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प्रतिक्रिया : समस्या महज अनुवाद नहीं PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 12:11

मनोज कुमार 

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने लेख ‘गुणवत्ता जरूरी है’ (27 जुलाई) में जिस तरह यूपीएससी परीक्षा में आए बदलावों का बचाव किया है, उसमें कुछ बुनियादी दिक्कतें हैं। वे कहते हैं कि प्रश्न-पत्रों के खराब अनुवाद के चलते सीसैट की जरूरत को नहीं नकारना चाहिए। मगर समस्या महज अनुवाद की नहीं है, यह किसी दूसरी गहरी बीमारी का लक्षण है। 

सामान्य समझ वाले व्यक्ति को भी पता है कि कंप्यूटर जैसी किसी मशीन में मानवीय भाषिक व्यवहार को समझने की क्षमता नहीं होती। एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद के लिए शब्द और वाक्य को नहीं, बल्कि भाषिक व्यवहार के पूरे संदर्भ को समझना पड़ता है। अगर एक अग्रणी संस्था मशीनी अनुवाद को अधिक भरोसेमंद मानती है तो इसका मतलब यही है कि मानवीय भाषा की प्रकृति के बारे में उसकी सामूहिक समझ खासी उथली है। वह भाषा को महज माध्यम मानती है, जैसे बाल्टी पानी रखने का माध्यम है। अनुवाद क्या कठिन चीज है, एक बाल्टी के पानी को दूसरी बाल्टी में उलट दो! विडंबना है कि अर्थबोध की इतनी उथली समझ के साथ यह संस्था अभ्यर्थियों के संवाद कौशल से लेकर भाषिक बोध तक सब कुछ जांच लेने का दावा करती है। 

यूरोप प्रवास के दौरान मैं हिंदी के कुछ छात्रों के साथ अखबार की सुर्खियां पढ़ता था। किसी विधानसभा के लिए हुए मतदान के अगले दिन खबर थी- ‘साठ मरे, सौ घायल, मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हुआ।’ इस खबर को एमए स्तर के हिंदी के यूरोपीय छात्रों को समझाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी, जबकि हिंदी प्रदेश का आठवीं पास अखबार का नियमित पाठक इस वाक्य को झट समझ लेगा। दिक्कत यह है कि वाक्य के स्तर पर भी अर्थबोध के लिए व्याकरणिक नियमों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है जैसा कि हम अखबार की इस पंक्ति के उदाहरण से समझ सकते हैं, जबकि कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग व्याकरणिक नियमों के अनुसार अधिक से अधिक वाक्य के स्तर तक ही हो सकती है। 

गूगल अगर ‘टैबलेट कंप्यूटर’ का अनुवाद ‘गोली कंप्यूटर कर देता है तो उसका क्या दोष। टैबलेट का अर्थ गोली भी तो होता है। अब आप कब किस शब्द का प्रयोग रूपक के तौर पर करेंगे इसके बारे में व्याकरण में किसी नियम का उल्लेख है क्या? यानी जैसे ही शब्द भाषिक व्यवहार में आते हैं, उनका अर्थबोध भी स्थिर और नियमबद्ध नहीं रह जाता है। अगर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग से शब्द और वाक्य के स्तर पर अर्थबोध संभव नहीं हो पा रहा है, तो पाठ के स्तर पर क्या होगा? पाठ का तो कोई सटीक व्याकरण भी नहीं होता है। 

एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद के लिए पहली भाषा को शब्द और वाक्य के स्तर पर नहीं, विमर्श के स्तर पर समझना पड़ता है। इसका मतलब होता है भाषिक व्यवहार के सभी पहलुओं को समझना। दरअसल, भाषिक व्यवहार मानवीय-सामाजिक व्यवहार है, जिसमें वक्ता-श्रोता-पाठक और संवाद की परिस्थितियां सब कुछ शामिल होती हैं। टैबलेट कंप्यूटर का अनुवाद ‘गोली’ कंप्यूटर इसलिए सही नहीं है कि ‘टैबलेट कंप्यूटर’ एक पूरा विमर्श है, जो दो शब्दों- टैबलेट और कंप्यूटर- का महज योगफल नहीं है। 

