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कभी-कभार : उदात्त और निर्भय PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 11:54

altअशोक वाजपेयी

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे समय में ऐसे लोग या वृत्तियां खोज पाना कठिन से कठिनतर होता जाता है, जिनमें उदात्त तत्त्व हों और जो निर्भयता में रसे-पगे हों। यह सूझा जब दिवंगत गोविंदचंद्र पांडे द्वारा हिंदी में किए गए ऋग्वेद के नौ खंड लोकार्पित हुए। अपनी परंपरा को हम कैसे देखें-बरतें यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसके किन प्राणवान तत्त्वों को प्रासंगिक मानते या बना पाते हैं। एक तरह से संवेदनशील और जिम्मेदार लोग और समाज अपनी परंपरा को निरे उत्तराधिकार में प्राप्त भर नहीं करते, वे उसे रचते और रूपायित करते हैं। यही परंपरा को पुनर्नवा करना है। दुर्भाग्य से, ऐसे लोग और शक्तियां बढ़ती जाती हैं, जो ऐसा करने के बजाय परंपरा की अपनी नासमझ और गैर-जिम्मेदार व्याख्याओं से उसे एक गहरे अर्थ में नष्ट करते रहते हैं।

हर परंपरा में ऐसे तत्त्व होते हैं, जो समय के साथ अप्रासंगिक हो जाते हैं। अपनी परंपरा को शाश्वत मानना और दूसरी परंपराओं में मौजूद और सक्रिय शाश्वत तत्त्वों की अवहेलना या विरोध करना बौद्धिक दयनीयता और विपन्नता के प्रमाण हैं, भले ही कभी-कभी यह वे करते हैं, जिनके पास बुद्धि और विवेक होने का भ्रम होता है। सही है कि उदात्त की पहचान समय बदलने, समाज और सर्जनात्मकता की संरचना बदलने से अनिवार्यत: बदलती है। पर इसके बावजूद अपने समय से ऊपर उठने, उसमें कुछ उज्ज्वलता लाने की चेष्टा ही हमें उदात्त बना सकती है। एक स्तर पर साहित्य और कलाओं की ही तरह परंपरा भूलने के विरुद्ध अवरोध का काम करती है।

उदात्त तत्त्वों के पुनर्वास का प्रयत्न हमारे समय में साहित्य, कलाओं, विचार और सामाजिक व्यवहार में बहुत कम है। बढ़ती हिंसा और आक्रामकता ने हम सबको अपनी चपेट में यों ले लिया है कि हम यह तक भूल जाते हैं कि संघर्ष से उदात्त निकलता है, अगर हम इस बारे में सचेत हों। वैज्ञानिक यशपाल इस बारे में गहरी चिंता करते हैं कि जब हमारे पास एक-दूसरे को समझने, मदद करने और राहत पहुंचाने के सारे भौतिक साधन उपलब्ध हैं तो संसार में हर रोज इतने लोग कहीं भूख से, कहीं बमबारी से, कहीं धर्म या जाति के नाम पर मारे क्यों जाते हैं! क्यों स्त्रियों पर अत्याचार और अनाचार की घटनाएं दैनिक जीवन का जरूरी हिस्सा बन गई हैं। अफगानिस्तान, सीरिया, गाजा पट््टी में साधारण लोगों के घरों पर बम गिराने के बजाय खाने की चीजें क्यों नहीं गिराई जातीं? उन्होंने ये प्रश्न लोकार्पण की सभा में उठाए। उनकी यह भी चिंता है कि सारे अच्छे और उदात्त विचारों का संसार पर इतना कम प्रभाव क्यों पड़ रहा है और मानवीय बर्बरता में लगातार बढ़ोतरी क्यों हो रही है? 

उत्तर आसान नहीं है। आसान यह भी नहीं है कि हम साहित्य और कलाओं की उदात्त सद्विचार की अपने समय में अप्रासंगिकता को, हार कर, स्वीकार कर लें। क्या इन पर सोचने और कुछ न कुछ हल निकालने और उन्हें लागू करने के लिए एक विश्वव्यापी संवाद और पहल हो सकते हैं? 


