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सियासत की फिजा बदल गया अमर प्रेम PDF Print E-mail
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Wednesday, 06 August 2014 09:56

अंशुमान शुक्ल

लखनऊ। राजनीति में न ही कोई स्थायी शत्रु होता है न मित्र। मंच से जब इसके मायने स्पष्ट होते हैं तो कही-अनकही सब सामने होती है।







अंशुमान शुक्ल

लखनऊ। राजनीति में न ही कोई स्थायी शत्रु होता है न मित्र। मंच से जब इसके मायने स्पष्ट होते हैं तो कही-अनकही सब सामने होती है। परायों का अपना होना और अपनों के प्रति परायापन समाजवादी पार्टी की पहचान बनती जा रही है। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर खुद को लोहियावादी न मानते हुए मुलायमवादी बताने वाले अमर सिंह की अखिलेश सरकार की तरफ से की गई अगुआई आजम खां की रुसवाई का सबब बन गई है। छोटे लोहिया की जयंती पर उनके नाम पर बनाए गए पार्क के लोकार्पण में न आजम आए, न प्रोफेसर रामगोपाल। मंच पर मुलायम सिंह यादव से तीन कुर्सियों के फासले पर अमर सिंह की मौजूदगी वह कह गई जिसके अहसास ने पुराने समाजवादियों के चेहरे बदरंग कर दिए। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के आमंत्रण पर अमर सिंह ने छोटे लोहिया की स्मृति में आयोजित भव्य कार्यक्रम में शिरकत की। इस बात का खुलासा अमर सिंह ने खुद मंच से किया। चार बरस पहले समाजवादी पार्टी से निकाले गए अमर सिंह ने अपने पुराने अंदाज में मुलायम का स्तुतिगान यह कह कर किया कि वे समाजवादी नहीं मुलायमवादी हैं। उनका यह बयान समाजवादी पार्टी और अमर सिंह को लेकर लगाए जा रहे तमाम कयासों पर विराम लगाने के लिए काफी है। खुद को मुलायमवादी बताकर अमर सिंह ने मुलायम को रफीकुल मुल्क की उपाधि से संबोधित करने वाले आजम खां को मुलायम की नजरों में रुसवा करने की कोशिश की। बिना समाजवादी पार्टी में आए अमर सिंह ने पार्टी के भीतर भूचाल मचा दिया। मुलायम के हृदय में फिर जागे अमर प्रेम की भनक प्रोफेसर राम गोपाल यादव को पहले ही हो चुकी थी। इसलिए उन्होंने भी छोटे लोहिया के समारोह से किनारा करने में ही भलाई समझी। चार सौ एकड़ में फैले एशिया के सबसे विशाल पार्क की अखिलेश यादव की परिकल्पना पार्टी के नेताओं के व्यक्तिगत स्वाभिमान के सामने बौनी पड़ गई। नया समाजवाद, पुराने समाजवाद और समाजवादियों दोनों पर भारी दिखा। चार बरस पहले की बात है जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समय से जनेश्वर मिश्र के मित्र रहे मोहन सिंह ने अमर सिंह और जयाप्रदा का समाजवादी पार्टी से बर्खास्तगी का एलान किया था।


जनेश्वर मिश्र की जयंती पर खुद को मुलायमवादी बता कर अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी में दाखिल होने वाले दरवाजों को खुद खोलने की कोशिश की है। देखना यह है कि उनकी कोशिशों का कितना असर मुलायम सिंह यादव पर होता है। 

बात-बात पर रूठ जाने की आदत से ग्रस्त आजम खां मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से नाराज हैं। उन अखिलेश यादव से जिन्हें टीपू से सुलतान बनाने का दावा आजम खां कई मर्तबा कर चुके हैं। अपनी धुन में रहने वाले समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य आजम खां उर्दू अकादमी के अपने विभागीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को न्योता दे कर नहीं आने की हिमाकत कर चुके हैं। वे भी मुख्यमंत्री आवास पर। उनके न आने की वजह से कार्यक्रम को करीब दो घंटे देरी से शुरू किया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कई बार आजम खां के बारे में जानकारी भी ली। लेकिन मुलायम को रफीकुल मुल्क बताने वाले आजम खां अपनी जिद को अधिक बड़ा बना बैठे। 

उत्तर प्रदेश की सरकारी फिजा में तेजी से बदलाव महसूस किए जा रहे हैं। प्रोफेसर रामगोपाल यादव, आजम खां और उन सरीखे कई और अहम ओहदेदार अखिलेश  यादव से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं। असंतोष के कारण स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन सुलग जरूर कुछ न कुछ रहा है। इस गंध को भारतीय जनता पार्टी लोकसभा के चुनाव के दरमयान ही भांप चुकी थी। इसलिए उमा भारती बरबस बोल बैठी थीं कि समाजवादी पार्टी के पचास से अधिक विधायक उनके संपर्क में हैं। उमा भारती की कही को शुरुआत में सियासी अधिक माना गया। लेकिन पिछले कुछ दिनों में समाजवादी पार्टी के भीतर जिस तेजी से घटनाक्रम घटित हो रहा है उससे तस्वीर पर छाई धुंध छट रही है। 

जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में अमर सिंह की मौजूदगी ने सभी के जेहन में एक सवाल पैदा किया है कि क्या अमर सिंह वापस समाजवादी पार्टी में शामिल होंगे? क्या मुलायम सिंह यादव का अमर प्रेम अब भी कायम है? क्या अखिलेश यादव अपने इन पुराने ‘अंकल’ को पार्टी में शामिल करने पर सहमत होंगे? अगर इनमें से किसी भी एक सवाल का जवाब सकारात्मक हुआ तो उसके परिणाम समाजवादी पार्टी को परेशान कर सकते हैं। इन परिणामों की जद में आजम खां, प्रोफेसर राम गोपाल यादव तो आएंगे ही, पार्टी के कई विधायक भी होंगे जो अमर सिंह से पहले से नाराज बताए जाते हैं। 

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