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धर्म राष्ट्रीयता का आधार नहीं PDF Print E-mail
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Monday, 04 August 2014 10:03

शीतला सिंह

 जनसत्ता 4 अगस्त, 2014 : गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा जो अपने को ईसाई हिंदू बताने के साथ ही देश को हिंदू राष्ट्र बता रहे थे, उन्होंने अपने बयान पर माफी मांग ली।

दूसरे मंत्री जिन्होंने यह दावा किया था कि मोदी देश को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे ही, वे भी डांट के कारण चुप हो गए हैं। विश्व हिंदू परिषद और उसका राष्ट्रवाद भी मोदी के सत्तारूढ़ होने के बाद थम गया है। हिंदुत्व-रक्षा के नाम पर हमेशा आक्रामक तेवर में रहने वाले प्रवीण तोगड़िया भी थोड़ा खामोश हैं। चुनावों में जो लोग हिंदू राष्ट्र के नाम पर वोट मांगना चाहते थे उन्हें तो पहले ही चुप करा दिया गया था, वे भी इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि देश को हिंदू राष्ट्र बनाने या मानने का अभियान शांत हो गया है, आज भी कुछ लोग इस प्रश्न पर तर्क जुटा कर प्रचारित कर रहे हैं कि आखिर इसमें बुराई क्या है।

देश का भावी स्वरूप और भविष्य क्या हो, इसका निर्धारण लोकतंत्र में देश की जनता को करना है। यह हथियारों के बल पर नहीं बल्कि निर्वाचन में प्रभावी जनशक्ति से ही संभव है। क्योंकि सरकार को ही भावी स्वरूप निर्धारित करने का अधिकार है- संवैधानिक निष्ठा की शपथ के माध्यम से शासन संभालने वाले, जिन्हें लोकसभा के प्रति जवाबदेह माना गया है। उसी संसद को जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों आती हैं, संविधान में परिवर्तन और परिवर्धन का भी अधिकार है। अब यह बाधा भी सर्वोच्च न्यायालय ने दूर कर दी है जिसके पहले किसी खंडपीठ का यह निर्णय था कि संसद को मूल अधिकारों और संविधान के बुनियादी स्वरूप में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। 

मूल अधिकारों में से जब संपत्ति का अधिकार समाप्त करने संबंधी परिवर्तन संसद ने सरकार की इच्छा से किया और बहुमत से वह पारित भी हो गया, राष्ट्रपति ने उसे स्वीकृति भी प्रदान कर दी, तब सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे संविधानेतर नहीं माना। जब यह मान लिया गया कि संविधान के किसी अंग को संसद द्वारा संशोधित किया जा सकता है, बाध्यता यही होगी कि यह संशोधन किसी अन्य प्रसंग में विरोधाभासी न हो या उसके विपरीत अर्थ न निकाले जाएं जिससे संविधान में एकरूपता के बजाय दोहरापन दिखाई दे। 

जहां तक हिंदू राष्ट्र का प्रश्न है, इसमें दोनों शब्दों को पुनर्परिभाषित करना पड़ेगा। राष्ट्र शब्द भी शासन या सत्ता का परिचायक नहीं बल्कि अंग्रेजी के नेशन या कौम का परिचायक है, इस कौम की पहचान जाति या धर्म नहीं है। अंग्रेजी शब्दकोशों के अनुसार, राष्ट्र का अर्थ है जहां एक भाषा, धर्म, संस्कृति, जीवन पद्धति और दर्शन वाले लोग रहते हों। यूरोप अट्ठाईस देशों में विभाजित है लेकिन उसे राष्ट्र माना जाता है क्योंकि उसके अंतर्गत ये अपेक्षित समानताएं हैं। लेकिन यह बात भारत के बारे में नहीं कही जा सकती, जहां विभिन्न संस्कृतियां, जीवन दर्शन, मान्यताएं, धर्म, धार्मिक विश्वास विद्यमान हैं, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग विभिन्नताओं के फलस्वरूप रहते हों। 