गरिमा और प्रासंगिकता

राष्ट्रपति भवन भले ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता और वैभव का इजहार था, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत में वह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया। यह इसके बावजूद कि कुछ ऐसे व्यक्ति भी राष्ट्रपति हुए हैं, जिनका कद और हैसियत उस पद के उपयुक्त न थी। वर्तमान राष्ट्रपति जब से पदासीन हुए, उन्होंने अपने विशाल परिसर की सुध ली है, कई पुनरुद्धार करवाए हैं और उसे जनप्रासंगिक बनाने के कई कदम उठाए हैं। संग्रहालय को नया रूप दिया गया है और उसके लिए एक नई इमारत पर काम शुरू हो गया है। लेखकों-कलाकारों और युवा शोधकर्ताओं के कुछ दिन इस भवन में रह कर काम करने की सुविधा विकसित की गई है। कुल मिला कर इन प्रयत्नों से राष्ट्रपति भवन की गरिमा और प्रासंगिकता में निश्चय ही इजाफा हो रहा है। 

प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल के दो वर्ष पूरा होने पर एक आयोजन में निमंत्रित और उपस्थित होने का अवसर मिला। तीन पुस्तकें लोकार्पित की गर्इं: एक परिसर में आने वाले पक्षियों पर है, दूसरी भवन में दो वर्ष में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर और तीसरी श्री मुखर्जी के विचारों का संकलन है। पहली दो का लोकार्पण किया प्रधानमंत्री ने, तीसरी का उपराष्ट्रपति ने। नरेंद्र मोदी को सामने से पहली बार देखा। उन्होंने, बाकी कार्यक्रम की अंगरेजी से अपने को अलग करते हुए, हिंदी में कहा कि भारत की विशाल विरासत का जितना संसार में प्रक्षेपण होना चाहिए, नहीं हुआ। उनके अनुसार कलाएं राज्याश्रय में नहीं पलतीं, पर उनका ‘राज्य-पुरस्कृत’ होना आवश्यक है। भारतीय सभ्यता में मनुष्य की प्रकृति से ‘संवादिता’ का भी उन्होंने जिक्र किया और बताया कि हमारे यहां प्राय: हर देवता के साथ कोई न कोई पशु या पक्षी जुड़ा हुआ रहा है। राष्ट्रपति भवन के परिसर में आने वाले पक्षियों को ‘बिन बुलाए मेहमान’ बता कर श्री मोदी ने कहा कि ‘पक्षी, पानी और पवन की कोई नागरिकता नहीं होती’ और वे हर सीमा के पार जाते रहते हैं। 

कार्यक्रम के आरंभ में अग्निहोत्री बंधु का संक्षिप्त भजन-गायन था, जो संक्षिप्त होेने के


बावजूद असह्य रूप से बेसुरा था: हाल में इतनी गूंज थी कि उनके शब्द समझ में भी नहीं आए- यों स्वरचित होने के कारण उनमें समझने लायक कुछ शायद ही रहा हो। समापन हुआ कथक-नर्तक राजेंद्र गंगानी के समूह के नृत्य-प्रदर्शन से। विख्यात और निष्णात होने के बावजूद सारी प्रस्तुति बेहद ढीली और प्रसंगहीन थी। उसमें व्यर्थ की घमाघम थी और यह समझना कठिन था कि जो कुछ हो रहा है उसका अवसर या आशय क्या है। इतनी प्राणहीन प्रस्तुति इस अवसर के सर्वथा अनुपयुक्त थी। दोनों ही प्रस्तुतियों से यह प्रगट हुआ कि अगर एक ओर राष्ट्रपति की निजी पहल और संभवत: निजी निगरानी में राष्ट्रपति भवन की गरिमा को कई ढंग से स्थापित करने की अच्छी कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से, उसकी गरिमा को नासमझी और असावधानी से हानि पहुंचाई जा रही है। राष्ट्रपति भवन में ऐसे विशिष्ट अवसर पर हाईस्कूल स्तर की प्रस्तुतियों को क्यों-कैसे पेश किया गया, यह समझना मुश्किल है। अगर ये प्रस्तुतियां भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का चुनाव थीं, जैसा कि शायद कहा गया, तो उससे जवाब-तलब करना चाहिए, असावधानी और कुरुचि के लिए सौ से थोड़े अधिक अतिथियों को तीनों पुस्तकें पास से देखने-पलटने का कोई अवसर नहीं मिला, जबकि उनकी कुछ प्रतियां निकलने वाले मार्ग पर इसके लिए आसानी से रखी जा सकती थीं। 

