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राहत का दस्तावेज PDF Print E-mail
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Monday, 04 August 2014 10:07

जनसत्ता 4 अगस्त, 2014 : सरकारी महकमों से विभिन्न कामों के सिलसिले में लोगों को कोई न कोई दस्तावेज जमा करना पड़ता है, चाहे वह जन्मतिथि से संबंधित हो या निवास स्थान से या शैक्षिक योग्यता आदि से। उनसे दस्तावेज की प्रमाणित प्रति की मांग की जाती है, अगर प्रमाणित न हो तो आवेदन खारिज कर दिया जाता है। लेकिन उसे प्रमाणित कराना साधारण नागरिकों के लिए कभी आसान नहीं होता। प्रमाणित करने का अधिकार राजपत्रित अधिकारी को है। लेकिन अधिकतर लोगों की ऐसे किसी अधिकारी तक पहुंच नहीं होती। उन्हें प्रमाणीकरण की गरज में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। अगर किसी राजपत्रित अधिकारी तक वे पहुंच भी जाएं तो अक्सर उन्हें निराशाजनक जवाब ही मिलता है। अधिकारी अमूमन यह कह कर मना कर देते हैं कि वे प्रार्थी को नहीं जानते। अपने दस्तावेज प्रमाणित कराने में आमतौर पर वही लोग सफल हो पाते हैं जो अपने परिचय के किसी उपयुक्त अधिकारी को ढूंढ़ पाते हैं। पर उनका वक्त तो जाया होता ही है। जो अधिकारी प्रमाणीकरण के लिए राजी हो जाते हैं, उनका भी कीमती समय इसमें नष्ट होता है। अगर दस्तावेज किसी राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित न हों तो हलफनामे की मांग की जाती है। लेकिन फिर इसके लिए नोटरी को सारे मूल कागज दिखाने होते हैं और उसका खर्च उठाना पड़ता है। तमाम गरीब या कम पढ़े-लिखे और अपढ़ लोगों के लिए हलफनामा बनवाना भी एक टेढ़ा काम होता है। ऐसे में गांवों या दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले और शहरों के भी कमजोर पृष्ठभूमि के लोगों की परेशानियों का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। 

लिहाजा, केंद्र सरकार का ताजा फैसला नागरिकों के लिए एक राहत भरा कदम है। उसने अपने सभी मंत्रालयों और विभागों को निर्देश जारी किया है कि वे आवेदकों के स्व-प्रमाणित दस्तावेज स्वीकार करें। मूल कागज या राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित दस्तावेज या हलफनामे की शर्त नागरिकों से संबंधित किसी काम के अंतिम चरण में ही लागू की जाए। इसी आशय का पत्र केंद्र के प्रशासनिक सुधार और जन शिकायत निवारण विभाग ने


राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को भी लिखा है। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि आवेदन के साथ स्व-प्रमाणित दस्तावेज स्वीकार किए जाएं, इससे जहां लोगों को रोज पेश आने वाली दिक्कतों से छुटकारा मिलेगा, आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकेगा, वहीं राजपत्रित अफसरों का मूल्यवान समय बचेगा। केंद्र सरकार का निर्देश उसी के अनुरूप है। कहीं-कहीं इसकी पहल पहले ही हो चुकी है। पर अब यह उम्मीद की जा सकती है कि पूरे देश में यह सुविधा सभी को हासिल होगी। प्रशासन और नागरिकों के बीच खाई औपनिवेशिक जमाने की देन रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसे बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। इसलिए हर स्तर पर नियम-कायदों को सरल और सुविधाजनक बनाने की दरकार है। इसी से जुड़ा तकाजा यह भी है कि प्रशासन से लोग अपनी भाषा में संवाद कर पाएंऔर न्याय पाने की लड़ाई अपनी भाषा में लड़ सकें। लेकिन उनका पाला अंगरेजी में लिखे नियम-कायदों से पड़ता है, तमाम जगह उन्हें अंगरेजी में आवेदन देने के लिए मजबूर किया जाता है, या मान्य प्रांतीय भाषा में दिए गए आवेदन का जवाब अंगरेजी में मिलता है। अदालतों में तो यह और भी होता है। प्रशासनिक सुधार को इस कोण से भी देखने की जरूरत है।


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