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पुस्तकायन : स्मृतियों के वातायन PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 11:50

प्रताप दीक्षित

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : सुपरिचित कथाकार शैलेंद्र सागर की पुस्तक फिर मुझे ‘रहगुजर याद आया’ उनकी बचपन से युवावस्था तक की स्मृतियों का आत्मीय आख्यान है। इसके केंद्र में नायक खुद लेखक नहीं, बल्कि छोटा-सा शहर रामपुर बन जाता है, जहां लेखक का प्रारंभिक जीवन बीता है। जिस प्रकार एक समान अवयव होते हुए भी प्रत्येक मनुष्य दूसरे से भिन्न होता है, उसी प्रकार प्रत्येक शहर भी एक-सी गलियों, सड़कों, मकानों की एकरूपता के बावजूद अपनी संस्कृति, प्रवृत्तियों, बुनावट के कारण दूसरे से बिलकुल अलग होता है। यह लेखक का नितांत अपना ‘रामपुर’ है। रेणु के पूर्णिया, शानी के बस्तर, राही के गंगौली का पर्याय। 

मानवीय संवेदनाएं और सरोकार किसी एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं। इस प्रकार यह आत्मकथ्य संपूर्ण बदलते हुए समाज का प्रामाणिक आख्यान बन जाता है। प्रत्येक स्मृति की केंद्रीयता में आत्मीय संलिप्तता के बावजूद, लेखक निरपेक्ष द्रष्टा के रूप में उभरता है। शहर की गलियों, लंगरखानों, सड़कों, स्कूलों आदि के असंख्य ब्योरे दर्ज हैं, जिनमें एक स्वप्नद्रष्टा किशोर युवावस्था की ओर बढ़ रहा है। इसमें शहर की आकांक्षाएं, सपने, अंतर्द्वंद्व ही नहीं, खानपान की आदतें- प्रसिद्ध हब्शी हलुवा; भाषा- भइए, बीबी, पारे, भिन्नो; रीति-रिवाज, त्योहारों आदि का दिलचस्प लेखा-जोखा मौजूद है। 

‘अपने शहर की धरती पर चलते हुए अजब-सी थिरकन, उमंग, उत्तेजना मेरे अंदर उमड़ रही है।... इस माटी में कितने अपनत्व और प्यार का अहसास है।’ ‘इस जगह पर वक्त कहीं थम-सा गया है। जो जैसा था, वह वहीं स्थिर और जड़-सा मौजूद है।’ 

प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी नियति निर्धारित रहती है या वह स्वयं इसका नियामक होता है, इसमें विवाद हो सकता है, लेकिन इतना तय है कि लेखक के हिस्से में आए शहर (रामपुर) में मानवीय गरिमा से युक्त जो चरित्र आए हैं, उनका न केवल लेखक की निर्मिति में महत्त्वपूर्ण स्थान है, बल्कि उसकी सुधियों मे रचे-बसे हैं। पिता आनंद सागर (अपने समय के प्रसिद्ध उपन्यासकार, जिनकी प्रशस्ति में लेखक ने संकोचवश जरूरत से ज्यादा संयम बरता है), अध्यापक बद्रीविशाल विद्यार्थी, रामेश्वर दयाल, शिवकुमार, ईश्वर शरण सिंहल, मित्र सुनील, उमेश के प्रति यथासमय आदर, कृतज्ञता और आत्मीयता लेखक ने प्रकट की है। 

इसी तरह लेखक की स्मृतियों में एक महत्त्वपूर्ण चरित्र कुली असगर अली ‘नेताजी’ का भी है, एक नेकदिल, निडर, इंसाफपसंद, लोकप्रिय इंसान। जम्हूरियत का मतलब उसके लिए बराबरी का हक है। रामपुर के तत्कालीन नवाब के दामाद के खिलाफ चुनाव लड़ने का मंसूबा इसी हक की लड़ाई है। लेखक की टिप्पणी दृष्टव्य है: ‘आज के सियासी नेताओं के चरित्र और आचरण के संदर्भ में असगर अली जैसे लोग बड़े अजनबी और दुर्लभ हैं।... कुछ लोगों के लिए चुनाव लड़ना भी एक व्यवसाय बन चुका है।’ या रिक्शाचालक का कथन: ‘इलेक्शन जीतना शरीफों के बस में है क्या?’ ‘हम लोकतंत्र की मरीचिका में भटक रहे हैं।’ 

