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नेपाल के साथ नई संभावनाएं PDF Print E-mail
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Saturday, 02 August 2014 11:56

पुष्परंजन

 जनसत्ता 2 अगस्त, 2014 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा को लेकर वास्तव में उत्तेजना है, जोश है, जिज्ञासा है। इतना जुनून सत्रह साल पहले नहीं दिखा था, जब 1997 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल नेपाल की यात्रा पर गए थे। 2002 में प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी दक्षेस बैठक में काठमांडो पधारे थे, तब सब कुछ सामान्य ढंग से संपन्न हुआ था। मनमोहन सिंह दस वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन वे पूरब की ओर देखते रहे। दस साल में एक बार भी नेपाल की ओर न देखने का निहितार्थ वहां के लोगों ने यही निकाला कि मनमोहन सिंह की इस उत्तरी पड़ोसी में दिलचस्पी नहीं थी। दूसरा, नेपाल मामले को उन्होंने कूटनीतिकों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के हवाले कर रखा था। तीसरा, नेपाल के जितने भी प्रधानमंत्री हुए, भारत की अपेक्षा रही है कि सबसे पहले वे साउथ ब्लॉक आकर मत्था टेकें। पिछले सत्रह सालों में भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने नेपाल जाना क्यों नहीं जरूरी समझा, इस बारे में विदेश मंत्रालय ही विस्तार से कुछ बता सकता है। 

पिछले हफ्ते विदेशमंत्री सुषमा स्वराज नेपाल में थीं। उस समय विकास संबंधी छब्बीस मुद्दों पर दोनों देशों की सहमति बनी थी। सत्रह साल बाद भारत के प्रधानमंत्री नेपाल जाएं, और तेईस साल बाद भारत-नेपाल के विदेशमंत्री संयुक्त आयोग की बैठक करें, इसे भारतीय विदेश नीति की विडंबना नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे? भारत हर साल अमेरिका के साथ विदेशमंत्री स्तर की रणनीतिक बैठक कर सकता है, तो नेपाल के साथ ऐसी बैठक क्यों नहीं हो सकती? दोनों देशों के बीच संशय पैदा होने के कई कारणों में से एक यह भी है। 

नेपाल में प्रतिपक्ष के जो नेता पिछले दो दशक में दिल्ली आए, उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता था। बल्कि पिछले दस वर्षों में नेपाली नेता सबसे अधिक चीन की यात्रा पर गए, और चीन के बड़े नेता नेपाल आते रहे। खैर, नेपाल में मनमोहन सिंह की अच्छी या बुरी, जो भी छवि बनी हो, हो सकता है नरेंद्र मोदी उसे धो-पोंछ कर बराबर करने का प्रयास करें। इस साल नरेंद्र मोदी तीन और चार अगस्त के बाद, दूसरी बार नवंबर में अठारहवें सार्क शिखर बैठक के लिए काठमांडो जाएंगे।

नरेंद्र मोदी ऐसे समय नेपाल जा रहे हैं, जब नटवर सिंह की किताब ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ चर्चा में है। इस पुस्तक में पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह यहां तक खुलासा कर गए कि लिट््टे को हवाई मार्ग से मदद भेजी जाती थी, और उसकी खबर श्रीलंका सरकार को नहीं होती थी। बल्कि उसके लिए हरी झंडी वाइट हाउस से ली जाती थी। काठमांडो में कोई साढ़े तीन दशक से अक्सर चर्चा होती रही है कि ‘पूर्वी पाकिस्तान’ के वजूद को समाप्त करने में, श्रीलंका, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में अलगाववादियों की मदद करने में भारत का ‘विस्तारवादी सोच वाला सत्ता प्रतिष्ठान’ आगे रहा है। 

यह सच है कि नेपाल में इस विपरीत सोच को बढ़ाने में चीनी और पाकिस्तानी चिंतकों की बड़ी भूमिका रही है। नेपाल में बहुत पहले से कुछ प्रेक्षक आरोप लगाते रहे हैं कि पड़ोसी मुल्कों की सीमाओं का उल्लंघन कर भारत लड़ाकों की मदद करता रहा है। क्या नटवर सिंह की किताब नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा में जवाबदेही तय करा सकती है? क्योंकि भारत को यह भरोसा दिलाना होगा कि नेपाल में पहाड़ बनाम तराई की राजनीति में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है, और मोदीजी अपने पड़ोसी मुल्कों की संप्रभुता का सम्मान करते हैं। 

