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पुस्तकायन : जड़ें तलाशते लोग PDF Print E-mail
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Sunday, 03 August 2014 11:49

वीणा शर्मा

जनसत्ता 3 अगस्त, 2014 : उपभोक्तावाद और उपयोगितावाद के इस दौर में अखिलेश का उपन्यास निर्वासन अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक विसंगतियों को उद्घाटित करता है। नए पूंजीवादी परिवेश में चीजें काफी बदली हैं। आत्मप्रवंचना, संदेह, अवसाद, असंतोष जैसी त्रासद स्थितियों से जूझते आज के मनुष्य की कथा है यह उपन्यास। इसे बड़े महीन तंतुओं से बुना गया है। एक निर्वासन के भीतर कई निर्वासन हैं। दरअसल, महानगरों की अपनी समस्याएं हैं। एकल परिवार उन समस्याओं से जूझते हुए भयग्रस्त जीवन बिताते हैं। उपन्यास का आरंभ इन्हीं छिटपुट समस्याओं से होता है और लखनऊ से गोसार्इंगंज वाया सुल्तानपुर, सूरीनाम तक निर्वासन के कई रूप मिलते हैं, जो सूर्यकांत की वेबसाइट के माध्यम से परत-दर-परत खुलते हैं। 

सूर्यकांत ने प्रेम विवाह किया और अपने घर सुल्तानपुर से दूर लखनऊ में बसा है, मगर उसकी स्मृतियों में सुल्तानपुर नॉस्टेल्जिया की तरह बसा है। उसके इस निर्वासन की पीड़ा की गवाह उसकी पत्नी गौरी भी है। पूरे उपन्यास को लेखक ने छोटे-छोटे खंडों में बांटा है, शायद पाठकीय सुविधा या समय और समाज में हो रहे विखंडन को समझाने के लिए। 

उपन्यास सूर्यकांत के मुंह के छाले की पीड़ा से शुरू होता है, लेकिन यह पीड़ा बाहरी से ज्यादा आंतरिक है। दरअसल, इस पीड़ा में आज तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम को रूपायित करने की कोशिश की गई है। एक भीषण आशंका को चिह्नित करने का प्रयास किया गया है। नौकरशाही और राजनीति की सांठगांठ वाले कुरूप चेहरों को उघाड़ा है। जैसा दूल्हा होता है वैसे ही बराती भी आ जुटते हैं वाली बात वृहस्पति जैसे भ्रष्ट अफसरों पर लागू होती है। सूर्यकांत ऐसी खाऊ-पीऊ व्यवस्था से त्रस्त होकर, खुद को वहां फिट न पाकर कहीं और खिसकने की कोशिश करता है। 

सूर्यकांत की लखनऊ से गोसार्इंगंज की यात्रा सुल्तानपुर से होकर जाती है और जिसके केंद्र में सूरीनाम से आए रामअजोर पांडे के बाबा के बिछड़े परिवार की खोज है। रामअजोर पांडे के बाबा सौ साल पहले गिरमिटिया मजूर के रूप में सूरीनाम गए थे और वहां से वापस नहीं आए। पांडे अपने बाबा के परिवार को खोज कर अपने बाबा की आत्मा को शांति प्रदान कराना चाहता है। दूसरी ओर सूर्यकांत की लखनऊ से सुल्तानपुर की यात्रा अपनी स्मृतियों का पुनराख्यान है, जिसमें शहर तो वही है, लेकिन उसमें बहुत कुछ खो गया है, जिसमें कस्बे, मुहल्ले, गलियां, चांद, बारिश, चांदनी, पेड़-पौधे, हवा, धूप, खुशबू, सड़कें, मकान, छतें, रिश्ते वही नहीं रह गए हैं, जो पहले थे। 

सूर्यकांत एक आम आदमी है और आम आदमी का जिंदगी से जो मोह होता है वहीं से उसका डर उपजता है- अपने लिए, अपने स्नेही जनों के दूर जाने का। सूर्यकांत की एक खोज गोसार्इंगंज में चलती है, जहां वह रामअजोर पांडे के बाबा भगेलू के परिवार की खोज करता है, दूसरी ओर उसके अपने छूट चुके परिवेश का समूचा इतिहास है। परिवर्तन में विकास और विध्वंस दोनों की संभावनाएं बराबर होती हैं। मुहल्ले, नगर जब अपने पेड़-पौधों, धूप, खुशबू या स्वरूप से विस्थापित होते जाते हैं और उनके स्थानापन्न आ जाते हैं तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह तात्कालिक परिवर्तन विकास है या संभावित विध्वंस की सूचना। 

दरअसल, इसके पीछे इंसान की अदम्य आकांक्षाएं ही उत्तरदायी होती हैं, जो निरंतर बढ़ती जा रही हैं। सूर्यकांत को स्मरण हो आते हैं अपने चाचा के साथ बिताए बचपन से युवावस्था तक के दिन। यहां से उपन्यास में स्मृतियों का एक विस्तृत फलक खुलने लगता है। उसके निर्वासन में मां-बाप, भाई-बहन, दादी, चाचा के साथ और भी बहुत कुछ था, जिसे वह छोड़ गया था या उससे छूट गया था। यहां वरुणा से दिखते हजारों गांव हैं, जो शहर बनने की दौड़ में लगे हैं। सूर्यकांत की स्मृति में कैद है साइकिल, चूरन, लॉटरी, आपातकाल, मेले, मिठाइयां, रतजगे, राजनीतिक परिवेश में पलता-बढ़ता जीवन, चौरासी के दंगे, छतों की मुंडेरों से गायब होते चिड़ियों के कलरव, पक्षियों से सूना होता आकाश! मनुष्य की अत्याधुनिक सुविधाओं और बढ़ती जरूरतों ने मानवीय संबंधों में तो दूरियां बढ़ाई ही हैं, प्रकृति में भी असंतुलन पैदा किया है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने बहुत महत्त्वपूर्ण और विचारणीय मुद्दों को उजागर किया है। 