शासकीय दृष्टि से तो कभी बर्मा और लंका भी इस देश के अंग थे। आज भी ब्रिटेन में जिन्हें सामान्य रूप से इंडियन कहा जाता है उनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमा के लोग भी आते हैं। लेकिन क्या इनकी एकता संभव है? हिंदुत्व अगर संयोजक तत्त्व होता तो पड़ोसी नेपाल इसका अंग होता, जिसे विश्व हिंदू परिषद के लोग भी हिंदू राष्ट्र बताते हैं। लेकिन वहां भी अब इस स्थिति में परिवर्तन आया है, भारत में मिलने के लिए न वह पहले तैयार था न आज।

जब इस देश का विभाजन हुआ तो वह भी धर्मों पर आधारित नहीं था। ब्रिटिश संसद ने जिस विभाजन को मंजूरी दी थी उसका आधार यह था कि जहां मुसलिम लीग जीती है उसे पाकिस्तान और जहां कांग्रेस जीती है उसे इंडिया या भारत मान कर अलग किया जाए। 

यही कारण था कि पखतूनिस्तान, जहां मुसलिम संप्रदाय के लोग बहुतायात में रहते थे वह भारत का अंग था जिसकी बाबत भारत के भावी शासकों ने भी माना कि व्यावहारिकता के लिए वहां जनमत संग्रह करा लिया जाए कि उस क्षेत्र के लोग किसके साथ रहना चाहते हैं। इसका सख्त विरोध सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां ने किया था। वे जनमत संग्रह से अलग हो गए, परिणामस्वरूप यह पाकिस्तान का अंग बन गया। अगर धर्म ही संयोजक तत्त्व होता तो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का विलगाव न होता, दोनों के नाम और शासक न बदलते। इसके पहले वहां इस्लामी राज्य बना कर एकता की रक्षा नहीं हो सकी। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद कहते हैं कि जिसे हिंदू कोड बिल में हिंदू माना गया है वे सब हिंदू हैं। लेकिन उसमें तो सिख भी आते हैं, बौद्ध और जैन भी आते हैं। बौद्धों को देश से बाहर करने के लिए जो अभियान कभी चला था, इतिहास में वह दर्ज है और दुनिया उसे जानती है। बौद्ध देश या बौद्ध समुदाय क्या हिंदू राष्ट्र बनने के लिए तैयार हैं? बौद्धों की संख्या दुनिया में तीसरे नंबर पर है और जिन्हें हिन्दू बताते हैं उनकी चौथे नंबर पर। चीन बौद्ध देशों की


ही परिभाषा में आता है, म्यांमा और श्रीलंका भी।

भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए इस हिंदू की भी परिभाषा करनी पड़ेगी क्योंकि जाति, धर्म, विश्वास, जीवन पद्धति, आस्थाएं अलग-अलग हैं, इन्हें जोड़ने के लिए आधार क्या होगा। देश के पूर्वोत्तर में कई राज्य ईसाई बहुल हैं, और कश्मीर का वह हिस्सा जो भारत के पास है, मुसलिम बहुल है। आर्य-अनार्य या आर्य-द्र्रविड़ का संघर्ष भी नया नहीं है; इतिहास के शैव और वैष्णव संघर्ष इतर धर्मियों के बीच नहीं थे। लेकिन इतिहास यही बताता है कि जो यहां इस धरती पर आया है उसका मूल स्वरूप भी परिवर्तित होता गया है। शक, हूण, शिथेन आदि जातियों की अगर खोज की जाए तो हम पाएंगे कि यह खोज संभव ही नहीं रह गई है। यह परिवर्तनकामिता का ही परिणाम है। 

हिंदू शब्द वेद, शास्त्र, उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में तो मिलता नहीं। इस शब्द की शुरुआत मुसलिम आक्रमणकारियों के साथ हुई क्योंकि वे सिंधु को ही हिंदू उसी प्रकार कहते थे जैसे सप्ताह को हफ्ता यानी ‘स’ अक्षर उनकी लिपि में था ही नहीं। हिंदू का अर्थ भी उनकी दृष्टि से कोई सम्मानजनक नहीं बल्कि अपमानकारक ही था। ये आक्रमण पश्चिम से हुए थे, इसलिए गंगा-यमुना नहीं बल्कि वहां सिंधु और उसकी सभ्यता ही प्रभावित थी। मुअनजोदड़ों में जिस संस्कृति का हम दावा करते हैं उसे सिंधु संस्कृति ही तो कहा जाएगा। संस्कृतियां भी स्थायी नहीं बल्कि देश, युग, काल के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यह परिवर्तन पुरानी और नई पीढ़ी में आज भी देखा जा सकता है।

 इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की यह परिभाषा उचित ही है कि जो अपने को हिंदू कहता और मानता है वह हिंदू है, इसमें धर्म और उपासना पद्धति भी कहीं बाधक नहीं है। उपासना पद्धतियां अनंत और वैयक्तिक हैं।

इसीलिए संविधान में व्यक्ति को आस्था और विश्वास की छूट भी दी गई है। देश, राज्य और राष्ट्र ये तीनों समानार्थी नहीं हैं। परिवर्तन का क्रम निरंतर चल रहा है और इसके आधार पर व्यवस्थाएं भी बनेंगी और बिगड़ेंगी। अल्लाह, कुरान और पैगंबर पर विश्वास करना अपने को मुसलमान कहने वालों के लिए आवश्यक है लेकिन मुसलिम बहुल सत्तावन देश आखिर क्यों एकजुट नहीं हैं? आज वे विभिन्न खेमों में बंटे हुए हैं, जहां वे एक दूसरे के संयोजक नहीं रहे हैं। 

इराक में शिया और सुन्नियों के विभिन्न क्षेत्रों में विभाजन के लिए हो रहे संघर्ष और हिंसा को क्या कहा जाए? दोनों ही तरफ ऐसी शक्तियां हैं जो इस्लाम को मानती हैं। हिंदू भी आपस में लड़ते रहे हैं। तमाम राजाओं के संघर्ष सत्ता पर अधिकारों के लिए थे, इतिहास इसका गवाह है। पृथ्वीराज और जयचंद दोनों एक ही जाति, धर्म और कुल के थे। कौरव और पांडवों के बीच हुआ महाभारत भी इसका उदाहरण है।

विभिन्न काल के इतिहास और साहित्य में इसके अनंत उदाहरण हैं। सुर और असुर दोनों एक ही कुल की संतान थे। इसलिए हमें वर्तमान युग-परिप्रेक्ष्य की आवश्यकताओं को जान कर ही राष्ट्र के भावी स्वरूप का भी निर्धारण करना है, जोर-जबर्दस्ती या ताकत के बल पर ऐसा संभव नहीं है। 

देश बंटे भी हैं और जर्मनी जैसे विभाजित देश फिर एक भी हुए हैं। इन विभाजनों और एकताओं के अपने-अपने कारण रहे हैं। इसलिए ऐसे प्रश्न उठाना, जिनकी स्वीकार्यता जनमानस द्वारा संभव न हो, उचित नहीं है। अब शक्ति के बल पर राज्यों के बनने की प्रक्रिया थम चुकी है। अभी ग्यारह मुसलिम देशों में जो असहमतिजन्य आंदोलन और परिवर्तन हुए हैं उनमें भी निर्णायक तत्त्व यही था कि राज्य-शक्ति जनता की इच्छाओं पर आधारित होनी चाहिए, कोई नया खलीफा बनाने के लिए नहीं। यही कारण था कि भ्रष्टाचार, बेईमानी, बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद््दे जो जनता को प्रभावित करते थे, चुनावों में उन्हीं को मोदी ने उठाया। इसमें उन्हें अयोध्या मुद््दे से अधिक कामयाबी भी मिली। 

तीस वर्षो बाद किसी एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत मिला। लेकिन कुछ लोग आज भी पुराने युग और मान्यताओं की ओर ले जाना चाहते हैं और धर्म को निर्णायक तत्त्व बनाना चाहते हैं। लेकिन धर्म वह है जिसके बिना पदार्थ का अस्तित्व न रह सके। जैसे आग की ज्वलनशीलता और जल की तरलता। इन गुणों का नाश होने पर वे राख या बर्फ हो जाते हैं। इनका गुण और स्वभाव भी बदल जाता है। आज के युग की आवश्यकता मानवतावाद है जिससे तमाम कटुता, वैमनस्य, हिंसा और विभाजन रुके।


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