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एक चूहे की मौत PDF Print E-mail
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Wednesday, 06 August 2014 11:23

राजकिशोर

जनसत्ता 6 अगस्त, 2014 : मैं एक मामूली चूहे का शोकगीत लिखने जा रहा हूं, जो चूहे की ही मौत मरा। मैंने उस चूहे को कभी नहीं देखा, उसकी असामयिक मृत्यु के बाद भी नहीं, उसे खोज लिए जाने के बाद भी। हम कड़ी धूप में करीब चार घंटे तक खड़े रहे, लेकिन उसके दर्शन नहीं हो सके। लेकिन यह तय था कि वह हमारी कार के किसी हिस्से में मौजूद था। उसकी मृत्यु की सूचना हमें कार में स्थायी रूप से बसी हुई बदबू से मिली। बदबू इतनी बदबूदार थी कि कार में दस मिनट बैठना भी मुश्किल हो गया था। एक चूहे को तो हम खोज चुके थे- वह बोनेट के भीतर मरा पड़ा था। ऐसी जगह पर, जहां मरने के बाद उसकी छोटी-सी देह किसी के काम नहीं आ रही थी। अब दूसरे चूहे की तलाश थी। कार मरम्मत करने वाले दो कारीगर और उन्हीं के साथ का एक बच्चा- उसकी उम्र जो भी हो, उसे लड़का नहीं कहा जा सकता- तीनों मिल कर उसकी खोज में कार के कोने-कोने को उधेड़ रहे थे, पर दिल्ली की हिंदी में वह आकर नहीं दे रहा था। 

रहीम खानखाना ने, शायद पहली बार, लघु के महत्त्व को पहचाना था। उनका एक दोहा कहता है कि बड़े को देख कर छोटे का त्याग नहीं कर देना चाहिए। जो काम सुई कर सकती है, वह तलवार कहां कर सकती है! इसमें क्या संदेह है। जब सड़क पर चलते हुए एक पतला-सा कांटा गड़ जाता है, उस समय वही तलवार के घाव जैसा लगता है। यानी लघु से लघु चीज भी हमारे लिए मुसीबत का कारण बन सकती है। दांत या कान दर्द करने से ततैया के काटने का दर्द छोटा नहीं होता। ठीक इसी अर्थ में, वह मृत चूहा हमें हमारी औकात और अपनी ताकत दिखा रहा था। जीवित अवस्था में वह हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता था, पर मृत्यु के बाद उसकी अहमियत हजार गुना बढ़ गई थी। हम तो खैर धूप में खड़े भर थे, तीनों मिस्त्री गरमी और पसीना झेलते हुए उसका शव इतनी व्यग्रता के साथ खोज रहे थे, जिसकी तुलना ‘कवि, व्यभिचारी, चोर’ से ही की जा सकती है। अंत में, वह, हमारे घर चले आने के बाद, डैश बोर्ड में मिला- उसे देख कर तीनों कारीगर खुशी से भर आए होंगे। जो चीज जितनी मेहनत के बाद मिलती है, वह उतनी ही प्यारी होती है। लेकिन उस पिचके हुए, तेजहीन शव को देख कर खोजकर्ताओं की आंखों में खून भी उतर गया होगा, क्योंकि उसने उन्हें बहुत परेशान किया था। अगर किसी जीव की जान दो बार ली जा सकती है, तो कारीगर उसकी हत्या एक बार और करते। 

लेकिन यह शोकगीत सिर्फ उस चूहे,


या कहिए उन दोनों चूहों का नहीं है, यह हमारी सभ्यता का भी शोकगीत है। इतनी हिंसक सभ्यता पृथ्वी पर पहली बार आई है। सभ्यता के उदय के पहले भी चूहे मारे जाते रहे होंगे- बिल्ली द्वारा, लोमड़ी द्वारा, कुत्ते द्वारा, लेकिन यह खाद्यचक्र का एक हिस्सा था। खाद्यचक्र धरती पर सबसे वाहियात चीज है- कुछ प्रजातियां जन्म ही इसलिए लेती हैं कि वे दूसरी प्रजातियों का आहार बन सकें। मनुष्य चाहे तो इस निर्मम खाद्यचक्र से निकल सकता है, पर मुर्गे, बकरे, भेड़ आदि के मांस और तरह-तरह की मछलियों का स्वाद छोड़ नहीं पाता। युद्ध में तो वह अपनी ही प्रजाति के सदस्यों को मार डालता है, जिसका एक भी उदाहरण पशु जगत में नहीं पाया जाता। उसके लिए मरा हुआ बकरा और कमजोर इनसान समान रूप से लोभनीय हो सकते हैं। 

मैं अपना अपराध कबूल करता हूं कि पार्किंग में हमारी कार नहीं होती, तो वे दोनों चूहे शायद अभी तक जिंदा होते और अपने-अपने बिल में अनाज, रोटी, कपड़ा या कागज कुतर रहे होते। पर उनकी हत्या का असली पाप उस टेक्नोलॉजी पर है, जो आदमियों की सुख-सुविधा का ध्यान तो रखती है, पर इसकी परवाह नहीं करती कि इस सुख-सुविधा के लिए जो यंत्र बनाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित भी हों। आदमियों के लिए ही नहीं, दूसरे जीव-जंतुओं के लिए भी। 

आज तक कोई ऐसी कार बनाई नहीं गई है, जिसमें दुर्घटना करने की क्षमता न हो। इसी तरह, ऐसी भी कोई कार नहीं बनाई गई है, जो चूहों या अन्य लघु जंतुओं के लिए सुरक्षित हो। हमारी कार के ढांचे में जरूर ऐसे रास्ते होंगे, जिनसे होकर बड़े जानवर तो नहीं, पर चूहे प्रवेश कर सकते हैं। वे दोनों चूहे भी अन्न की तलाश में या यों ही तफरीह करते हुए हमारी गाड़ी में घुसे होंगे। उन्हें क्या पता था कि वे कत्लगाह में प्रवेश कर रहे हैं। चूहे देखने में सुंदर नहीं लगते, पर वे इंजीनियर भी सुंदर नहीं लगते, जो कार बनाते हैं। 


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