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दक्षिणावर्त : भारत अभारत PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 12:14

altतरुण विजय

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : भारतीय होना बाकी कुछ भी होने से ज्यादा अभिमान और सम्मान की बात होनी चाहिए थी। है भी। और नहीं भी। 

कश्मीर से हिंदू निकाले गए। फिर उनकी यात्रा रोकने का प्रयास हुआ- अमरनाथ आंदोलन की उग्रता वाकई एक सदी से दबे गुस्से को अभिव्यक्त कर गई। अब बचे-खुचे कश्मीरी कौसरनाग यात्रा निकालने की कोशिश में जुटे, सरकार से आवश्यक अनुमति भी ले ली। पर सेक्युलर समाज के सरताज गिलानी ने एलान किया कि हिंदुओं की यह यात्रा होने नहीं दी जाएगी, इससे कश्मीर के प्राकृतिक वातावरण को क्षति पहुंचती है। घाटी बंद का एलान कर दिया। इतने भर से उमर अब्दुल्ला की सरकार ने कौसरनाग यात्रा के लिए अनुमति वापस ले ली। 

यात्रा नहीं हो सकती। 

जो भारत, भारतीयता, तिरंगे और विधान के प्रति शपथ लेते रहे, उसके लिए जान देते रहे, वे घाटी से न सिर्फ निकाले गए, बल्कि अलगाववादी, भारत-द्रोहियों की धमकी के सामने छोटे, बौने बना दिए गए। देश के लिए जीने वाले यात्रा इसलिए नहीं निकाल सकते, क्योंकि देश के खिलाफ बोलने वाले ऐसा नहीं चाहते। 

जब तक हिंदू घाटी में रचते-बसते रहे, हर साल शोपियां, कोंगवतन, कौसरनाग मार्ग से यात्रा होती रही। मान्यता है कि आदिकाल से यह यात्रा चली आ रही है। जिहादी आतंकवादियों के भय से हरमुख, गंगबल, ध्यानेश्वर, महादेव यात्राएं अनेक वर्ष रुकी रहीं, जिन्हें फिर से शुरू करने की कोशिश हो रही है, पर राज्य सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। कौसरनाग के लिए दो जुलाई को सरकार से अनुमति ली गई थी। कितने लोग शामिल होते इसमें? पचास या सौ पंडित। लेकिन इतने भर से लोग परेशान हो गए। पचास हिंदू कश्मीर घाटी में यात्रा पर निकलें, यह भी उस क्षेत्र में संभव नहीं, जो देश का एकमात्र मुसलिम बहुल प्रदेश है। उन्होंने घाटी में अनेक जगह पोस्टर लगा दिए कि कौसरनाग यात्रा कश्मीर की जनसांख्यिकी स्थिति बदलने का षड्यंत्र है। जैसे इजराइल ने गाजा के साथ किया, वैसा ही इंडिया कश्मीर के साथ करना चाहता है। उनका पर्यावरणीय प्रेम भी जागा। कहा कि पंडितों की इस यात्रा से पर्यावरण को क्षति पहुंचेगी। 

यात्रा तो स्थगित हो ही गई। 

इस पर चुप रहना ही सेक्युलर-मजहबी जिम्मेदारी है। 

भारतीय होना, तिरंगे का रंग ओढ़ना, वहां न अभिमान की बात है, न इससे सुरक्षा मिलती है। 

अरुणाचल कहां है? कश्मीर से काफी दूर, हिमालयी उपत्यकाओं के आखिरी भारतीय छोर पर। 

वहां से चांगलांग और तिरप नगर से पांच भारतीय दिल्ली आए। दिल्ली का पहला परिचय ही अजनबी के प्रति बेरुखी, फिर लूटने या ज्यादा पैसा ऐंठने, फिर रास्ता पूछने पर गलत रास्ता दिखाने और मारपीट तक उतर आने से प्राप्त होता है। अरुणाचल में हिंदी ही चलती है। गांव-गांव में जयहिंद सामान्य शिष्टाचार का संबोधन है। वे संभवत: हमारे देश के सबसे सरल, सहज गहरी देशभक्ति वाले भारतीय हैं। पर दिल्ली में अपनी तीव्र समस्याओं के समाधान के लिए जब आए तो कहीं से उन्हें अपनापन नहीं मिला। रास्ता भूले, नेताओं को फोन किया, तो मिलने का वक्त नहीं मिला। नेता लोगों के पीए को वक्त नहीं अरुणाचल की हिंदी समझने का। एक बड़े, वरिष्ठ, प्रभावी, नामी नेता से वक्त मिला तो घर जाने पर पीए ने पूछा- सर, आप कहां से आए हैं? वयोवृद्ध ताबाहारे ने कहा- ओरुणाचल से। पीए हंसा और पूछने लगा- ये कहां है ओरुणाचल? 

ये कहां है ओरुणाचल? 

यह चोट कौन बर्दाश्त करेगा? 

‘ये कहां है ओरुणाचल’ पूछने वाला पढ़ा-लिखा, जागृत, राजनीतिक क्षेत्र का व्यक्ति था। भारतीय था। भारत के एक बड़े नेता के दफ्तर में सरकारी वेतन पर नौकरी कर रहा था। देश की राजधानी में बैठा वह भारतीय उस वयोवृद्ध, सुसंस्कृत ताबाहारे से पूछ बैठा- ये ओरुणाचल कहां है? 

