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आधे अधूरे PDF Print E-mail
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Thursday, 07 August 2014 11:36

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 7 अगस्त, 2014 : अपने किशोर दिनों में मैंने कई फिल्में आधी देख कर छोड़ दी हैं। कई बार देर से पहुंचने पर फिल्म आधी निकल जाने पर भी देखीं। कई नाटकों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। मध्यप्रदेश के कुछ शहरों में तब यह प्रथा थी कि आधी फिल्म देखने के बाद कुछ खास गाना वगैरह देख कर लोग निकल आते थे और ‘अद्धा’ आधा टिकट किसी और को बेच देते थे आधे दाम में, या फिर मुफ्त में यों ही थमा देते थे। अब सुरक्षा आदि कारणों से ऐसा नहीं करने दिया जाता। नाटक या रामलीला में तो दर्शक आते-जाते रहते हैं। एक फिल्म भी आई थी- ‘हाफ टिकट’। ‘अद्धा’ चाय को भी बोला जाता है और अक्सर शराब की दुकानों पर भी ‘अद्धा’ या क्वार्टर सुना जाता है। मध्यप्रदेश में भी कई बार दो दोस्त दो चाय का नहीं, ‘दो अद्धे’ का आर्डर देते हैं। चार दोस्त हुए तो ‘चार कट’ के लिए बोल देते हैं। यानी चार की जगह दो चाय के ही पैसे देने होते हैं।

दरअसल, आधी-अधूरी चीजों से ही बनता है हमारा संसार। डेढ़, ढाई या साढ़े तीन में भी आधे की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हालांकि आजकल अंगरेजी माध्यम में पढ़ने वाली पीढ़ी ‘डेढ़’, ‘ढाई’ या ‘साढ़े’ नहीं समझ पाती है। उसे ‘हाफ-हाफ’ में ही हांफना पड़ता है। किसी को पूरी चाय दी जाए तो वे कहेंगे आधा ही पी पाऊंगा। इसी तरह पूरा अमरूद दीजिए तो कहेंगे कि ‘पूरा नहीं खा पाऊंगा, आधा ही दो।’ कोई-कोई व्यक्ति तो खाने के बाद आधी रोटी छोड़ देता है। कुछ लोग आधी उबली दाल या सब्जी में ही स्वाद पाते हैं। कुछ आधा सेब सबेरे खाएंगे, आधा शाम को। कई डॉक्टर नींद और कुछ दूसरी हलकी बीमारी में आधी गोली खाने की सलाह देते हैं। कुछ लोगों को आधा भरा गिलास आधा खाली दिखता है।

कई किताबें आधी पढ़ी हुई रखी हैं। कई कहानियां, कविताएं और समीक्षाएं अब तक आधी हैं। कुछ उपन्यास अधूरे रह जाते हैं। उन्हें पूरा करने वाले मोहन राकेश, मनोहर श्याम जोशी और प्रेमचंद पता नहीं किसी और लोक में चले जाते हैं। भगत सिंह रात में जिस किताब को पढ़ रहे थे, वह सुबह तक पूरी नहीं हो पाई और फांसी के लिए बुलावा आ गया। उनका जीवन तो अधूरा रहा, पर वे कई लोगों से ज्यादा काम कर गए। आमतौर पर हर कविता और प्रेमकथा आखिर में अधूरी ही रह जाती है। कई बार आधा रास्ता पार करने पर भी मंजिल मिल जाती है। आधी जिंदगी में ही पूरा जीवन जी लेते हैं


जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और मुक्तिबोध।

खिड़की रेल की हो, बस की या घर की, जब आधी खुली रहती है तो उससे पूरी रोशनी आती है। आधा चांद भी बला का खूबसूरत होता है। नल तो आधा ही खोलना ठीक रहता है। गाड़ी भी आधी गति में ठीक और सुरक्षित चलती है। कुंभकर्ण ही पूरी नींद लेता था! हम सब तो आधी-अधूरी नींद में आधे-अधूरे सपने देखते हैं। आधे-अधूरे सपनों से बनता है समाज और राष्ट्र। कई-कई चीजों को मिला कर बनता है ताजमहल। आधे-अधूरे कहे जाने वाले लोग ही बनते हैं वैज्ञानिक, मूर्तिकार, चित्रकार, लेखक। कई आधी-अधूरी मूर्तियों में भी बला का सौंदर्य होता है। कुछ आधे गाने कई पूरे गानों से बेहतर होते हैं। सदियों पर छाप छोड़ जाते हैं आधा-अधूरा जीवन जीकर एल्विस प्रेसली, सिलिया प्लाथ, मर्लिन मुनरो, स्टीव जॉब्स, शेली, राजीव गांधी, मुक्तिबोध, मार्टिन लूथर जैसे शख्स!

आधा हरा आधा ठूंठ होकर भी पेड़, पेड़ होता है। छाया आधी हो तो भी छाया होती है। आधी आंच से भी ठिठुरने से बचा जा सकता है। आधा रास्ता जिसने पार किया, क्या उसे मंजिल पाने का हक नहीं? कई आधी-अधूरी चीजों को जोड़ कर नेकचंद बनाते हैं चंडीगढ़ में एक खूबसूरत बगीचा। कई अधूरे चरित्रों से बनता है नाटक, फिल्म, उपन्यास, और महाभारत तक लिखा जाता है। कवि ‘अर्द्धनारीश्वर’ होता है। कुछ देवता तक आधे नर आधे पशु होते हैं, मसलन नरसिंहावतार, गणेश या हनुमान। ‘हयवदन’ क्या है? कुछ ‘जीनियस’ को भी आधा पागल कहा गया है।

आधे तालाबों में भी खिलते हैं कमल, आधे बगीचों में खिले दिख जाते हैं फूल और आता है बसंत। अगर बादल के किसी टुकड़े को हम आधा कहें तो वह भी बरसता है। क्या आधा आंचल छांव नहीं देता है? शरीर में आधा खून आधा पानी है। इस धरती पर भी कितनी धरती है और कितना पानी है! आधे की गरिमा पूरे से कम नहीं है।


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