मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
वक़्त की नब्ज़ : काले धन का खेल PDF Print E-mail
User Rating: / 2
PoorBest 
Sunday, 03 August 2014 11:57

altतवलीन सिंह

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : वित्त मंत्री को जब बार-बार काले धन पर हल्ला बोलते सुना तो मैंने उनको एसएमएस भेजा कि मैं उनसे बात करना चाहती हूं। अरुण जेटली को इमरजंसी के जमाने से जानती हूं। उस समय वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अध्यक्ष थे दिल्ली यूनिवर्सिटी में और मैं स्टेट्समैन अखबार में एक अति-जूनियर रिपोर्टर। एसएमएस मिलने के बाद उन्होंने मुझे फोन किया और मैंने उनको विनम्रता से याद दिलाया कि जिन अधिकारियों को वह काला धन ढूंढ़ने का काम सौंप रहे हैं वह अक्सर इतने भ्रष्ट होते हैं कि काला धन जब मिलता है उन्हें अक्सर खुद रख लाते हैं। जवाब में मंत्रीजी ने कहा, ‘लिखो जो लिखना चाहती हो, शायद हमको तुम्हारे लिखने से मदद मिले।’

सो मुलाहिजा फरमाइए मंत्रीजी। माना कि सरकार को पैसों की सख्त जरूरत है। माना कि पिछली सरकार ने अर्थव्यवस्था का बुरा हाल करके छोड़ा। यह भी माना कि 1.25 करोड़ भारतीयों में सिर्फ 2.9 फीसद करदाता हैं लेकिन क्या यह भी सच नहीं है कि कहीं ज्यादा और करदाता होते अगर टैक्स देना आसान होता? मैंने पिछले 40 वर्षों से एक ईमानदार, जिम्मेवार नागरिक की तरह हर साल पूरा टैक्स अदा किया है लेकिन यह मैं बिल्कुल न कर पाती अगर मेरे एकाउंटेंट साहिब ने मेरे लिए फार्म न भरा होता। 

एक पढ़ी-लिखी औरत होने के बावजूद यह 30 पन्नों का फार्म इतना पेचीदा है कि इसको देखते ही मेरा सर चकरा जाता है। अव्वल तो यह 30 पन्नों जितना लंबा क्यों है? अमेरिका की नागरिक अगर होती तो मुझे दो पन्नों का फार्म भरना होता और ब्रिटेन की नागरिक होती तो कोई आठ पन्नों का फार्म भरना होता। तो भारत में क्यों इतने लंबे दस्तावेजों की जरूरत है? याद कीजिए कि जब पिछली भारतीय जनता पार्टी सरकार में जसवंत सिंह वित्तमंत्री थे उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि ‘सरल’ फार्म बिल्कुल सरल नहीं है। सरल होते टैक्स भरने के रास्ते तो यकीन कीजिए वह छोटे व्यापारी और दुकानदार भी टैक्स भरते जो आज अपना ‘काला’ धन अपने गद्दों के नीचे छुपाते हैं।

आप वित्तमंत्रीजी मेरे से ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, जाने-माने वकील हैं लेकिन दावे के साथ कह सकती हूं कि आप वेल्थ टैक्स अगर आनलाईन देने की कोशिश करेंगे तो आप भी घबरा जाएंगे। मालूम है अपको कि अगर आपने अपनी पत्नी के गहनों पर टैक्स देना हो आनलाइन तो आपको हर रत्न का वजन का मुआयना करके टैक्स भरना होगा। जमीन-जायदाद पर भी टैक्स भरना इतना पेचीदा है कि बिना एकाउंटेंट के यह काम नहीं किया जा सकता।

यही मुख्य वजह है कि भारत का ज्यादातर काला धन अपने देश में ही छुपा रखा है। बाबा रामदेव जैसे ‘अर्थशास्त्री’ जानते नहीं हैं कि जब वह विदेशों से काला धन वापिस लाने की बातें करते हैं वह कितनी नासमझी से बातें कर रहे हैं। काल धन विदेशी बैंकों के बेनाम खातों में नहीं है, यहीं है। काला इसलिए है यह धन क्योंकि एक साधारण, अर्ध-शिक्षित भारतीय के लिए ईमानदारी से टैक्स अदा करना आसान बिल्कुल नहीं है।

जब नहीं देते हैं टैक्स तो उनके दरवाजे पर आ टपकते हैं इनकम टैक्स विभाग के अधिकारी जिनका मकसद अक्सर सरकार की सेवा नहीं अपनी सेवा होता है। यह अधिकारी अपनी


सेवा करने के तरीके इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि उनसे भी पैसा वसूल कर लेते हैं जो टैक्स अदा करना चाहते हैं। मेरी जानकारी के कई छोटे व्यापारी हैं जो कहते हैं कि वह इन अधिकारियों को रिश्वत देते हैं क्योंकि दिए बिना वह टैक्स भर नहीं सकते हैं।

जब कोई वित्तमंत्री काला धन निकालने की बातें करने लगते हैं तो इनकम टैक्स विभाग को इशारा मिलता है कि वह अब बेझिझक रेड राज शुरू कर सकते हैं। बालीवुड के सितारों के घर और बड़े उद्योगपतियों के घर बनते हैं मुख्य निशाना। जिसके घर छापा पड़ता है उसको गुनाहगार माना जाता है जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित न कर सके। छापों से जब काला धन प्राप्त होता है तो उसका कुछ हिस्सा सरकार की तिजोरी में पहुंचाने के बदले पहुंच जाता है छापा मारने वालों की जेबों में।

इसका सबूत हमको मिलता है जब किसी अधिकारी के पापों का घड़ा भर जाता है और उस ही के घर में छापा मारने की नौबत आती है। तब निकल के आता है करोड़ों रुपए का काला धन अल्मारियों में भरा हुआ और ऐसे गहने, जो कोई सरकारी आमदनी पर गुजारा करने वाला व्यक्ति खरीदने का सपना भी नहीं देख सकता।

असली नुकसान होता है छापों से निवेश के माहौल को। निवेशक अपना धन लेकर भागना शुरू कर देते हैं जैसे सोनिया-मनमोहन के शासनकाल में हुआ था। उस समय जब अजीब नए टैक्स लगने लगे और छापों का दौर शुरू हुआ तो विदेशी निवेशकों के साथ देसी निवेशक भी भागने लग गए थे। ऐसा अगर फिर से शुरू होने लगा प्रिय वित्तमंत्री जी तो यकीन कीजिए कि अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे।

भारत की सबसे बड़ी आर्थिक समस्या है बेरोजगारी और रोजगार के अवसर अब पैदा हो सकते हैं सिर्फ निजी क्षेत्रों में। सरकारी क्षेत्र में जितनी नौकरियां पैदा हो सकती थीं, हो चुकी हैं और इस ही बात को इन दिनों प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं। निजी क्षेत्र में जो मंदी के काले बादल छाए रहे हैं पिछले कुछ सालों से, वह जब कम होंगे तो फिर से रोजगार के अवसर पैदा होने लगेंगे। ऐसा होने के लिए पहले बनाना होगा निवेशकों के लिए सुहाना माहौल और वह तब ही बनेगा वित्तमंत्री जी, जब आप की तरफ से इशारा आएगा कि आप अपने अधिकारियों को काबू में रखने का काम कर रहे हैं। जब आप हर दूसरे दिन काला धन निकालने की बातें करते हैं, हौंसले बुलंद होते हैं सिर्फ भ्रष्ट अधिकारियों के। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?