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अदृश्य जंजीरें PDF Print E-mail
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Friday, 01 August 2014 11:22

राज कुमारी

जनसत्ता 1 अगस्त, 2014 : हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री विद्या बालन अपने सामाजिक सरोकारों के चलते हाल में चर्चा में आर्इं। वे ‘घर घर में शौचालय’ के विज्ञापन में ग्रामीण महिलाओं के लिए घरों में शौचालय की वकालत करती हैं। इस विज्ञापन में विद्या गांव के बड़े-बुजुर्गों को धिक्कारती हुई कहती हैं कि ‘स्त्रियों को परदे में ढंक कर इज्जत तो बचा ली, लेकिन खुले में शौच के लिए भेजने में कैसी इज्जत?’ वे उस नव-विवाहिता को ‘असली नायिका’ करार देती हैं, जिसने शौचालय न होने के कारण ससुराल जाने से इनकार कर दिया। इसे वे स्त्रियों के सम्मान और सुरक्षा से जोड़ती हैं, चाहे उसके लिए परदे को वैधता ही क्यों न देनी पड़े। यहीं मुझे एक हिंदी फिल्म का यह गीत याद आ रहा है जिसमें एक बच्चा पूछता है- ‘शू-शू शू-शू आ गया, मैं क्या करूं!’ नायक जवाब देता है- ‘कहीं भी कर आओ, कार के पीछे, दीवार के, घर के आगे-पीछे...!’ यों, दोनों संदर्भ सरसरी तौर पर देखने में अलग हैं। लेकिन जेंडर के नजरिए से देखा जाए तो समाज में पितृसत्ता की ऐसी जकड़बंदी मिलेगी, जिसके तहत पुरुष को सब कुछ करने की आजादी है। विज्ञापनकर्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि यह मनुष्य की नैसर्गिक जरूरत है, जो दरअसल सहूलियत, सुरक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित है और यह स्त्री के लिए भी उतना ही जरूरी है।

स्वस्थ रहने के लिए चिकित्सक खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। कौन व्यक्ति निरोग और स्वस्थ रहना नहीं चाहेगा? लेकिन स्त्रियों के लिए यह सच्चाई अधूरी है। आमतौर पर घर से बाहर निकलते ही स्त्रियों को पेशाब की चिंता सताने लगती है। वे लगातार यह सोचती रहती हैं कि रास्ते या बाजार में शौचालय की सुविधा मिल भी पाएगी या नहीं। इस मानसिक सतर्कता और अनिश्चितता के कारण वे खूब पानी पीने की हिम्मत कैसे करें? जिन स्त्रियों को कुछ समय के लिए बाहर रहना पड़ता है, वे किसी तरह अपनी जरूरत से समझौता कर लेती हैं। परिवार और समाज उन्हें बचपन से ‘एडजस्ट’ करना ही सिखाता है। गंभीर समस्या उन स्त्रियों के सामने पेश आती है, जिन्हें नौकरी या अन्य वजहों से देर तक सफर में रहना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में तो दूर, दिल्ली जैसे महानगरों में भी स्त्रियों के लिए शौचालय की व्यवस्था बेहद अपर्याप्त है। अगर कहीं है भी, तो असुरक्षाबोध और यौन हिंसा के जोखिम से गुजरने के बाद ही कोई स्त्री वहां पहुंचती है, जहां आमतौर पर इतनी गंदगी होती है कि उनका इस्तेमाल कई बीमारियों के लिहाज से खतरनाक होता है। नतीजतन, घर से बाहर निकलना नैसर्गिक जरूरत को पूरा करने की दृष्टि से सिर-दर्द हो जाता है। इस चिंता से मुक्ति की कोशिश में महिलाएं


पानी पीना कम कर देती हैं। ऐसी बीमारियों की एक लंबी फेहरिस्त है जो पानी की कमी या पेशाब को किन्हीं वजहों से रोकने से होती हैं। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों और झुग्गी बस्तियों में रहने वाली महिलाओं का यौन शोषण, बलात्कार, अगवा कर हत्या जैसे जघन्य अपराध रात में खुले में शौच के लिए जाते हुए होते हैं। कई मामलों में गरीब महिलाएं समाज के दबंगों या फिर पुलिस के खौफ के चलते प्राथमिकी भी दर्ज नहीं करा पातीं। दरअसल, पितृसत्तात्मक व्यवस्था शुरू से ही स्त्री को अपने शरीर के प्रति लापरवाह और समझौतापरस्त बनना सिखा देती है। वह समाज और व्यवस्था पर अंगुली उठाने के बजाय यथास्थिति को स्वीकार कर लेती है।

एक निजी स्कूल में पढ़ने वाली मेरी पांच साल की भांजी स्कूल के गंदे शौचालय को इस्तेमाल करने के बजाय घर आकर ही निपटती है। यही नहीं, व्यवस्थागत समस्या के दायरे का एक सच यह भी है कि मेट्रो स्टेशन परिसर में बने शौचालयों के बाहर उपयोग करने की कीमत एक रुपए लिखी होती है, लेकिन कुछ जगहों पर महिलाओं से दो रुपए वसूले जाते हैं। 

मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आते हैं, जब मैं घर से तकरीबन सवा घंटे की यात्रा करके कॉलेज जाती थी। बसों की कमी और देरी के कारण यह अवधि और बढ़ जाती थी। दफ्तर जाने का वक्त होने के कारण बसें पूरी तरह भरी होतीं। पुरुषों की हरकतों के कारण उनमें सफर करना शारीरिक और मानसिक यंत्रणा झेलने जैसा था। दो-तीन घंटे बाहर रहने के कारण शौचालय की जरूरत स्वाभाविक थी। स्थिति कई बार असहनीय हो जाती। ऐसे में खुद पर तरस खाने के अलावा कुछ किया नहीं जा सकता था। मेरे साथ आने वाली अन्य लड़कियों के भी अनुभव ऐसे ही थे।

आज भी स्वास्थ्य और महिला सशक्तीकरण के युग में स्त्रियों के लिए सभी जगह सुविधाजनक शौचालय के लिए बेहद कम प्रयास हुए हैं। कुछ संभ्रांत इलाकों को छोड़ दें तो निम्नवर्गीय और दलित स्त्रियों के लिए साफ और सही जगह पर शौचालय एक सपना है।


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