एक हफ्ते के भीतर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेताओं का मन मोदी के प्रति क्यों बदल गया, इस सवाल का उत्तर समय आने पर मिलेगा। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के काठमांडो पहुंचने से पहले नेकपा-माओवादी के अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण, मोदी के अभ्युदय को नेपाल के लिए खतरनाक मान रहे थे। लेकिन अब नेकपा-माओवादी के उपाध्यक्ष सीपी गजुरेल कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध हम किसी तरह का विरोध प्रदर्शन नहीं करेंगे।

हम चाहेंगे कि उनसे मुलाकात हो, और गलतफहमियां दूर हों। माओवादी नेता सीपी गजुरेल लंबे समय तक चेन्नई जेल में रह चुके हैं, और भारत के खिलाफ आग उगलने के लिए उन्हें जाना जाता है। उनके जैसा शख्स अगर मोदी के समर्थन में शांत बैठ जाता है, तो जरूर कोई बात है। गजुरेल ने कहा कि एक व्यक्ति पशुपतिनाथ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने नेपाल आ रहा है, उसका हम स्वागत करते हैं, चाहे वह हमसे बात करे, या न करे। नरेंद्र मोदी से तीन बड़ी पार्टियों, नेपाली कांग्रेस, एकीकृत नेकपा-माओवादी और नेकपा-एमाले के नेता मिल रहे हैं, तो इसके सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद की जानी चाहिए। 

अट्ठाईस जुलाई को काठमांडो के बालुआटार स्थित प्रधानमंत्री निवास पर तीनों दलों की बैठक हुई, और भारत से जारी जलविद्युत समझौते में आ रहे गतिरोध को समाप्त करने पर चर्चा हुई। लेकिन नेपाल की तैंतीस छोटी-छोटी पार्टियां कह रही हैं कि बिना राष्ट्रीय सहमति के भारत से किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होना चाहिए। ये वही तैंतीस पार्टियां हैं, जिन्होंने पिछले साल नवंबर में हुए संसदीय चुनाव का बहिष्कार किया था। एक कांटा 1950 की भारत-नेपाल संधि को लेकर भी है। यह संधि प्रासंगिक नहीं रह गई है। इसे निरस्त कर, नई संधि करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी एक ऐसी संसद को संबोधित करने जा रहे हैं, जिसका संविधान अब तक नहीं बन पाया है। यह वह संसद भवन


है, जो चीन द्वारा निर्मित है। यानी चीन की प्रेतछाया से आपका पड़ोसी न तो मुक्त है, न रहेगा।

सुषमा स्वराज की यात्रा से एक दिन पहले चीन ने घोषणा की कि 2020 तक ल्हासा से लुंबिनी तक उसकी रेल दौड़ने लगेगी, और चार साल में चीन की यह रेल भूटान सीमा के पार भी दिखेगी। ऐसे समय इसकी घोषणा का मतलब क्या था? 2012 में चीन की ‘थ्री जार्ज इंटरनेशनल कार्प’ नामक ऊर्जा कंपनी को पश्चिमी सेती नदी पर साढ़े सात सौ मेगावाट की जलविद्युत परियोजना का ठेका मिला। 1.6 अरब डॉलर की यह परियोजना 2019 में पूरी हो जाएगी। इसे लेकर नेपाल में कोई हो-हल्ला नहीं मचा। चीन चाहे ब्रिक्स में जितना बगलगीर हो जाए, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमा, बांग्लादेश में भारत का प्रतिस्पर्धी बना रहेगा। 

फिर भी, नेपाल के आम आदमी में इस बात के लिए उत्साह है कि भारत की ओर से इस बार सहयोग की बारिश होने वाली है। मध्य पहाड़ से गुजरने वाले पोस्टल राजमार्ग- जिसे हुलाकी हाइवे नाम दिया गया है- को बनाने का प्रस्ताव भारत दे चुका है। नौ सौ मेगावाट की अरुण-तेस्रो जलविद्युत परियोजना आधा अनुदान और आधा ऋण (जिस परब्याज सिर्फ एक प्रतिशत होगा) के साथ शुरू करने का प्रस्ताव नेपाल के लिए उपहार जैसा है। 

