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वात्सल्य का मोल PDF Print E-mail
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Monday, 04 August 2014 10:11

रीतारानी पालीवाल

जनसत्ता 4 अगस्त, 2014 :  अक्सर देखने में आता है कि सही या गलत का निर्णय करने की धुन में हम भावना के पक्ष को भूल जाते हैं। लेकिन ऐसा करना हमेशा सही नहीं होता। मौजूदा समय में अखबार या टेलीविजन पर ऐसी घटनाओं की खबर सुनते हैं, जहां किसी मां ने सौ-दो सौ या दस-पांच हजार के लिए अपने बच्चे को किसी अन्य को दे दिया। खबर दिल दहलाने वाली होती है, लेकिन तभी तक, जब तक विस्तार से न पता चले। आज के सनसनीखेज प्रचार के जमाने में कभी-कभी लगता है कि हम लोक जीवन से, लोकमन की असलियत से दूर होते जा रहे हैं। घटनाओं और स्थितियों की व्याख्या अपनी सुविधानुसार या संदर्भ से काट कर देने लगते हैं। कुछ समय पहले पहले की एक खबर के अनुसार आंध्र के कृष्णा जिले में एक मजदूर दंपति ने अपनी नवजात बालिका एक निस्संतान दंपति को पांच हजार रूप में बेच दी। खबर के मुताबिक राज्य के महिला विकास एवं बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों ने इसे लड़की-लड़के में भेदभाव की घटना माना, क्योंकि श्रमजीवी दंपति के पास पहले से ही दो बेटियां हैं। उन्होंने स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और पुलिस की सहायता से बच्चे को खरीदने वाले निस्संतान दंपति से छुड़ा कर शिशु गृह में भेज दिया। इस तरह नियम-कानून का पालन करते हुए सही कार्य करने का प्रयास किया। लेकिन आज महिला सशक्तीकरण के जमाने में स्त्री पर होने वाले अन्याय के प्रश्नों की भी उनकी बहुआयामी जटिलताओं में देखा जाना चाहिए, एकतरफा ढंग से नहीं।

‘बेटी बचाओ अभियान’ आज समय की सबसे बड़ी जरूरत है उसे सम्मानपूर्वक कार्यान्वित किया जाना चाहिए। मीडिया को भी इस दिशा में सावधानीपूर्वक सकारात्मक भूमिका निभाने की जरूरत है, लोकमन के सकारात्मक पक्षों को पहचानते हुए। साथ ही जिन लोगों और और संस्थाओं का कानूनी दायित्व और अधिकार है, उन्हें भी समाज में, लोक जीवन में मौजूद मानवीय आत्मविस्तार की ओर से मुंह नहीं फेर लेना चाहिए। सरकारी विभाग और मीडिया भले ही इसे बेटी के प्रति भेदभाव मानते हुए साधनों के अभाव में उसे बेचने की घटना माने, भारतीय सामाजिक संरचना का एक और पक्ष है, जिसके प्रति बेरुखी ईमानदारी नहीं होगी। गोद लेने की प्रथा भारतीय समाज में न जाने कब से मौजूद है। इसका उद्देश्य संतान से वंचित व्यक्ति को बच्चा देकर उनके जीवन को भरा-पूरा बनाना है। आजकल शिशु-गृह या अनाथाश्रम जैसी संस्थाएं है, जिनसे लोग औपचारिक रूप से बच्चा गोद लेते हैं।

लेकिन पारंपरिक समाज में लोग अपने परिवार या किसी संबंधी दंपति के बच्चे को गोद लिया करते थे, क्योंकि परिचय निकटता, आस्था और विश्वास पैदा करता था। आज विज्ञान की सहायता से निस्संतान दंपति को भी विज्ञान की सुविधाओं से संतान पाने का अवसर मिला है। लेकिन इतना महंगा कि रईस लोग ही उसका


लाभ उठा सकते है। आज के जमाने में जब संयुक्त परिवार समाप्त हुए हैं, शहरीकरण और रोजगार के लिए दूर जाने की प्रक्रिया में पुराने ढंग की निकटता के रिश्ते नहीं रहे हैं। ऐसे में लोग रिश्तेदारों के बजाय दूर के लोगों के बच्चों को भी दत्तक ग्रहण करने लगे हैं, क्योंकि परिवारों में बच्चों की संख्या पहले की अपेक्षा कम होती है। साथ ही जीवन में व्यक्तिवाद भी बढ़ा है।

भूख से लड़ते हुए अपने आप से पराजित माता-पिता द्वारा संतान को बेच देने की कथाएं साहित्य में पुराने जमाने से लेकर आधुनिक काल में भी मिलती हैं। जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भूख से तड़पते और मरते हुए लोगों के चित्र बार-बार आते हैं। ‘अजातशत्रुु’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’ में यह चर्चा है। ‘करुणालय’ नामक गीतिनाट्य का तो कथावस्तु ही पेट की ज्वाला से तड़पते दंपति अजीगर्त और तारिणी का सौ गायों के बदले अपने मंझले पुत्र शुन:शेफ को हरिश्चंद्र पुत्र रोहित को बलि-पशु के रूप में बेच देने की घटना पर आधारित है। लेकिन इस पूरे प्रसंग में मानवीय भावनाओं की अस्वाभाविक ढंग से अनदेखी नहीं की गई है। तीन पुत्रों में अजीगर्त बड़े को इसलिए नहीं बेच पाता कि वह उसे अत्यधिक प्रिय है, छोटा मां का अत्यधिक दुलारा है। इसलिए मंझले पुत्र शुन:शेफ को बेच दिया जाता है। लेकिन जल्दी ही भेद खुलता है कि शुन:शेफ तो अजीगर्त और तारिणी का नहीं, विश्वामित्र और सुव्रता का पुत्र है। रहस्योद्घाटन होने पर वे उसे अपना कर उसकी रक्षा करते हैं।

लेकिन आजकल हमारे मीडिया में जिस तरह बच्चे को बेचने की घटनाएं प्रस्तुत की जाती हैं, वे सनसनी पैदा करने की प्रवृत्ति और बाजारवाद की मानसिकता का परिणाम दिखाई देती है। ध्यान देने की जरूरत है कि बिक्री करके धन वसूलना एक बात है और संतानहीन व्यक्ति को गोद दे देना दूसरी बात। पहले में धन पाना प्रमुख मानसिकता है, दूसरे में अन्य की सहायता। किसी कार्य को कानूनी ढंग से सही या न्यायोचित ठहराते हुए सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी तब तक नहीं होनी चाहिए, जब तक ऐसा करना अनिवार्य न हो।


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