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टूटता भ्रम PDF Print E-mail
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Saturday, 02 August 2014 11:54

रोहित जोशी

जनसत्ता 2 अगस्त, 2014 : हाल में उत्तराखंड उपचुनावों में कांग्रेस की तीनों सीटों पर हुई जीत की खबर तो राष्ट्रीय मीडिया में दिखी, लेकिन इसे भारतीय जनता पार्टी की करारी हार के तौर पर देखने की कोशिश कहीं नहीं की गई। जबकि पत्रकारिता के नजरिए से भाजपा की हार की खबर की ‘न्यूज वैल्यू’ नरेंद्र मोदी की ‘लहर’ से लोकसभा चुनावों में मिली कामयाबी से ज्यादा है। लेकिन इस पहलू पर मीडिया खामोश रहा। वह अब भी मोदी महिमा-मंडन में ही व्यस्त है। उत्तराखंड में धारचूला, सोमेश्वर और डोईवाला सीटों पर उपचुनाव हुए। जहां विधायक रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और अजय टम्टा के लोकसभा चुनाव में जीत जाने से खाली हुई डोईवाला और सोमेश्वर सीटों पर उपचुनाव हुए, वहीं धारचूला में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए उनके विश्वासपात्र विधायक हरीश धामी ने अपनी सीट छोड़ी थी। मोदी की कथित लहर के बाद बनी भाजपा सरकार के अभी दो महीने ही गुजरे हैं। ऐसे में उस प्रदेश से इस तरह उसके बुरी तरह हारने को कैसे देखा जाना चाहिए, जहां से महज दो महीने पहले ही उसने लोकसभा की पांचों सीटों पर जीत दर्ज की थी। क्या यह मोदी के ‘अच्छे दिनों’ के मीडिया प्रचारित वादों की दो महीने में ही कलई खुल जाने की प्रतिक्रिया है?

इन चुनावों में धारचूला सीट पर हरीश रावत ने भाजपा प्रत्याशी बीडी जोशी को करीब बीस हजार मतों से हराया। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और डोईवाला सीट से भाजपा के विधायक रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की इस सीट पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा। यहां कांग्रेस प्रत्याशी हीरा सिंह बिष्ट ने भाजपा के त्रिवेंद्र सिंह रावत को लगभग तीन हजार वोटों से मात दी। त्रिवेंद्र भाजपा के राष्ट्रीय सचिव हैं और वे लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अमित शाह के साथ सह-प्रभारी भी रह चुके हैं, जहां भाजपा ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया। इसी तरह सोमेश्वर सीट पर भाजपा के अजय टम्टा पिछली दो बार से लगातार जीतते आ रहे थे। वहां भी कांग्रेस की रेखा आर्या ने भाजपा के मोहन लाल आर्या को भारी मतों से हराया। मोदी नाम की ‘आंधी’ और ‘भारत विजय’ जैसी घोषणाओं के सिर्फ दो महीने बाद, उत्तराखंड के इन उपचुनावों में बीजेपी की इस हार के गहरे निहितार्थ हैं। यह


हार जिन तीन सीटों पर हुई है उनमें से दो सीटें तो भाजपा की ही रही हैं, जिन्हें कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में अपनी ऐतिहासिक हार के बाद भी भाजपा से छीना है। यह कैसे संभव हुआ?

दरअसल, इस हार में छिपे संकेत और निहितार्थ सिर्फ उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए नहीं, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी हैं। मोदी चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अपनी सफल प्रचार रणनीति के चलते लोगों के बीच ऐसे सपने बो पाने में सफल हुए थे, जिन्होंने उन पर वोटों की बरसात कराई और भाजपा अप्रत्याशित रूप से दो सौ चौरासी सीटों के आंकड़े तक पहुंची। लेकिन सरकार गठन के ढाई महीने के भीतर भाजपा और मोदी की ओर से जनता को दिखाए गए जादुई सपनों की कलई जब उतरने लगी है तो इस पर लोगों की प्रतिक्रिया उत्तराखंड के इन चुनावों में देखने को मिली है। यों उत्तराखंड के लोगों के कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सरकारों के साथ एक जैसे ही अनुभव रहे हैं, फिर भी भाजपा और मोदी के हवाई सपनों का उनके पास जो भी विकल्प था, उसे चुन कर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर दी। मोदी सरकार बनने के बाद बेकाबू महंगाई, सब्जी-तेल से लेकर रेल किरायों में बढ़ोतरी, अटपटा बजट और किसी जनपक्षीय योजना के बजाय बुलेट ट्रेन जैसे गैर-जरूरी ‘विकास अभियान’ की ओर जोर और अपने एक-एक कदम का बेमानी प्रचार। लोगों के पास यही सब कुछ पहुंचा है। और अब वे इससे शायद दो-ढाई महीनों में ही आजिज आ चुके हैं!    


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