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श्रम का समय PDF Print E-mail
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Friday, 01 August 2014 11:29

जनसत्ता 1 अगस्त, 2014 : कारखानों में काम के समय और मजदूरों-कर्मचारियों की सुविधाओं में सुधार की दरकार लंबे समय से रही है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञ मानते रहे हैं कि श्रम कानूनों में काम संबंधी कठोर नियमों की वजह से उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विदेशी कंपनियां हमारे यहां निवेश से हिचकती हैं। इसी के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने श्रम कानूनों में तीन सुधारों को मंजूरी दी है। प्रस्तावित कानून के मुताबिक महिलाओं को भी रात की पाली में काम करने की छूट होगी। इसके लिए कारखाना मालिकों को उनकी सुरक्षा और घर तक छोड़ने के लिए वाहन आदि के इंतजाम करने होंगे। दूसरे, तय समय से अतिरिक्त काम करने के घंटे प्रति तिमाही पचास से बढ़ कर सौ हो जाएंगे। विशेष मांग पर इन्हें एक सौ पच्चीस घंटे तक किया जा सकेगा। इसी तरह प्रशिक्षु यानी अप्रेंटिशशिप अधिनियम में बदलाव कर कंपनियों को अधिकार दिया गया है कि वे अपनी सुविधा के मुताबिक लोगों का चयन और इससे जुड़े नियम-कायदों में बदलाव कर सकेंगी। कंपनियों से मजदूरों-कर्मचारियों के आराम, खान-पान आदि से जुड़ी सुविधाओं का विशेष खयाल रखने और खतरनाक उद्योगों में लगे मजदूरों की सेहत का ध्यान रखते हुए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की अपेक्षा की गई है। माना जा रहा है कि इन संशोधनों से औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन की दर बढ़ेगी और बाहरी कंपनियां निवेश के लिए आगे आएंगी। 

नरेंद्र मोदी सरकार का जोर उत्पादन बढ़ाने, उद्योग जगत को मजबूत बनाने पर अधिक है, इसलिए उसके इस कदम का आधार समझा जा सकता है। तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों में महिलाएं रात की पाली में काम करने लगी हैं, इसलिए कल-कारखानों में भी इस तरह की छूट का दबाव था। फिर अतिरिक्त काम के घंटे की सीमा बहुत कम होने के कारण कंपनियों को अधिक मजदूर और कर्मचारी रखने पड़ते थे। अब कम लोगों से अधिक समय तक काम कराया जा सकेगा, माना जा रहा है कि इस तरह मजदूरों की अतिरिक्त आमदनी भी बढ़ेगी। मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि श्रम कानूनों में काम के अधिकतम घंटे निर्धारित होने के बावजूद बहुत सारे कल-कारखाने मजदूरों के काम का


समय उससे अधिक रखते हैं। अतिरिक्त काम की अवधि और उसके लिए पारिश्रमिक भी कंपनी मालिकों की मर्जी पर निर्भर करते हैं। ऐसा सिर्फ छोटे कल-कारखानों में नहीं, बड़ी कंपनियों में भी खुलेआम चलता है। फिर कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा का सवाल दिन पर दिन गहराता गया है, उसकी फिक्र सरकारों को नहीं सताती। मारुति कारखाने में मजदूरों का असंतोष और उनका दमन श्रम कानूनों की अनदेखी का सबसे बड़ा उदाहरण है। 

ऐसी अनेक घटनाएं देश की विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में हो चुकी हैं, जिनमें प्रबंधन की मनमानियां उजागर हुई हैं। पर सरकार की तरफ से श्रम कानूनों की रक्षा के प्रयास नहीं देखे गए। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि श्रम कानूनों में नए संशोधन से कारखाना मालिकों को मजदूरों से मनमानी शर्तों पर काम कराने की छूट मिल जाएगी। पता नहीं क्यों, ताजा संशोधन में श्रमिक हितों की अवहेलना पर कड़े कदम उठाने की बात कहने से बचा गया है। आए दिन कारखानों में सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी की वजह से हादसों की खबरें आती रहती हैं, उन पर मजदूरों के हक में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया जा सका है। इस तरह उत्पादन बढ़ाने और औद्योगिक इकाइयों के विस्तार की गरज से मजदूरों के हितों को नजरअंदाज करना श्रम कानूनों का मकसद नहीं हो सकता। वर्तमान स्थितियों में रोजगार की समस्या और मजदूर हितों से जुड़े पहलुओं पर सम्यक विचार के बाद ही कोई संशोधन उचित होगा। 


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