की हैसियत रखते हैं। सरकार ने सीसैट में प्रबंधन और तकनीकी विषयों में पारंगत छात्रों को छोड़ कर बाकी के साथ हो रहे पक्षपात का समाधान नहीं किया है। 

संसद में सरकारी बयान के बाद, टीवी के एक चैनल पर भाजपा प्रवक्ता लचर दलील दे रहे थे कि अगर हम सीसैट की परीक्षा को निरस्त कर देते तो मुकदमेबाजी शुरू हो जाती और इससे छात्रों के हित प्रभावित होते। आंदोलनरत छात्रों की सहानुभूति बटोरने के लिए उन्होंने दूसरी बात यह कही कि हम अंगरेजी के मूल प्रश्न-पत्र के अनुवाद की अच्छी व्यवस्था करेंगे। 

देश की सभी भारतीय भाषाओं के छात्र लंबी अवधि से संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षाओं से सीसैट के प्रश्न-पत्र को हटवाने के लिए आंदोलनरत हैं। चुनावों के पहले भाजपा के तमाम नेता आंदोलनरत छात्रों की इस मांग का समर्थन करते थे। अगर भाजपा सत्ता प्राप्ति के तुरंत बाद इस दिशा में सार्थक पहल करती और लोक सेवा आयोग को दिशा-निर्देश दे देती, तो छात्रों को प्रवेश-पत्र ही वितरित नहीं होते। अगर तकनीकी कारण से सीसैट को इस समय नहीं हटाया जा सकता तो कम से कम इसके मॉडल को तो परिवर्तित किया ही जा सकता है। ऐसे नए प्रश्न-पत्र का निर्माण कराया जा सकता है, जिसमें प्रबंधन और तकनीकी विषयों के साथ-साथ कला, समाजविज्ञान और मानविकी संकायों के विषयों से भी बराबर के अनुपात में प्रश्न हों। ऐसा करने पर प्रत्येक विषय के छात्र की योग्यता और क्षमता का मूल्यांकन हो सकेगा। 

प्रशासन के क्षेत्र के अधिकारी को क्या भारत के इतिहास और भूगोल की बुनियादी जानकारी नहीं होनी चाहिए। क्या सरकार यह चाहती है कि सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले ऐसे अधिकारी बनें, जो बिहार में जाकर तक्षशिला के बिहार में होने जैसा बयान दें। 

समझना मुश्किल है कि मूल प्रश्न-पत्र अंगरेजी में बनाने और फिर उसका अनुवाद करने की बात क्यों की जा रही है। भाजपा के नेता हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए प्रतिबद्धता की कसमें खाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षाओं के प्रश्न-पत्रों का निर्माण मूलत: अंगरेजी में क्यों हो। 

भारत की सभी भाषाओं में परस्पर भाषिक-संरचनात्मक समानता और एकता के सूत्र विद्यमान हैं। भाषिक दृष्टि से अंगरेजी भारत की भाषाओं के नहीं, बल्कि यूरोप में बोली जाने वाली भारोपीय परिवार की भाषाओं के निकट है। भारत में एक अपेक्षा से अद्भुत सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताएं हैं, तो दूसरी अपेक्षा से विविधताओं के बीच एकता की अनुपम मिसाल है। 

भारतीय संस्कृति के लिए ‘अनेकता में एकता’ जैसा विशेषण अकारण नहीं दिया जाता। भारतीय संस्कृति के संबंध में सटीक टिप्पण यह है कि भारतीय संस्कृति महासमुद्र के समान है, जिसमें अनेक नदियां आ-आकर विलीन होती रही हैं। इसी कारण दिनकर ने लिखा कि ‘यह विश्वजनीनता, विभिन्न जातियों को एक महाजाति के सांचे में ढालने का यह अद्भुत प्रयास और अनेक वादों, विचारों और धर्मों के बीच एकता लाने का यह निराला ढंग सभी युगों में भारतीय समाज की विशेषता रहा है।’ 

भाषिक दृष्टि से भी भारत में एक ओर अद्भुत विविधताएं हैं, वहीं दूसरी ओर भिन्न भाषा परिवारों की भाषाएं बोलने वालों के बीच और एक भाषा परिवार के विभिन्न भाषियों के बीच भाषिक समानता और एकता का विकास भी हुआ है। भाषिक एकता विकसित होने के अनेक कारण हैं। कारणों का मूल आधार विभिन्न भाषा परिवारों और एक भाषा परिवार के विभिन्न भाषाभाषियों का एक ही भूभाग में शताब्दियों से निवास करना है, उनके आपसी सामाजिक संपर्क हैं और इसके फलस्वरूप पल्लवित सांस्कृतिक एकता है। 

इस कारण मूल प्रश्न-पत्र का निर्माण अगर किसी एक भाषा में कराने की अनिवार्यता हो तो उस स्थिति में मूल प्रश्न-पत्र का निर्माण अंगरेजी के स्थान पर हिंदी में होना चाहिए। ऐसा होने पर, उसका अन्य भारतीय भाषाओं में जो अनुवाद होगा, वह अधिक सहज, सरल और बोधगम्य होगा। जो छात्र अंगरेजी माध्यम के हैं, उनके लिए प्रश्न-पत्र का अनुवाद हिंदी से अंगरेजी में कराया जा सकता है। 

लोकतंत्र में, ‘राजभाषा’ शासक और जनता के बीच संवाद की माध्यम होती है। लोकतंत्र में, हमारे नेता चुनावों में जनता से जनता की भाषाओं में


जनादेश प्राप्त करते हैं। जिन भाषाओं के माध्यम से वे जनादेश प्राप्त करते हैं, वही भाषाएं देश के प्रशासन की माध्यम होनी चाहिए और उनको लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का माध्यम भी बनना चाहिए। 

