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गतिरोध के बाद PDF Print E-mail
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Monday, 04 August 2014 10:08

altजनसत्ता 4 अगस्त, 2014 : पिछले हफ्ते भारत के रुख के कारण विश्व व्यापार संगठन का प्रस्तावित ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट यानी सुगम व्यापार समझौता अधर में लटक गया। डब्ल्यूटीओ के उन्नीस साल के इतिहास में मतभेदों और विवाद का सिलसिला चलता रहा है। पहली बार अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम-कायदों को एक वैश्विक समझौते की शक्ल मिलने की उम्मीद की जा रही थी। टीएफए के लिए इकतीस जुलाई की समय-सीमा तय की गई थी। लेकिन भारत की ओर इस समझौते की पुष्टि न होने से टीएफए के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, आस्ट्रेलिया और जापान जहां भारत के रुख को बेजा जिद मानते हैं, वहीं मोदी सरकार ने साफ किया है कि उसके फैसले के पीछे अपने किसानों के हितों और खाद्य सुरक्षा की फिक्र है। यह विवाद नया नहीं है, दोहा दौर की वार्ताएं शुरू होने के वक्त से ही चला आ रहा है। पिछले साल दिसंबर में बाली में हुए डब्ल्यूटीओ के नौवें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भी यह मुद््दा जोर-शोर से उठा था। तब एक समय लग रहा था कि रस्साकशी के चलते सम्मेलन नाकाम हो जाएगा और दोहा दौर की वार्ताओं को पटरी पर लाने की सारी कवायद बेकार चली जाएगी। ऐसे में एक बीच का रास्ता निकाला गया। प्रस्तावित समझौते में ‘शांति अनुच्छेद’ जोड़ा गया, जिसके मुताबिक कृषि सबसिडी या न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की सरकारी खरीद सीमित करने का प्रावधान चार साल तक लागू नहीं होगा, यानी तब तक इस छूट के खिलाफ डब्ल्यूटीओ के विवाद निपटारा प्राधिकरण में अपील नहीं की जा सकेगी। 

विकसित देश बाली में हुई इसी सहमति का हवाला देकर भारत सरकार के निर्णय की आलोचना कर रहे हैं। लेकिन भारत का कहना है कि वह टीएफए के खिलाफ नहीं है, वह चाहता है कि इसे मंजूर करने के साथ-साथ खाद्य सबसिडी के मसले का अंतरिम नहीं बल्कि स्थायी हल निकाला जाए। विकसित देश चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य कुल उपज के दस फीसद तक सीमित रहे। पर समस्या सिर्फ यही नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए वर्ष 1980 को आधार बनाया गया है। अगर ये सब बातें मान ली जाएं तो भारत के किसानों के लिए जो थोड़ी-बहुत राहत की व्यवस्था


चली आ रही है उस पर ग्रहण लग जाएगा। विकसित देशों की चिंता सिर्फ यह है कि किस तरह आयात-निर्यात के नियम और उदार हों और उन्हें दुनिया भर के बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने में कोई अड़चन न रहे। लेकिन इस मामले में खुद उनका व्यवहार विरोधाभासों से भरा रहा है। वे जब-तब शुल्कीय और गैर-शुल्कीय बाधाएं खड़ी करने से बाज नहीं आए। अब वे विश्व व्यापार संगठन का भविष्य खतरे में पड़ जाने या कम से कम टीएफए का सपना साकार न हो पाने का दुख जताते हुए सारा दोष भारत पर मढ़ रहे हैं। 

लेकिन दुनिया के विभिन्न देशों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं, और विश्व व्यापार संगठन की वार्ताओं में रह-रह कर उभरते रहे गतिरोध की यही वजह रही है। उन्हें भारत की विशेष स्थितियों को ध्यान में रख कर उसके रुख पर सहानुभूतिपूर्वक सोचना चाहिए। अगर टीएफए को वे दबाव डाल कर मनवा लेते हैं और कृषि सबसिडी का मसला अनसुलझा रह जाता है तो क्या भविष्य में समस्या खड़ी नहीं होगी? अगर चार साल बाद किसी देश के खिलाफ न्यूनतम समर्थन मूल्य की सीमा लांघने की शिकायत आएगी तो संभावित कार्रवाई से नए विवाद उठेंगे और टीएफए दोराहे पर होगा। इसलिए इकतीस जुलाई की जो समय-सीमा तय की गई थी, उसे अंतिम न मान कर जिनेवा में होने वाली अगली बैठक में फिर से सर्वसम्मति की कोशिश की जा सकती है। क्या कृषि सबसिडी के मसले को डब्ल्यूटीओ के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता?


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