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बहस : शब्दों के अंगरेजी सिक्के PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 12:09

महावीर सरन जैन

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : प्रवक्ता डॉट कॉम पर शाया मेरे एक लेख ‘वर्धा हिंदी शब्दकोश के बहाने से हिंदी के विकास के संबंध में कुछ विचार’ पर महेंद्र राजा जैन की प्रतिक्रिया (जनसत्ता, 13 जुलाई) पढ़ी। मैंने अपने लेख में भी स्पष्ट किया था कि मैंने वर्धा कोश देखा नहीं है। अब भी वह कोश मैंने देखा नहीं है। मैं आज भी इस स्थिति में नहीं हूं कि वर्धा कोश के गुणों या दोषों के संबंध में फतवा जारी कर सकूं। मैं फिलहाल महेंद्र राजा जैन ने अपने लेख में जो सवाल उठाए हैं, उनमें विषयांतर सवालों (क्या महावीर सरन जैन के मित्र पिछले चार माह से उनके भारत लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे; अब तक कोश को देखने की जरूरत क्यों नहीं समझी; जैन के भाषाविज्ञान विभाग से निकले विद्वान देश में कहां छिपे हैं) के बारे में कोई टिप्पण प्रस्तुत नहीं करना चाहता। विषय पर व्यक्त सवाल ये हैं: राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस में जो जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया, उसमें प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों का उल्लेख करने का मंतव्य क्या है; अवर शब्द की व्युत्पत्ति और प्रयोग; हिंदी की प्रकृति के अनुसार राजभाषा में वाक्य रचना का प्रयोग। 

जनसत्ता में किसी लेख के लिए अधिकतम सीमा निर्धारित है, इसलिए मैं इस लेख में, महेंद्र राजा जैनजी ने जो तीन सवाल उठाए हैं, उनमें से पहले सवाल के बारे में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं। यह उत्तर उन विद्वानों के लिए भी है, जिन्होंने प्रवक्ता डॉट कॉम पर तत्संबंधित बिंदु पर आपत्ति दर्ज करते हुए संस्कृत आधारित शब्दों के प्रयोग का आग्रह किया। 

मेरे लेख पर पहली आपत्ति यह है कि मैंने नरेंद्र मोदी के अभिभाषण में प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों का उल्लेख क्यों किया। ऐसा मैंने सायास किया है। नरेंद्र मोदी जिस पाठशाला में पढ़े हैं, उससे दीक्षित विद्वान यह मानते हैं कि हमारी एक मूलधारा है। विदेशी आक्रांताओं ने हमारी मूलधारा की संस्कृति, भाषा, पहनावा, खानपान आदि को प्रदूषित कर दिया है। हमें उसे निर्मल बनाना है। वे इस विचार को खारिज कर देते हैं कि भारत में भाषाओं, प्रजातियों, धर्मों, सांस्कृतिक परंपराओं और भौगोलिक स्थितियों का असाधारण और अद्वितीय वैविध्य विद्यमान है। 

इसको स्पष्ट करने के लिए मुझे थोड़ा अवांतर जाना होगा। लेखक 1958 से 1962 तक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का विद्यार्थी था। यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार उसके पिताजी के मित्र केएल गोविल थे। उनके घर पर लेखक की ‘संघ के रज्जू भैया’ से अनेक बार मुलाकात हुई। उनका सोच यह था कि हमारे राष्ट्र की मूलधारा एक है और वह धारा अविरल और शुद्ध रूप में प्रवाहित है। जो धाराएं हमारे देश में आक्रांताओं द्वारा लाई गई हैं उन्होंने हमारी राष्ट्र रूपी गंगा को गंदा कर दिया है। हमें उसे निर्मल बनाना है। 

मेरे दिमाग में उस समय से लेकर अब तक दिनकर की पंक्तियां गूंजती रही हैं कि भारतीय संस्कृति समुद्र की तरह है, जिसमें अनेक धाराएं आकर विलीन होती रही हैं। एक दिन हमने रज्जू भैया से निवेदन किया कि आप जिन आगत धाराओं को गंदे नालों के रूप में देखते हैं, हम उनको इस रूप में नहीं देखते। आगत धाराएं हमारी गंगा की मूल स्रोत भागीरथी में आकर मिलने वाली अलकनंदा, धौली गंगा, पिंडर और मंदाकिनी धाराओं की श्रेणी में आती हैं। हमारा सोच आज भी यही है। 

उदाहरण के लिए, भाषा के मामले में, सोच यह है कि बोलचाल की सहज, रवानीदार और प्रवाहशील भाषा पाषाण खंडों में ठहरे हुए गंदले पानी की तरह नहीं होती। पाषाण खंडों के ऊपर से बहती हुई अजस्र धारा की तरह होती है। नदी की प्रकृति गतिमान होना है। भाषा की प्रकृति प्रवाहशील होना है। जिस अनुपात में हमारी संस्कृति में परिवर्तन होता है, हमारा सोच और हमारी आवश्यकताएं परिवर्तित होती हैं, उसी अनुपात में शब्दावली भी बदलती है। 