क्या लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र का निर्माण मूल रूप से भारतीय भाषाओं में नहीं हो सकता। आप प्रश्न-पत्र का निर्माण मूलत: भारतीय भाषाओं में कराइए। उस प्रश्न-पत्र का अनुवाद अंगरेजी में कराइए। लोक सेवा आयोग के अधिकारियों को भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों का दर्द समझ में आ जाएगा। प्रश्न-पत्रों के निर्माण की प्रक्रिया को उलट दीजिए। वर्तमान स्थिति में बदलाव जरूरी है। इस साल की परीक्षा में मूल अंगरेजी के प्रश्न-पत्र का जैसा अनुवाद भारतीय भाषाओं में हुआ है- वह इस बात का प्रमाण है कि लोक सेवा आयोग भारतीय भाषाओं को लेकर कितना गंभीर है। 

हमने प्रश्न-पत्र का हिंदी अनुवाद टीवी चैनलों पर सुना है। कह सकते हैं कि हमारे लिए प्रश्न-पत्र की हिंदी बोधगम्य नहीं है। क्या लोक सेवा आयोग यह चाहता है कि जो अमीर परिवार अपने बच्चों को महंगे अंगरेजी माध्यम के कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाने की सामर्थ्य रखते हैं, केवल उनके बच्चे आइएएस और आइएफएस होते रहें। समाज के निम्न वर्ग और ग्रामीण भारत के करोड़ों किसान, मजदूर, कामगार कभी भी यह सपना न देख सकें कि उनका बच्चा भी कभी उन पदों पर आसीन हो सकता है। 

यह प्रचारित किया जा रहा है कि अखिल भारतीय सिविल सेवाओं के अधिकारियों को अंगरेजी का ज्ञान होना चाहिए। अगर इस तर्क  को मान भी लिया जाए तो क्या लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के समय परीक्षार्थी को अंगरेजी ज्ञान का होना अनिवार्य है? 1970 तक लोक सेवा आयोग की सभी परीक्षाएं केवल अंगरेजी में होती थीं। 1970 के आसपास भारत सरकार ने यह अनुभव किया कि जनतंत्र को सार्थक करने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय भाषाओं का अधिकाधिक उपयोग किया जाना चाहिए और संघ के राजकार्य में हिंदी प्रयोग को बढ़ावा मिलना चाहिए। 

राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में  इसके लिए जुलाई, 1969 में भाषा संकाय की स्थापना हुई। वहां के निदेशक को हमने प्रशासकों को भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और राजभाषा हिंदी में प्रशिक्षित करने के लिए भाषा प्रयोगशाला स्थापित करने और इस भाषा प्रयोगशाला के लिए सामग्री बनवाने का परामर्श दिया था। 1972 में भाषा प्रयोगशाला की स्थापना हुई। मई-जून, 1972 को भाषा प्रयोगशाला के माध्यम से हिंदी शिक्षण सामग्री निर्माण के लिए अकादमी ने ‘वर्कशॉप’ में मेरे सहित चार-पांच भाषाविदों को आमंत्रित किया। अब इस स्थिति में परिवर्तन जरूरी है। 

राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में बयालीस सालों से प्रशिक्षण काल में भाषा प्रयोगशाला के माध्यम से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान कराया जाता रहा है। अब भारतीय भाषाओं में लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं संपन्न होनी चाहिए। चयनित भारतीय भाषाओं के जानकारों को राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में प्रशिक्षण काल में भाषा प्रयोगशाला के माध्यम से अंगरेजी के प्रशिक्षण की व्यवस्था कर सकती है। जिनको विदेश सेवा में काम करना है, वे इस ज्ञान से लाभान्वित हो जाएंगे। 

जो हिंदी नहीं जानते उनके लिए अंगरेजी के साथ-साथ राजभाषा हिंदी के प्रशिक्षण की व्यवस्था पूर्ववत रहनी चाहिए। इस व्यवस्था से एक ओर भारतीय भाषाओं को उनका अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो सकेगा, तो दूसरी ओर यह संविधान के समता के सिद्धांत के अनुरूप भी होगा। 

एक बात और स्पष्ट करना चाहता हूं। यह मिथक है कि संसार के सभी देशों में अंगरेजी में काम होता है। लेखक ने 1984 से लेकर 1988 तक यूरोप में एक यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किया, यूरोप के अठारह देशों में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यूरोप के सभी उन्नत विश्वविद्यालयों में विदेशी भाषाओं के संकाय हैं। संकाय में लगभग चालीस विदेशी भाषाओं को पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था होती है। विदेशी भाषा का ज्ञान रखना एक बात है, उसको जिंदगी में ओढ़ना अलग बात है। 

यूरोप के अठारह देशों की यात्राओं में  लेखक ने पाया कि इनमें इंग्लैंड को छोड़ कर आस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया (अब चेक गणराज्य और स्लोवेनिया), पश्चिमी जर्मनी, पूर्वी जर्मनी (अब केवल जर्मनी), हंगरी, इटली, लग्जमबर्ग, नीदरलैंड्स, पोलैंड, रोमानिया और उस समय के यूगोस्लाविया का सरकारी कामकाज अंगरेजी में नहीं होता था। वहां के विश्वविद्यालयों की शिक्षा का माध्यम अंगरेजी नहीं था। वहां के प्रशासन का माध्यम अंगरेजी नहीं था। उपर्युक्तअठारह देशों के शिक्षण और प्रशासन का माध्यम अंगरेजी नहीं थी। प्रत्येक देश अपनी भाषा में अपना काम करता था। शिक्षण का काम भी, प्रशासन का भी। 


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