अतीत भविष्य के सपनों का अवगाहन होता है। आत्मकथ्य के माध्यम से, कहीं न कहीं, व्यतीत हुए समय से हम वार्ता, खुसफुस बातें करते हैं, जिसमें कितने आत्मीय चेहरे, जगहें, जिए हुए दिन, उनसे गुजरना उस सुख-दुख, यातनाओं को दुबारा जीना होता है। इस प्रक्रिया में विगत की समीक्षा करके भविष्य को दिशा और गति प्रदान करने के लिए, वर्तमान की जमीन का आधार आवश्यक होता है। इसकी अनुपस्थिति, आत्मकथा में केवल रचनाकार के व्यक्तित्व का प्रक्षेपण और आत्ममुग्धता ही प्रमुख बन कर रह जाती है। इसके बरक्स ‘फिर रहगुजर याद


आया’ में केवल गुजिस्ता वक्त से गुफ्तगू नहीं, बल्कि बदलती आकांक्षाओं, निजता बनाम सामाजिकता, वक्त के दौर में बदलते मनुष्य, समाज-राजनीति, उपभोक्तावाद, भ्रष्टाचार, शैक्षिक-सामाजिक मूल्यहीनता, विकास की अवधारणा, लुप्त होते सांप्रदायिक सौहार्द आदि समस्याओं का, अतीत से वतर्मान तक, लगातार तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। 

इतिहास में पचास वर्षों का समय ज्यादा नहीं होता। कौन से कारण हैं कि व्यक्ति इतना अंतर्मुखी, नितांत अपने में केद्रित हो गया है। लेखक इस पर चिंतन करता है, ‘पुरानी पीढ़ी भविष्योन्मुखी थी, आज लोगों का ध्यान वर्तमान पर है। बाजार और उदारीकरण ने उनकी इच्छाओं और सपनों को पंख लगा दिए हैं।... पहले लोगों की ख्वाहिशें और जरूरतें सीमित थीं।... लोग संतुष्ट और प्रसन्न रहते थे। उन्हें कुछ भी ललचाता नहीं था।... उन दिनों निजी जीवन की कोई अवधारणा नहीं थी। आज आत्मकेंद्रित और व्यक्तिवादी अधिक हैं। आज के लोगों का संसार बड़ा सिमटा हुआ है, जिसमें दूसरे के लिए कोई जगह नहीं। कोई शख्स जो नजदीकी बढ़ाने की कोशिश करता है, उसे बड़े संदेह या उपहास की दृष्टि से देखा जाता है।’ 

भ्रष्टाचार, खेल की राजनीति, विकास, उपभोक्तावाद के साथ व्यक्ति का अपने तक सिमटते जाना, स्त्री विमर्श, परिवार, जीवन दर्शन जैसे अनेक मुद्दों पर पुस्तक में बेबाकी से लिखा गया है। 

‘पुलिस का इस धंधे (अवैध असलहे) को पूरा संरक्षण था, क्योंकि काफी खपत तो महकमे में ही थी।’ ‘हाकी जैसे कम लागत वाले रोमांचक खेल को किस साजिश के तहत पीछे ढकेल दिया गया है, इस पर गंभीरता से पड़ताल करने की जरूरत है।’ ‘मीडिया तो सबसे ज्यादा बिकाऊ है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कितना खोखला है।’ वक्तव्य किसी काल्पनिक उपन्यास के पात्रों के नहीं, बल्कि आम आदमी के मुंह से निकले शब्द हैं। लेखक संताप ही प्रकट कर सकता है- ‘क्या विकास प्रकृति के विनाश का ही दूसरा प्रतिरूप है? क्या प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य और आभा को नष्ट किए बिना समाज में विकास, समृद्धि ओर प्रगति का आभास नहीं हो सकता?’ 

स्त्री-विमर्श के क्षेत्र मे यह कल्पनातीत लग सकता है, पर ज्यादा पुरानी बात नहीं, जब नवाब की एक बेगम ने अपने प्रेमी से हमल के बाद बच्चा जनने का ख्वाब देखा- ‘क्या मैं औरत नहीं हूं? मेरे अपने कोई ख्वाब नहीं हैं? महज सरकार की जरखरीद लौंडी की तरह तन्हाई और बेबसी में जिंदगी कैसे गुजार सकती हूं।’ 

इस प्रकार यह पुस्तक एक ओर तो गुजिस्तां वक्त की आत्मीय यादें, दूसरी तरफ बदलते जीवन मूल्यों का समाजशास्त्रीय विवेचन, संक्रमणशील समय के अंतर्विरोधों और अपने तरीके से सच के चेहरे को देखने का प्रयास है। 

फिर मुझे ‘रहगुजर याद आया’: शैलेंद्र सागर; वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।


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