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गाजा के गुनहगार PDF Print E-mail
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Tuesday, 05 August 2014 12:59

अख़लाक़ अहमद उस्मानी

 जनसत्ता 5 अगस्त, 2014 : इजराइल के गाजा पर बर्बर हमलों में बुरी तरह घायल तेईस साल की शायमा पेट से थी।

खान यूनिस अस्पताल में पांच दिन बाद जब शायमा जिंदगी की जंग हार गई तो डॉक्टरों ने आनन-फानन आॅपरेशन कर उसके गर्भस्थ शिशु को बचा लिया। लेकिन गाजा में जिंदगी इतनी आसान नहीं है। इजराइली सेना के हमले में ध्वस्त गाजा के बिजलीघर से बिजली बंद होने से नवजात बच्ची का इंक्यूबेटर भी बंद हो गया। मरी हुई शायमा के पेट से जिंदा निकाली गई ‘मिरेकल बेबी’ को कातिल इजराइली फौज ने मार डाला। बच्ची को शायमा के बराबर में दफना दिया गया। दो दिन की शायमा की बेनाम बच्ची भी उन गुनहगारों में शामिल है जिन्हें इजराइल अपना दुश्मन मानता है।

गाजा के जबलिया में संयुक्त राष्ट्र के बचाव कार्य विभाग के एक स्कूल पर तीस जुलाई को इजराइल के बर्बर हमले में उन्नीस लोग मारे गए जिनमें अधिकतर बच्चे हैं। संयुक्त राष्ट्र के बचाव कार्य के प्रवक्ता क्रिस गंस ने रुंधे गले से कहा ‘फिलस्तीनियों का हक, यहां तक कि उनके बच्चों का हक पूरी तरह से मार डाला गया है।’ इसके आगे वे कुछ बोलते उससे पहले ही अलजजीरा टीवी पर फूट-फूट कर रोने लगे। बुलेटिन को बीच में रोकना पड़ा। दरअसल, गंस बच्चों की दर्दनाक मौत और घायलों की चीत्कार से हताश हो गए थे। गंस के लिए यह नई बात हो सकती है लेकिन गाजा के लोगों के लिए इजराइल की वहशियत की यह तस्वीर नई नहीं है। 

अमेरिका से 70.5 अरब डॉलर के मुफ्त हथियार ले चुके इजराइल ने अगले ही दिन एक और स्कूल पर मिसाइल दाग दी। गंस ने रशिया टुडे को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि लाखों लोग बेघर हैं और वे संयुक्त राष्ट्र के स्कूलों में पनाह लेते हैं और इजराइल उन्हें मार रहा है। उन्होंने कहा कि इजराइल की सेना को सत्रह संदेश दिए गए थे कि यहां बच्चे हैं, तब भी उन्होंने स्कूल पर हवाई हमला किया। गाजा में कुल सत्तर हजार बच्चे हैं जिनके जिस्म के जख्मों को भर भी दिया गया तो उनके मन पर लगी भय की चोट को कैसे ठीक किया जा सकेगा? फिलस्तीन पर इजराइल के हालिया कहर में करीब एक महीने में (यह लेख लिखने तक) लगभग अठारह सौ फिलस्तीनी मारे गए हैं। इजराइल के अस्तित्व में आने के बाद यह गाजा पर सबसे बड़ा हमला है। 

इजराइली सेना ने हजारों घरों को मिट्टी में मिला दिया है। लाखों लोग सड़कों पर बेसरो-सामान पड़े हुए हैं। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, बेकरी, डेयरी और आम जरूरत की छोटी दुकानों को ध्वस्त कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इन हमलों में गाजा के तीन सौ बच्चे मारे गए हैं जिनमें दो सौ बच्चों की उम्र बारह साल या उससे कम है। इजराइल ने इसके जवाब में कहा कि उसके हमलों में मारे गए लोगों में सैंतालीस प्रतिशत लोग आतंकवादी हैं। और अगर बाकी तिरपन फीसद बुजुर्ग, महिलाएं और मासूम हैं तो इस गुनाह का जुर्माना क्या है?

गाजा पर इजराइल के हमले के खिलाफ  तेल अवीव में यहूदियों के जबर्दस्त प्रदर्शन से बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार सकपका गई है। पूरे यूरोप में रोजाना बेशुमार प्रदर्शन हो रहे हैं। इंग्लैंड में सत्ताधारी पार्टी के सांसदों ने डैविड केमरन को लताड़ना शुरू कर दिया है। फ्रांस और जर्मनी में लोग घरों में जाने को राजी नहीं। अमेरिकी जनता में इजराइल के खिलाफ  भारी रोष है। इस्लामी देशों में स्वाभाविक रूप से इजराइल का विरोध हो रहा है। भारत में वामपंथी और छात्र संगठन लगभग रोजाना इजराइली दूतावास के आगे प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वहाबी जमातें चुप हैं। ऐसा क्यों है? 