सूर्यकांत जहां अपने प्रेम के कारण परिवार से निर्वासित हुआ था, वहीं चाचा अपने परिवार की अत्याधुनिक सुविधाओं की चमक-दमक की होड़ से निर्वासित हैं।


दादी अपने जीने की इच्छा से निर्वासित हैं। गोसार्इंगंज के मुखिया धन की लालसा में अपने ईमान से निर्वासित हैं। इस उपन्यास में दो समांतर बिंदुओं को लक्षित किया गया है। उन्नीसवीं शताब्दी में रामअजोर पांडे के बाबा भगेलू गोसार्इंगंज से सूरीनाम गए थे गिरमिटिया मजूर बन कर, लेकिन वे अपनी इच्छा से वहां नहीं गए थे। गांव में अकाल पड़ा था। घर में खाने को एक दाना नहींं था। कुछ कमाने के लिए घर से बाहर निकले थे। भगेलू बाबा को जबरन इतनी दूर भेजा गया था। वहां भी वे अपने परिवार अपने देश के लिए तड़पते रहे। उनमें अपनी जड़ों से जुड़ने की ललक है, वहीं आज का युवा वर्ग विदेशों में बसने को आतुर है। 

हर नवयुवक का सपना अमेरिका, ब्रिटेन में बसने का है, जिससे खूब पैसा कमाया जाए। शिब्बू, नुपुर, कामना देवदत्त सब किसी न किसी तरह अमेरिका जाने की धुन में लगे हैं। जबसे उन्हें पता चला है कि रामअजोर पांडे एक अरबपति अमेरिकी व्यवसायी हैं और सूर्यकांत की उनसे निकटता है, सब अपने-अपने रिश्तों को भुनाने में लगे हैं। रामअजोर पांडे की अपार धन-संपत्ति के लालच ने गोसार्इंगंज में भगेलू के कई उत्तराधिकारी पैदा कर दिए हैं। गांव के ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण सभी अपनी-अपनी मनगढ़ंत कथाएं लेकर सूर्यकांत के समक्ष भगेलू बाबा के संबंधी साबित करने में लगे हैं। आज के दौर का यह भी एक चेहरा है कि हर डॉक्टर इंजीनियर डिग्री लेकर विदेशों का रुख किए बैठा है। आज पित्जा-बर्गर वाली संस्कृति हावी है, जो रिश्तों को मुनाफाखोरी और लाभ-हानि के तराजू पर तौल कर देखती है। 

प्रस्तुत उपन्यास का रोचक पहलू गोसार्इंगंज चरित है, जहां से सूर्यकांत की भगेलू बाबा के परिवार की खोज शुरू होती है। यहां जगदंबा, गिरिजाशंकर और प्रधान जैसे मजेदार चरित्रों से मुलाकात होती है। लेकिन इस वर्णन में लेखक ने इतिहास और वर्तमान में घटित होने वाली कई घटनाओं को इंगित किया है। सवा सौ साल पहले भयंकर अकाल पड़ा था। लोग भूख और प्यास से जूझ रहे थे। कई परिवारों को भूख की वजह से अपनी मासूम बच्चियों को बेचना पड़ा था, लेकिन यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि भूख की इस बिसात पर सौदा हुआ तो केवल लड़कियों का, किसी परिवार में लड़के को नहीं बेचा गया। भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था का संजाल इतना कसा हुआ है कि इसमें तनिक भी ढील लेकर इतर सोचने की गुंजाइश नहींं बनती। 

सूर्यकांत का शोध निष्कर्ष पर पहुंचने के बावजूद जाति-व्यवस्था के बड़े घेरे में जाकर स्थिर हो जाता है। ब्राह्मण और कुम्हार इन विपरीत जातियों में तालमेल कैसे हो सकता है। इसीलिए वह रामअजोर पांडे के इसी सवाल पर कह देता है कि मुझे कुछ नहीं कहना है। यही चुप्पी उसके अपने रिश्तों पर भी लागू होती है। एक बार निर्वासन के बाद जब वह दोबारा रिश्तों को तलाशने आता है। 

प्रस्तुत उपन्यास में जादुई यथार्थवाद का भी चित्रण हुआ है। (सूर्यकांत और गौरव के प्रस्थान के बाद एकांत मिलते ही घर में मेला लग जाता था। अनगिनत रंग-बिरंगे, तरह-तरह के दृश्य, आवाजें, बातें आकर उसके चारों ओर विराजमान हो जातीं। ऐसा लगता एक सूर्यकांत घर से निकलता, तो कई सूर्यकांत छोड़ जाता था। 

उपन्यास का शिल्प नया है और पात्र कथा के प्रवाह से छिटक कर अपना स्पष्टीकरण खुद देने लगते हैं, जो कथावस्तु को विशिष्ट बनाते हैं और संप्रेषणीय भी। इस अनंत प्रवाह में कुछ भी समाप्त नहीं होता, इसलिए लेखक ने शायद निष्कर्ष देना जरूरी नहीं समझा है। 

निर्वासन: अखिलेश; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 600 रुपए। 


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