मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
रौब की सवारी PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Tuesday, 05 August 2014 12:54

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

जनसत्ता 5 अगस्त, 2014 : देश को स्वतंत्रता मिली पर विदेशी सांचे में ढले शक्तिशाली वंश लुप्त हो जाएं, ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजी मोरिस आॅक्सफोर्ड के सांचे में ढल कर जन्मी उसकी कई पीढ़ियों ने देश में गणतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद दशकों तक ठसके से राज किया। पिछले कुछ दशकों में उसकी एकछत्र सत्ता को बुरी नजर लग गई थी। कई नए चेहरों के आ जाने से उसके राज की अक्षुण्णता तो भंग हुई, पर केंद्र सरकार पर उसकी पकड़ बनी ही रही। हां, कुछ राज्य सरकारों ने मोह भंग होने का संकेत अवश्य दिया। मृतप्राय होकर भी वह जीवित होने का स्वांग करती रही।

एक वह भी युग था कि जीवन की उपलब्धियों का उद्घोष करने के लिए उसकी मंथर चाल का सहारा लेना पड़ता था। उसके तार सरकारी तंत्र से सशक्त रूप से जुड़े थे। पर समय के साथ न बदल पाने की कमजोरी ने जब डायनासोर जैसी हस्तियों का इस धरती से नामो-निशां मिटा दिया तो उत्तरोत्तर नए सांचे में न ढल पाने की इसकी कमजोरी कब तक इसे जी लेने देती। अंत में जनता का मोहभंग हो ही गया। उसकी गजगामिनी मंथर चाल, उसकी सुदृढ़ देह का भारीपन और तद्जन्य उसकी भारी खुराक लोगों को अखरने लगी। और घोर आश्चर्य कि कुछ समय पहले जब देश के राज्यतंत्र में बड़ा बदलाव आया, उसी दिन उसके अभिभावकों ने उसे काल के गर्त में धकेल देने का फैसला कर लिया। नहीं-नहीं, मेरी बातों का कोई राजनीतिक पक्ष नहीं है, न मैं किसी दल-विशेष की चर्चा कर रहा हूं! मैं बात कर रहा हूं देश की सड़कों पर दशकों तक शान से राज करने के बाद अब अतीत के गर्त में लुप्त होने को मजबूर एंबेसडर कार की।

सूर्य की किरणों में समाहित सातों रंगों का तेज श्वेत किरणों में ढल कर और भी प्रखर हो उठता है। सूर्य के रथ के घोड़े अपने सारथी के हाथों में जैसी अदम्य ऊर्जा दे देते हैं, वैसी ही ऊर्जा से देदीप्यमान होती थी श्वेत एंबेसडर। उसके ऊपर गरुड़ध्वज सरीखी लाल बत्ती लग जाती थी तो उसके अंदर बैठा हुआ व्यक्ति खुद को मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित मूर्ति मानने लगता था। सोने पर सुहागा का काम करते थे आगे-पीछे चलने वाली गाड़ियों में स्वचालित राइफलों से लैस सुरक्षाकर्मीगण। देवताओं के वाहनतुल्य लाल बत्ती वाली एंबेसडर मोटरकारों से एक ही दर्जे नीचे होती थीं नीलवर्ण बत्तियों से अलंकृत श्वेत एंबेसडर गाड़ियां। ये दफ्तरों में अफसरों को पहुंचाने के बाद शहर के सबसे महंगे बाजारों में शॉपिंग के लिए अफसरपत्नियों के हवाले कर दी जाती थीं, जिन्हें कभी सशस्त्र सुरक्षा कर्मचारियों का सम्मान मिलता था तो कभी


मिलते थे केवल सफेद वर्दी पर चपरास लगाए शस्त्रविहीन कर्मचारी जो खरीदारी का बोझ उठाने में सहयोग देते थे।

आती तो थी वह और रंगों में भी, पर सफेद एंबेसडर की बात ही कुछ और थी। लाल बत्ती, नीली बत्ती उसके ऊपर चमकने में ही उसका सारा माहात्म्य नहीं खत्म हो जाता था। सातवें आसमान पर पहुंच कर स्वर्गतुल्य सुख तो तब मिलता था जब बोनट के बगल में एक झंडा भी लहरा रहा हो। अब कोई कहे कि झंडा और बीकन तो किसी भी गाड़ी पर लग सकते हैं तो फिर एंबेसडर की ही चर्चा क्यों! एंबेसडर कार दरअसल एक युग, एक व्यवस्था, एक संस्कृति, एक मानसिकता, एक सोच का प्रतीक थी। वह यथास्थितिवाद का प्रतीक थी। जो चल रहा है, चलने दो। सरकार के सहारे जितना कुछ बन जाता है, सब बिक जाता है तो किसी सुधार या परिवर्तन की क्या आवश्यकता है। जिसका जहां कब्जा है, बने रहने दो। वह निर्भीक घोषणा करती थी कि उसके साथ एक पूरी राजकीय व्यवस्था है। जो इस व्यवस्था में निष्ठा-आस्था रखते हुए, उसकी आचार संहिता का पालन करेंगे, उन्हें मर्सिडीज और औडी आदि छिछली हल्की उपलब्धियां लगेंगी, क्योंकि एंबेसडर और वह भी श्वेत एंबेसडर एक वर्ग-विशेष का प्रतीक थी, जिसके सदस्य राज करने के लिए पैदा हुए थे।

अब जाकर श्वेत एंबेसडर को समझ में आया है कि बिना आमूलचूल परिवर्तन के केवल यदाकदा मुखौटे लगा कर उन्हीं को अपना नया अवतार घोषित करने, शासनतंत्र के ऊपर पूरी तरह से निर्भर होकर देश की जनता की एक बहुत बड़ी संख्या की आकांक्षाओं की अनदेखी करने से और केवल अपने गौरवमय अतीत के सपनों में खोए रहने से उसका अजर-अमर होना संभव नहीं है। पर जिनकी जिम्मेदारी थी कि इस सशक्त निधि में समयानुकूल संशोधन और नवीनता ला सकें, वे इसकी सफलता को शायद अक्षय निधि समझ बैठे। काश, इस शुभ्रवस्त्राविता ने अपने महाप्रयाण की कल्पना तब की होती, जब वह दंड-मंडितकरा भी थी!


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?