सऊदी अरब को छोड़ कर पूरे अरब मेंइजराइल की थू-थू हो रही है। व्यापक मानव संसाधन, परमाणु सुरक्षा और व्यापारिक हितों में दखल रखने वाले इजराइल के पास शक्ति और संतुलन का बेजोड़ फॉर्मूला है लेकिन राजनीतिक अदूरदर्शिता, असहिष्णुता और अमेरिका की नकल के चक्कर में उस पर एक निष्ठुर राष्ट्र का लेबल चिपक गया है।

युद्ध की मर्यादाएं और नागरिक सुरक्षा के सारे मानक ताक  पर रख देने के बाद भी क्या इजराइल अपना मकसद हासिल कर पाएगा? सवाल तो यह भी है इजराइल का मकसद है क्या? क्या हमास को तबाह करने से वह शांति से रह पाएगा? अगर हमास ही समस्या की जड़ है तो महान स्वतंत्रता सेनानी यासिर अरफात की पार्टी फिलस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) और फतह पार्टी के प्रभाव वाले पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) से इजराइल संतुष्ट है? हमास के गठन की योजना में अगर कहीं इजराइल भी शामिल था तो हमास अपने ही आकाओं को क्यों डसने लगा? कौन हैं जो हमास से अपने राजनीतिक लक्ष्य साधते हैं? सीरिया में मुंह की खाकर इराक  में घुसे दुर्दांत वहाबी आतंकवादियों के कथित नस्ली जिहाद का हमास-इजराइल टक्कर से क्या रिश्ता है? और सबसे बड़ा सवाल कि छिप-छिप कर मिलने वाले सऊदी अरब और इजराइल के अवैध प्रेम संबंध में खलल डालने वालों की ताकत ज्यादा बड़ी हो गई है?

इजराइल का तर्क है और काफी हद तक यह सच भी है कि इस्लामी प्रतिरोधी आंदोलन यानी हमास के लड़के उसकी सीमा पर असैनिक मिसाइलें दागते हैं जिससे उसकी सुरक्षा पर खतरा है। इस बार का झगड़ा तो तीन इजराइलियों के अपहरण और हत्या के बाद शुरू हुआ। यह हमास है क्या? मुसलिम राजनीतिक एकता के नाम पर वहाबी राजशाहों के पैसों से खड़े किए गए मुसलिम ब्रदरहुड की फिलस्तीनी शाखा का नाम ही हमास है। जिस हमास के भगोड़े आका खालिद मशाल को सीरिया ने इजराइल-विरोध के नाम


पर पनाह दी, उसी खालिद ने सीरिया में प्रायोजित गृहयुद्ध और आतंकवाद शुरू होते ही विपक्षी आतंकवादी संगठनों का साथ देना शुरू कर दिया। 

जॉर्डन समेत कई देशों ने हमास का खेल समझ में आने के बाद इस पर प्रतिबंध लगाया तो हमास अपने आका कतर की शरण में आ गया। दरअसल, यासिर अरफात के गांधीवादी, धर्मनिरपेक्ष, अहिंसक और अंतरराष्ट्रीय समर्थन से तैयार की गई फिलस्तीन राष्ट्र की आजादी के आंदोलन को हिंसा के रास्ते आजादी का सपना दिखाने वाला हमास ही पटरी से उतार सकता था। 

  जब से हमास का जन्म हुआ है फिलस्तीन भी वैचारिक मतभेद में बंट गया। हमासी कट््टर तत्त्वों को गाजा और अरफाती उदारपंथ को वेस्ट बैंक में जगह मिली। यह बंटवारा व्यापक है। मशहूर पुस्तक ‘डेविल्स गेम: हाउ द युनाइटेड स्टेट्स हैप्ल्ड अनलीश फंडामेंटलिस्ट इस्लाम’ के लेखक और अमेरिका-इजराइल और सऊदी अरब की तिकड़ी की ‘कॉन्सपिरेसी थ्योरी’ के माहिर रॉबर्ट ड्रायफस ने एक्यूरेसी डॉट ऑर्ग से कहा कि हमास के जन्म के साथ ही गाजा पट्टी में दो सौ मस्जिदों की तादाद छह सौ हो गई। 

जाहिर है, इसका पैसा बाहर से आया था। इजराइल के खिलाफ  अगर हमास साजिश कर रहा था तो गाजा में उसे पांव क्यों जमाने दिए गए? इन बीस सालों में हमास ने हमेशा यासिर अरफात के मुक्ति आंदोलन की आलोचना की। हमास की शक्ल में मुसलिम ब्रदरहुड ने यासिर के अलावा फिलस्तीन मुक्ति आंदोलन में साथ दे रहे नासिरवादियों, वामपंथियों और बाथ पार्टी का भरपूर विरोध किया। हमास के ये सारे रास्ते इजराइल को फायदा पहुंचाने वाले थे। बल्कि हमास ने अपनी हिंसक वारदातों से विरोधी राष्ट्रों और मीडिया के एक हिस्से को फिलस्तीन आंदोलन को बदनाम करने का मौका दिया। यह क्रम अब भी जारी है। 