अरुण-तेस्रो जलविद्युत परियोजना पांच साल में पूरी होगी। इसके साथ ऊपरी कर्नाली जलविद्युत परियोजना पर भी हस्ताक्षर होना है। इससे नेपाल में अठारह घंटे की बिजली कटौती से निजात मिलेगी। 

अक्सर अनुमान के तुक्के लगते रहे हैं कि नेपाल चालीस हजार मेगावाट बिजली पैदा कर सकता है। पर जमीनी सच्चाई यह है कि नेपाल बीस छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं से मात्र छह सौ मेगावाट बिजली पैदा कर रहा है। नेपाल बिजली क्या बेचे, बल्कि मार्च 2012 तक वह भारत से 134 मेगावाट बिजली खरीद रहा था, उसे डेढ़ सौ मेगावाट तक बढ़ाने का आग्रह नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अधिकारी तभी कर चुके थे। नेपाल में इस समय नौ सौ मेगावाट बिजली की कमी हो रही है। लेकिन इसकी गारंटी कौन देगा कि वहां के प्रतिक्रियावादी भारतीय परियोजनाओं के खिलाफ झंडा और डंडा नहीं उठाएंगे। 

माओवादी हिंसा के दौरान सबसे अधिक भारतीय परियोजनाओं को क्षति पहुंचाई गई थी। फरवरी 1996 में महाकाली पंचेश्वर बहुउद््देश्यीय परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया गया। एक सौ बीस मेगावाट की टनकपुर जलविद्युत परियोजना का प्रतिरोध इस तरह से हुआ जैसे भारत, नेपाल की जमीन हथिया रहा हो। नेपाली जल संसाधन के जानकार रत्न संसार श्रेष्ठ को अब भी शंका है कि ऊर्जा समझौते के नाम पर नेपाल की नदियों का ‘सिक्किमीकरण’ न हो जाए। इस समय नेपाल के पचहत्तर जिलों में भारत की साढ़े चार सौ छोटी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं। भारत में साठ लाख नेपाली काम कर रहे हैं, कोई तीन हजार नेपाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जा रही है। इसका अहसान मानने में संकोच होता है। मगर हमारे नौकरशाह भी कम नहीं हैं। 2010 में नेपाल से विद्युत व्यापार समझौते (पीटीए) का मसविदा दिल्ली भेजा गया, लेकिन मनमोहन सरकार इस पर चार साल तक चुप रही। 

मनमोहन सरकार में योजनाएं बड़ी-बड़ी बनीं, लेकिन उनके कार्यान्वयन के लिए इच्छाशक्ति की कमी ने चीन जैसे चिरस्पर्धी को दक्षिण एशिया में पांव पसारने का मौका दे दिया। फरवरी 2012 में छठे साफ्टा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में दक्षिण एशियाई पावर ग्रिड बनाने की योजना का प्रस्ताव भारत ने दिया था। तीन सौ अरब डॉलर की इस परियोजना से नेपाल, भूटान, भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका से दो सौ गीगावाट जलविद्युत पैदा करने और उसके ट्रांसमिशन की परिकल्पना की गई थी। अगर सचमुच इस पर काम आरंभ होता, तो आज दक्षिण एशिया की तस्वीर ही कुछ और होती। 

प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वे ऊर्जा कूटनीति का शंख पशुपतिनाथ मंदिर से ही फूंकें। प्रधानमंत्री मोदी सोमवार को वहां विशेष पूजा करेंगे, इसके लिए पशुपतिनाथ मंदिर न्यास तैयारी में व्यस्त है। मोदी मुख्यमंत्री थे, तो सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी बने। पशुपतिनाथ क्षेत्र विकास कोष के कुछ सदस्य चाहते हैं कि मोदीजी यहां भी ट्रस्ट का हिस्सा बनें। क्या इसके पीछे हिंदू राष्ट्र की वापसी का कोई प्रच्छन्न एजेंडा है? 

पहली अप्रैल को विराटनगर पहुंचे विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी अगर सत्ता में आते हैं, तो नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाया जाएगा। फिलहाल, इस विवाद से बचने के लिए मोदी सरकार न तो पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र से सीधा वास्ता रख रही है, न ही शिवसेना नेपाल, विश्व हिंदू महासंघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों से। फिर भी, दुनिया उम्मीद पर कायम है। मोदीजी सोमनाथ से पशुपतिनाथ की ओर मुखातिब हैं, तो कुछ न कुछ पकेगा ही!


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