यूरोप प्रवास के दौरान ही मेरे एक सहकर्मी दोस्त ने एक किस्सा सुनाया था। हुआ यों कि वहां किसी नई कंपनी ने शेयर बाजार में अपना शेयर जारी किया। इस कंपनी का दावा था कि वह सॉफ्टवेयर का ऐसा पैकेज बनाने वाली है, जिससे दुनिया की किसी भी भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद संभव होगा। लोगों ने इस कंपनी को होने वाले अपार मुनाफे का अंदाजा लगाते हुए उसके शेयर खरीदे।


मगर कंपनी कुछ दिनों में ही बंद हो गई। मेरे भाषाविद सहकर्मी मित्र ने अपने कई दोस्तों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन फंतासियों से संचालित बाजारू समझ के आगे भाषाविदों की कौन सुनता है। 

सीसैट विवाद को ध्यान से देखने पर ऐसा लगता है कि सामूहिक रूप से एक संस्था के तौर पर यूपीएससी ऐसी ही फंतासियों से संचालित हो रहा है। इसलिए खराब अनुवाद तो रोग का लक्षण मात्र है। असली दिक्कत भाषिक व्यवहार और अर्थबोध की तंग समझ है। 

यह मामला सिर्फ मानवीय भाषा की तंग समझ तक सीमित नहीं है। अगर आप मानवीय भाषा की प्रकृति को ठीक से नहीं समझते, तो मानवीय ज्ञान के स्वरूप को भी नहीं समझेंगे। मनुष्य का ज्ञान या तो अंगरेजी, हिंदी जैसी मनुष्य की भाषा में निर्मित होता है या गणितीय संकेत-प्रणाली में। गणितीय ज्ञान और अमूर्तन पर आधारित तर्क क्षमता बहुत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन आप भाषा में निर्मित सभी ज्ञान को गणितीय ज्ञान में अनूदित नहीं कर सकते। इस बात का जवाब पुरुषोत्तमजी और यूपीएससी को देना चाहिए कि सामान्य ज्ञान में उत्तीर्ण होने के लिए तीस अंक और सीसैट में उत्तीर्ण होने के लिए सत्तर अंक क्यों चाहिए? एक लोकतांत्रिक देश की संस्था, जो यह दावा करती है कि वह बगैर किसी भेदभाव के सिर्फ ज्ञान की परख के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करती है, उसे अपनी ज्ञानमीमांसात्मक मान्यताओं को सार्वजनिक करना ही चाहिए। 

इस बात को ध्यान से समझने की जरूरत है कि आखिर यूपीएससी के अधिकारियों ने मशीनी अनुवाद को प्राथमिकता क्यों दी। लगता है कि जिन ज्ञानमीमांसात्मक मान्यताओं के आधार पर यूपीएससी ने सामान्य अध्ययन से अधिक सीसैट को महत्त्वपूर्ण माना है, उन्हीं के प्रभाव में उसने गूगल अनुवाद को अधिक भरोसेमंद माना है। 

दरअसल, इन ज्ञानमीमांसात्मक मान्यताओं से जुड़ी कुछ नैतिक मान्यताएं भी हैं, जिनसे यूपीएससी जैसी संस्थाएं संचालित हो रही हैं। वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता और गुणवत्ता के जिन आदर्शों को वह हासिल करना चाहती है, वह मानवेतर ही नहीं, शायद मनुष्य विरोधी भी है। हैबरमास ने ‘सिस्टम वर्ल्ड’ द्वारा ‘लाइफ वर्ल्ड’ के उपनिवेश बनाने की बात की है। यहां कुछ ऐसा ही घटित होता हुआ हम देख रहे हैं। 

सीसैट विरोधी आंदोलन महज भारतीय भाषाओं के अधिकार की लड़ाई नहीं है, यह इस बात की भी जद्दोजहद है कि ज्ञान का कौन-सा स्वरूप हमारे प्रशासकों के लिए अधिक सार्थक और प्रासंगिक है। पुरुषोत्तमजी अपने लेख में ‘आज के जमाने’ की बात कर रहे हैं। 2007-08 की मंदी के बाद आज जिस स्थिति में हम रह रहे हैं, उसमें संकीर्ण तकनीकी प्रबंधकीय ज्ञान की दुर्दशा देख चुके हैं। हमें तो आज भी अनिल बोर्दिया और अशोक वाजपेयी जैसे समाज और संस्कृति की गहरी समझ रखने वाले प्रशासक चाहिए। प्रबंधक अपना बैंक और अपनी रियल स्टेट कंपनी ही कायदे से संभाले रखें तो कृपा होगी।


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