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दिल्ली की कुंजी PDF Print E-mail
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Thursday, 07 August 2014 11:43

जनसत्ता 7 अगस्त, 2014 : सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली विधानसभा के निलंबन की स्थिति में रहने पर उचित ही केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। आम आदमी पार्टी ने याचिका दायर कर सर्वोच्च अदालत से मांग की थी कि वह उपराज्यपाल को राष्ट्रपति शासन हटाने और विधानसभा भंग करने का निर्देश दे। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पहले कहा था कि वह ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह उसके अधिकार-क्षेत्र में नहीं है; अलबत्ता उपराज्यपाल चाहें तो विधानसभा भंग कर सकते हैं, इसमें कोई संवैधानिक अड़चन नहीं है। इस बार भी पांच जजों के संविधान पीठ ने कोई निर्देश नहीं दिया है, पर विधानसभा को निलंबित रखने पर सवाल जरूर उठाए हैं। पीठ ने पूछा है कि जब किसी दल के पास सरकार बनाने लायक संख्याबल नहीं है या इसके लिए किसी ने दावा पेश नहीं किया है तो विधानसभा को निलंबित रखने का क्या औचित्य है? दूसरी ओर, विधानसभा के निलंबन की हालत में रहने के बावजूद विधायकों को वेतन-भत्ते मिल रहे हैं, जो कि करदाताओं के साथ अन्याय है। पर यह केवल वित्तीय नहीं, लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार से भी जुड़ा प्रश्न है। 

कहने को पिछले साल दिसंबर में चुने गए उम्मीदवार अब भी विधायक हैं, पर विधानसभा के निलंबित रहने और कोई चुनी हुई सरकार न होने से उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि जन-शिकायतों के निवारण के लिए क्या करें। वे नौकरशाही की मर्जी पर निर्भर हैं। विधायक क्षेत्रीय विकास निधि के काम भी रुके पड़े हैं, शहरी विकास विभाग उनके प्रस्तावों पर कुंडली मार कर बैठा है। विधायक भाग-दौड़ कर कुछ शिकायतों का निपटारा करा भी लें, तो महंगाई या बच्चों के दाखिले से जुड़े सवाल कहां उठाएं! जाहिर है, दिल्ली विधानसभा के निलंबित रहने से नीतिगत पंगुता की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में विधानसभा भंग कर फिर चुनाव कराना ही सर्वोत्तम विकल्प है। कांग्रेस और भाजपा ने भी सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का स्वागत किया है। पर इस मामले में भाजपा के रुख में निरंतरता नहीं रही है। एक तरफ वह कहती है कि चुनाव के लिए तैयार है तो दूसरी तरफ रह-रह कर सरकार बनाने की संभावनाएं भी तलाशने लगती है। जब उसके पास बहुमत


के आंकड़े से सिर्फ चार विधायक कम थे, तो उसने सरकार बनाने से यह कह कर मना कर दिया था कि उसके पास संख्याबल नहीं है। उसके तीन विधायक लोकसभा  के लिए चुन लिए गए, यानी विधायक दल में तीन की कमी आ गई। अब भाजपा सरकार बनाने का दावा करे, तो इससे गलत संदेश जाएगा। यह केंद्रीय सत्ता का दुरुपयोग होगा। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पांच हफ्तों के भीतर केंद्र पर अपना रुख साफ करने का दबाव बना दिया है। इससे दिल्ली की सियासी हलचल तेज हो गई है। अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बीच भाजपा सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है। जब कोई दूसरी पार्टी उसे समर्थन देने को राजी नहीं है तो यह कैसे संभव होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। 

सर्वोच्च अदालत के जवाब तलब ने एक लोकतांत्रिक सवाल उठाया है। अगर इसकी परिणति जोड़-तोड़ में हो तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अगर विधानसभा भंग करने का निर्णय नहीं होता है तो निर्वाचन आयोग को तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने होंगे। लेकिन यह विचित्र बात होगी कि निलंबित विधानसभा के लिए उपचुनाव कराए जाएं। और वह भी थोड़े समय के लिए। यह सरकारी खजाने पर एक और अतिरिक्त बोझ होगा। विधानसभा को निलंबित रखने के पीछे कई बार यह दलील दी गई है कि दोबारा चुनाव होने पर भी गारंटी नहीं कि किसी को बहुमत मिले। पर यह सवाल तो हमेशा बना रह सकता है। भावी विधानसभा की कैसी तस्वीर उभरेगी यह सवाल मतदाताओं पर छोड़ दिया जाना चाहिए।  


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