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ग्लासगो का हासिल PDF Print E-mail
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Tuesday, 05 August 2014 13:02

जनसत्ता 5 अगस्त, 2014 : रविवार को ग्लासगो के हैंपडेन पार्क में भव्य समारोह के साथ इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों का समापन हुआ और यह आयोजन खेल भावना के विस्तार और इसके जरिए दुनिया भर को सौहार्द का संदेश देने में कामयाब रहा। इसमें जितने भी देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया, उनके लिए प्रतियोगिता में खुद को श्रेष्ठ साबित करने और देश के लिए पदक हासिल करने का मकसद भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था। 1986 के बाद पहली दफा इंग्लैंड ने आस्ट्रेलिया को पीछे छोड़ कर अट्ठावन स्वर्ण और कुल एक सौ चौहत्तर पदक लेकर पहला स्थान हासिल किया, तो कनाडा और स्कॉटलैंड क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर रहे। जहां तक भारत का सवाल है, इसे पांचवें स्थान से संतोष करना पड़ा। पंद्रह में से बारह स्वर्ण पदक कुश्ती, भारोत्तोलन और शूटिंग से मिले। जाहिर है, दूसरे खेलों में भारत को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। फिर भी यह सच है कि दीपिका पालीकल और जोशाना चिनप्पा की जोड़ी ने जहां स्क्वैश की महिला डबल्स में और पुरुषों के डिस्कस थ्रो में विकास गौड़ा ने पहली बार स्वर्ण पदक दिलाया, वहीं बत्तीस साल बाद भारत ने पारुपल्ली कश्यप के बेहतरीन प्रदर्शन के बूते पुरुष बैडमिंटन में स्वर्ण पदक अपनी झोली में वापस लिया। सबसे दमदार मौजूदगी भारतीय टीम के पहलवानों ने दर्ज कराई, जिनमें चौदह में से तेरह ने कुश्ती के पदक जीते। भारतीय हॉकी टीम स्वर्ण की उम्मीद दिलाते हुए फाइनल में तो पहुंच गई, लेकिन आस्ट्रेलिया से शून्य के मुकाबले चार गोल से हार कर, रजत पदक हासिल कर, राष्ट्रमंडल खेलों में अपनी पुरानी जगह ही बचा सकी।

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रदर्शन आमतौर पर अच्छा रहा है। ओलंपिक में दुनिया भर से मुकाबला रहता है। पर एशियाई और अफ्रीकी-एशियाई मुकाबले भी राष्ट्रमंडल की तुलना में काफी कड़े होते हैं, जिनमें चीन जैसे विश्व-चैंपियन की मौजूदगी रहती है। भारत चाहे तो इस बात में तसल्ली ढूंढ़ सकता है कि इस बार उसकी सफलता का प्रतिशत 2010 के मुकाबले अधिक रहा, उसके हर तीसरे एथलीट को पदक मिला। जबकि चार साल पहले के मुकाबलों में भारत के हर


पांचवें एथलीट को पदक मिला था। इस बार भारत के दो सौ बारह खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया, जबकि 2010 में यह तादाद छह सौ थी। इस बार तीरंदाजी, टेनिस, ग्रीको रोमन कुश्ती जैसे कई मुकाबले शामिल नहीं थे। लेकिन यह बात तो सभी प्रतिभागी देशों पर लागू होती है। इसलिए सफलता-दर का तथ्य हारे को हरिनाम जैसा ही मालूम पड़ता है। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अड़तीस स्वर्ण सहित कुल एक सौ एक पदक जीते और दूसरा स्थान हासिल किया था। इस बार पंद्रह स्वर्ण सहित कुल चौंसठ पदकों के साथ वह पांचवें स्थान पर खिसक गया। अलबत्ता भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत और बेहतरीन प्रदर्शन से भविष्य के लिए नई उम्मीद जगाई है। भारोत्तोलन, कुश्ती, बॉक्सिंग और शूटिंग में भारतीय महिला प्रतिभाओं ने अपने देश के पुरुषों से बेहतर प्रदर्शन किया। कुछ अहम कामयाबियों के बूते हम खुश जरूर हो सकते हैं, लेकिन सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत का स्कॉटलैंड जैसे बहुत कम जनसंख्या वाले देश से भी पदक तालिका में पीछे रहना अपने आप में एक सवाल है। राष्ट्रमंडल खेल संपन्न होते-होते ग्लासगो में भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव राजीव मेहता और कुश्ती रेफरी वीरेंद्र मलिक की गिरफ्तारी की भी खबर आई। मेहता पर नशे में गाड़ी चलाने का आरोप है और मलिक पर यौन उत्पीड़न का। इससे ग्लासगो भारत के लिए शर्मिंदगी का भी विषय बना है।


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