बहुलता की व्याप्ति

भारत में बहुलता को लेकर जो वाद-प्रवाद होते रहे हैं, उनमें इधर कुछ तीव्रता आई है। एक तो इसलिए कि ऐसी शक्तियां बहुत सक्रिय हो रही हैं, बहुलता को अवमूल्यित या अतिक्रमित कर किसी एकात्मता की स्थापना चाहती हैं। दूसरे, बहुलता के पक्षधरों को लगता रहता है कि धर्मनिरपेक्षता की ही तरह बहुलता की भी लगातार दुर्व्याख्या होती रही है। कुछ दिनों पहले रज़ा फाउंडेशन द्वारा अपनी चर्चा-शृंखला ‘आर्ट मैटर्स’ में आयोजित एक शाम विषय था- ‘भारतीय बहुलता, भारतीय सौंदर्यशास्त्र’, जिसमें राधावल्लभ त्रिपाठी, नमन अहूजा और कविता सिंह ने हिस्सा लिया। 

चर्चा में कई दिलचस्प कोण उभरे। बहुलता हमारी आधुनिकता की ही समस्या नहीं है, वह अतीत में भी सक्रिय और उलझन भरी रही है। कला-व्यवहार में अनेक कलाकारों आदि ने अपने-अपने ढंग से इस बहुलता का अवगाहन और सत्यापन किया है। उदाहरण के लिए गांधार शैली में वज्रपाणि और हरिति की दो प्रतिमाओं में कई विदेशी, परंपराओं के अभिप्राय शामिल किए गए थे, जिनमें ग्रीक, रोमन, मिस्र आदि शामिल हैं। सौंदर्य-चिंतन में अनेक अवधारणाएं और अभिप्राय ऐसे विकसित और विन्यस्त हुए, जो इस बहुलता की पुष्टि और अभिव्यक्ति करते हैं। अकेले रस-सिद्धांत में ही, जिसका भारतीय परंपरा में लगभग वर्चस्व रहा है, कई नई व्याख्याएं ही नहीं, कई नए रस भी जुड़ते रहे हैं जैसे ‘माया रस’। बहुलता का एक पक्ष यह भी रहा है कि भारत में ईसा पूर्व से ही साहित्य, संगीत और कलाओं के बीच गहरे और अटूट अंतस्संबंध निरंतर रहे हैं। जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है, भारत में भाषाओं, धर्मों, रीति-रिवाजों, दार्शनिक संप्रदायों, भोजन, वस्त्रभूषा आदि की इतनी बहुलता रही है कि यहां सब कुछ हमेशा से बहुवचन है। किसी को भी अकेला या एकवचन रहने ही नहीं दिया जाता: न मनुष्य को, न ईश्वर को, न अन्य प्राणियों को।

यह विचार करना चाहिए कि हमारी आधुनिकता ने हमारी बुनियादी और सदियों से अटूट बहुलता को पुष्ट किया या क्षति पहुंचाई। इस मामले में आधुनिकता का रिकार्ड मिला-जुला ही कहा जा सकता है। यों तो हमारी आधुनिकता भी एक नहीं रही है: जैसे परंपरा नहीं, परंपराएं कहना हमारे संदर्भ में अधिक समीचीन है, वैसे ही आधुनिकता नहीं, आधुनिकताएं कहना-मानना भी। लेकिन क्या आधुनिकताओं ने समय-समाज-व्यक्ति आदि को समझने और व्यक्त करने की कई शैलियां और दृष्टियां प्रतिपादित की हैं? इसका उत्तर तो निश्चय ही हां में होगा। लेकिन फिर ऐसा क्यों लगता है कि इस बहुलता का ऐसा ही सशक्त और उत्तेजक साक्ष्य हमें समझ, व्याख्या, विश्लेषण और आकलन में नहीं मिलता है। ऐसे आलोचनात्मक उद्यम और सौंदर्यशास्त्रीय प्रयत्न का वर्चस्वशाली हिस्सा, विशेषत: कलाओं को लेकर अंगरेजी में है और उसमें एकीकृत करके यानी सरलीकृत करने की वृत्ति नजर आती है, भले वह बड़ी जटिल और उत्तर-आधुनिक भाषा में क्यों न व्यक्त की गई हो। इस आलोचना में परंपरा-विस्मृति भी अपार है। भारतीय भाषाओं में होने के कारण भी साहित्य की आलोचना में अपेक्षाकृत अधिक जीवंत और स्पष्ट बहुलता है।  


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