तानाशाही होती तो ऐसे व्यक्ति को साइबेरिया या कालापानी भेज दिया जाता। 

अरुणाचल प्रदेश के मूल, नैसर्गिक समाज की आस्था और संस्कृति बचाने के लिए चांगमी, ताबाहारे, गिचिक ताजा और ओयिन मोयोंग दिल्ली आए। उनके नाम हर जगह दो बार पूछे गए और तीसरी बार सिर्फ जी, सर आप बताइए मात्र कहा गया।


नाम हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों के भारतीय-सहनागरिकों के कैसे होते हैं, हम नहीं जानते। हमें पढ़ाया नहीं जाता। हमें पाठ्यपुस्तकों में सिर्फ मुगल, तुरक, अफगान, अंगरेज पढ़ाए जाते हैं। कहीं-कहीं शिवाजी, राणा प्रताप, बिरसा और रणजीत सिंह भी। दक्षिण वालों के लिए चोल, पांड्य भी। पर कोई ऐसी पाठ्यपुस्तक, जिसमें रानी गाइदिन्ल्यू का जीवन हो या करगिल के शहीद कैप्टन क्लिफोर्ड नोंग्रोम (मेघालय), गांगचुक कोन्याक (नगालैंड), कालेश्वर कोम (मणिपुर) की वीर-कथाएं, कहीं किसी ने पढ़ाई या बतार्इं? जिनका हिंदुस्तान इधर माता वैष्णोदेवी, उधर कामाख्या तक ही हो, उनके हिंदुस्तान में अरुणाचल के भारतीय को दिल्ली में झटका तो लगेगा ही। 

भारतीय होने का अभिमान होते हुए भी आपको उन जैसा होने की जरूरत होती है, जो दिल्ली में प्रभावशाली हैं। निर्णय लेने की ताकत रखते हैं, आपकी फाइलों को सही या गलत कर सकते हैं, स्टेशन से आपके रुकने की जगह तक ले जाने वाले टैक्सी या आॅटो रिक्शा वाले होते हैं। उनके जैसा न बन पाएं तो सिर्फ भारतीय होना यहां पर्याप्त नहीं। 

भारतीय होने का अर्थ होगा अपनी भाषा में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दे पाना। और उस अंगरेजी अनुवाद की दानवीयता और भाषाई वहशियत से सामना न करना, जो आज संघ लोक सेवा आयोग के भूरे, सलेटी या काले अंगरेज प्रश्नपत्र में हिंदी अनुवाद के तौर पर परोसते हैं। जिस प्रकार का गलत और अभद्र हिंदी अनुवाद संघ लोक सेवा आयोग ने हिंदी के परीक्षार्थियों के सामने रखा, उसे स्वीकृत करने वाले सर्वोच्च अधिकारी से लेकर उस अनुवाद के जिम्मेदार असभ्य कर्मचारी-अनुवादक तक को देश-विरोधी कृत्य के अपराध में सजा मिलनी चाहिए। पर भारत में सिर्फ भारतीय होना कब से पर्याप्त माना गया? भारतीय पासपोर्ट के साथ अभारतीय भाषा, अभारतीय शिष्टाचार, अभारतीय पोशाक, अभारतीय मानस रखना भी जरूरी है, ताकि आप प्रशासनिक अधिकारी बन सकें। 

मुखर्जी नगर में पुलिस ने संघ लोक सेवा आयोग में भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा चाह रहे छात्रों को ऐसी बेरहमी से पीटा मानो वे दिल्ली में 26/11 करने चले हों। यह खाकी उसी ब्रिटिश दारोगा की उतारी हुई है, जिसने ‘नेटिव्ज’ को सिर्फ तिरस्कार से देखना सिखाया। पर चुप रहिए और सन्नाटा ओढ़े रहिए। शरद यादव लोकसभा में चिल्लाएं तो उसका विरोध ही करिए- क्या फिजूल की हिंदी वाली बात करते हैं। वोट हिंदी में लो, नोट तो अंगरेजी वाले कमाते हैं। हार्वर्ड, कैंब्रिज, वार्टन से पढ़ कर आए अंगरेज भारतीयों ने क्या प्रशासन और देश चलाया! धरती, आकाश, पाताल तक के महा-घोटाले ये पढ़े-लिखे, अंगरेजी वालों ने ही तो किए, जिन्होंने उन अफसरों का साथ लिया, जो संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं अंगरेजी में पास कर आए थे।

अंगरेजी नहीं जानता, आइएएस बनेगा? देश चलाना सब्जी बेचने जैसा है क्या? ऑटो रिक्शा चलाओ। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं ऑटो रिक्शा हो गई हैं- सस्ती टिकाऊ सवारी तो है, पर पांच सितारा होटल के पोर्च में ऑटो रिक्शा को आने की इजाजत नहीं, दिल्ली के हवाई अड्डे पर ऑटो रिक्शा नहीं आ सकता। कार से आइए। विमान में सिर्फ अंगरेजी के अखबार और पत्रिकाएं मिलेंगी। स्वाभाविक है, जो आदमी विमान यात्रा करेगा, वह पढ़ा-लिखा तो होगा ही। हिंदी या तमिल तक सीमित रहने वाला जाहिल थोड़े ही होगा कि उसके लिए उसकी भाषा में भी कोई पत्रिका रखी जाए? सिर्फ भारतीय होना पर्याप्त नहीं। थोड़ा-बहुत अभारत भी ओढ़ना होगा, भारत में अपनी आवाज सुनाने के लिए।


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