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सावधानी की मुद्रा PDF Print E-mail
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Thursday, 07 August 2014 11:43

जनसत्ता 7 अगस्त, 2014 : मोदी सरकार बनने के बाद रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की दूसरी बार द्वैमासिक समीक्षा पेश की है। दोनों बार उसने ब्याज दरों को स्थिर रखा है। और पहले से देखें, तो इस साल लगातार तीसरी दफा ऐसा हुआ है जब रिजर्व बैंक ने न तो रेपो दरों में कोई बदलाव किया न सीआरआर यानी नकद आरक्षित अनुपात में। इस तरह आवास, वाहन आदि की खातिर लिए गए या लिए जाने वाले कर्जों की मासिक किस्तों में राहत की उम्मीद को एक बार फिर झटका लगा है। ताजा मौद्रिक समीक्षा उद्योग जगत की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। लेकिन रिजर्व बैंक ने एसएलआर यानी वैधानिक तरलता अनुपात में आधा फीसद की कमी करके पूंजी प्रवाह बढ़ाने की एक तजवीज जरूर की है। एसएलआर जमाओं का वह हिस्सा कहलाता है जो बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों में अनिवार्य रूप से रखना पड़ता है। एसएलआर में आधा फीसद की कटौती से बैंकों के पास कर्ज मंजूर करने के लिए चालीस हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि उपलब्ध होगी। कई बार की लगातार बढ़ोतरी से ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं। रिजर्व बैंक ने एक बार फिर उन्हें यथावत रखा है तो इसके पीछे महंगाई पर काबू पाने की चिंता है। यों जून में मुद्रास्फीति में कुछ गिरावट दर्ज हुई और इसका हवाला देते हुए कई विश्लेषकों का कहना है कि इस बार ब्याज दरों में नरमी लाने का फैसला किया जा सकता था। पर रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि यह गिरावट फौरी है, कोई रुझान नहीं। बल्कि इस बार कमजोर मानसून के चलते खाद्य महंगाई के और चढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

रघुराम राजन ने साफ कहा है कि ब्याज दरें घटाना नहीं, महंगाई पर काबू पाना उनकी प्राथमिकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत से ज्यादा समय तक वे ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर नहीं रखेंगे। मानसून की स्थिति को देखते हुए अगले साल जनवरी-फरवरी से पहले इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। बहरहाल, कुल


मिला कर रिजर्व बैंक ने सावधानी की मुद्रा अपनाई है। एक तरफ उसने महंगाई के मौजूदा ग्राफ और आने वाले दिनों में इसके और चढ़ने के अंदेशे का खयाल रखा है, और दूसरी तरफ, बैंकों को चालीस हजार करोड़ का अतिरिक्त कर्ज दे सकने में सक्षम बनाया है। ब्याज दरें स्थिर रखने का निर्णय रिजर्व बैंक ने शायद यह सोच कर भी किया होगा कि औद्योगिक उत्पादन में सिकुड़न या ठहराव का सिलसिला हाल में टूटने के संकेत आए हैं; औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के हालिया आंकड़े पिछले दो साल में सबसे अच्छे कहे जा सकते हैं। इस तरह रेपो दरों को कम न किए जाने से विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ने की जो आशंका जताई जा रही है वह अतिरंजित है। फिर, विकास दर को केवल सस्ती ब्याज दरों से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। अगर खुदरा महंगाई नौ-दस फीसद हो तो बाजार में मांग बढ़ने की आशा नहीं की जा सकती। लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह मौद्रिक समीक्षा से ज्यादा आर्थिक नीतियों से जुड़ा मसला है। अर्थव्यवस्था को गति देने का सबसे स्थायी फार्मूला यह है कि उन लोगों की भी आय में इजाफा हो जो क्रय-शक्ति के लिहाज से हाशिये पर रहे हैं। पर समस्या यह है कि हमारे नीति नियामक इस तकाजे को कोई तवज्जो नहीं देते। 


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