आज हमास की कमान 1967 वाले हाथों में नहीं है। अब मुसलिम ब्रदरहुड नाम का संगठन कतर के तानाशाह तमीम बिन हम्माद अलसानी के पैसों से चलता है। वही मुसलिम ब्रदरहुड जिसने मिस्र में चुनाव जीत कर मुहम्मद मुर्सी की सरकार बनाई थी लेकिन एक ही साल में अपने घोर वहाबी सलफी एजेंडे के कारण गिर भी गई। मिस्र की उदार सुन्नी जनता के गुस्से के बहाने से उपजे राजनीतिक गतिरोध का सऊदी अरब ने फायदा उठाया और मिस्री सेना का साथ देकर मुसलिम ब्रदरहुड को उखाड़ फिंकवाया। मगर वहाबी सऊदी अरब ने उदार सुन्नी राजनीतिक शक्तियों की मदद क्यों की? 

वहाबी रणनीति पर सऊदी अरब अपना एकाधिकार चाहता है यानी कतर अगर अपना समांतर साम्राज्य खड़ा करेगा तो सऊदी अरब उसे नष्ट करेगा। दूसरा, मिस्र में मुसलिम ब्रदरहुड की सरकार बनी रहती तो उसकी सीमा से लगे हुए गाजा में हमास भी तो मुसलिम ब्रदरहुड ही है। मिस्र में मुसलिम ब्रदरहुड की सरकार गिरवा कर सऊदी अरब ने गाजा में हमास की सप्लाई काट कर अपने प्रेमी इजराइल को सुरक्षित करवा दिया। जो इजराइल हमास के गठन के दौरान इसे इस्लामी एकता में दरार की साजिश समझ कर चुप बैठा था, क्या उसकी राजनीतिक समझ इतनी ही थी कि वही हमास उसके लिए नासूर बन जाए?

आप शायद महसूस कर रहे होंगे कि जब से हमास-इजराइल संघर्ष शुरू हुआ है, इराक  में आइएसआइएस के आतंकवादियों का बर्बर और वहशी नाच थम सा गया है। इराक  के प्रधानमंत्री नूर अलमालिकी के शब्दों में सऊदी अरब के पाले हुए आइएसआइएस आतंकवाद से मुसलिम जगत में अस्थिरता व्याप्त हो गई थी और कतर की गैस पाइपलाइन योजना को भारी धक्का लगा था। जब से कतर समर्थित हमास और विरोधी इजराइल में संघर्ष शुरू हुआ है, इजराइल और सऊदी अरब की सिट््टी-पिट््टी गुम हो गई है। चूंकि हमास को सऊदी अरब का आज कोई समर्थन नहीं है तो सऊदी अरब के पैसे पर पलने वाले मुसलमान रहनुमा इजराइल के खिलाफ  क्यों प्रदर्शन करेंगे? 

भारत में सऊदी अरब की सबसे बड़ी वकालत करने वाले मौलानाओं ने इजराइल के खिलाफ  प्रदर्शन के बजाय अखबारों में यह अपील जारी की कि वे इजराइल के जुल्म के खात्मे के लिए अल्लाह से दुआ करें। दरअसल, मुद््दा यह है कि मुसलिम रहनुमाई का ढोंग कर रहे ये मौलाना अगर इजराइल के खिलाफ  प्रदर्शन करते हैं तो वहाबी जगत में यह संदेश चला जाएगा जो मुसलिम संगठन इजराइल के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहा है वह कतर के खेमे में है। सऊदी अरब की गांठ से पैसा भी जाए, राजनीतिक नुकसान भी हो और नाम कतर का हो, इतने घाटे रियाद बर्दाश्त नहीं कर सकता।

आज हमास की पहचान फिलस्तीन राष्ट्र की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले आंदोलन के बजाय आतंकवादी संगठन की है। इजराइल साठ सालों से हमलावर तरीके  से निपटने में साढ़े इक्कीस हजार जानों का गुनहगार बन चुका है। फिलस्तीन और इजराइल की मुक्ति यासिर अरफात के पास थी। वही यासिर जो बहुत बड़े गांधीवादी नेता थे। गांधी से भटक कर आज पाकिस्तान जिस कगार पर पहुंच गया है, यासिर से भटक कर इजराइल और हमास भी वहीं पहुंच जाएं तो आश्चर्य मत कीजिएगा।


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