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जो जवाब नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों के समक्ष दिया, उसको मैंने सुना और प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों को अपनी शक्ति-सीमा के दायरे में लिखता गया। बहुत से शब्द छूट भी गए। मैं उस भाषण में बोले गए अंगरेजी के जिन शब्दों को लिख पाया, वे हैं: स्कैम इंडिया, स्किल इंडिया, एंटरप्रेन्योरशिप, स्किल डेवलपमेंट, एजेंडा, रोडमैप, रेप, एफआइआर, रेंज, कॉमन, ब्रेक, इंडस्ट्रीज, फोकस, मार्केटिंग, प्रोडक्ट। 

मैंने मोदीजी के इस भाषण में प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों का उल्लेख इसलिए


किया कि मैं उन विद्वानों को उत्तर दे सकूं जो मूलधारा की शुद्धता को बनाए रखने के नाम पर हिंदी में केवल संस्कृत आधारित शब्दों के प्रयोग के हिमायती हैं। मोदीजी ने अपने अभिभाषण में अंगरेजी शब्दों का प्रयोग क्यों किया और उनके द्वारा प्रयुक्त अंगरेजी शब्दों में से अमुक शब्द चलेगा या नहीं, इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। जवाब संघ की पाठशाला में दीक्षित मोदीजी से मांगिए। 

कौन-सा शब्द चलेगा और कौन-सा नहीं, इसका फैसला न तो मैं कर सकता हूं और न मूलधारा की शुद्धता को बनाने के पक्षधर विद्वान कर सकते हैं। कोई शब्द निरपेक्ष सरल या कठिन नहीं होता। शब्द प्रचलित या अप्रचलित होता है। जो शब्द प्रचलित हो जाता है वह हमें सरल लगने लगता है। इसी कारण कहा जाता है कि शब्द बाजार में चलने वाले सिक्के की तरह होता है। बाजार में जो सिक्का चलता है, उसी का मूल्य होता है। इसी परिप्रेक्ष्य में मेरा विचार है कि हम अपने रोजाना के व्यवहार में अंगरेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं, उनको कोश में शामिल करना अपराध नहीं है। अंगरेजी के जिन शब्दों को हिंदी के अखबारों और टीवी चैनलों ने अपना लिया है और जो जनजीवन और लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनको कोश में शामिल किया जाना चाहिए। 

बहुत से विद्वान मानक भाषा का सवाल खड़ा करते हैं। यहां केवल यह संकेत करना चाहता हूं कि भाषा के मानकीकरण और आधुनिकीकरण की संकल्पनाओं में अंतर है। प्रत्येक भाषा के विद्वानों के इस बारे में अपने-अपने विचार और आग्रह हैं। मगर जो भाषाएं इंटरनेट पर छा गई हैं, उनके विद्वान अब मानकीकरण की अपेक्षा आधुनिकीकरण पर अधिक बल देने लगे हैं। 

मैंने लेख में लिखा था कि ‘प्रजातंत्र में शुद्ध हिंदी, क्लिष्ट हिंदी, संस्कृत गर्भित हिंदी जबरन नहीं चलाई जानी चाहिए।’ एक विद्वान ने टिप्पण किया: ‘‘परंतु क्या अशुद्ध फारसी-अरबी-अंगरेजी-गर्भित-भाषा लिखनी चाहिए- यह कौन-सी, कहां की और कैसी विचित्र परिभाषा है प्रजातंत्र की।’’ एक दूसरे विद्वान का टिप्पण था: ‘‘संस्कृताधारित शब्द अपना पूरा परिवार लेकर भाषा में प्रवेश करता है, अंगरेजी शब्द अकेला आता है, उर्दू भी अकेला आता है। नया गढ़ा हुआ, संस्कृत शब्द भी प्रचलित होने पर सरल लगने लगता है। भाषा बदलती है, स्वीकार करता हूं। पर उसे सुसंस्कृत भी किया जा सकता है, और विकृत भी। संस्कृत-रचित शब्द सहज स्वीकृत होकर कुछ काल के पश्चात रूढ़ हो जाएंगे। अंगरेजी के शब्द जब हिंदी में प्रायोजित होते हैं, तो लुढ़कते-लुढ़कते चलते हैं। उनमें बहाव का अनुभव नहीं होता। और कौन-सा स्वीकार करना, कौन-सा नहीं, इसका क्या निकष? आज प्रदूषित हिंदी को उसी के प्रदूषित शब्दों द्वारा विचार और प्रयोग करके शुद्ध करना है। जैसे रक्त का क्षयरोग उसी रक्त को शुद्ध कर किया जाता है।’’ 

मेरा इन विद्वानों से निवेदन है कि वे संदर्भ को ध्यान में रख कर ‘शुद्ध’ शब्द का अभिधेयार्थ नहीं, बल्कि व्यंग्यार्थ ग्रहण करने की अनुकंपा करें। ‘प्रजातंत्र में’ और ‘जबरन चलाने’ पर विशेष ध्यान देंगे तो शब्द प्रयोग का व्यंग्यार्थ स्वत: स्पष्ट हो जाएगा। कोई भी जीवंत और प्राणवान भाषा ‘अछूत’ नहीं होती। वह अपने को शुद्ध और निखालिस बनाने के व्यामोह में अपने घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद नहीं करती। अगर किसी भाषा को शुद्धता की जंजीरों से जकड़ दिया जाएगा, निखालिस की लक्ष्मणरेखा से बांध दिया जाएगा तो वह धीरे-धीरे सड़ जाएगी और फिर मर जाएगी। किसी भाषा की शक्ति और सामर्थ्य भावों और विचारों को व्यक्त करने की उसकी ताकत और संप्रेषण क्षमता से होती है।


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