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योजना की चाल PDF Print E-mail
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Thursday, 31 July 2014 11:03

जनसत्ता 31 जुलाई, 2014 : हमारे देश में योजनाएं तो बड़े उत्साह से बनाई जाती हैं और उनके संभावित लाभ भी खूब गिनाए जाते हैं, मगर उन्हें मंजिल तक पहुंचाने की बहुत फिक्र नहीं की जाती है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि तमाम योजनाएं अपने लक्ष्य से बरसों पीछे चल रही होती हैं। खुद केंद्र सरकार के सांख्यिकी विभाग की समय-समय पर आने वाली रिपोर्टों से इसकी पुष्टि होती है। विभाग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बड़ी ढांचागत परियोजनाओं में से एक तिहाई का काम काफी पीछे चल रहा है। पर यह केवल देरी का मामला नहीं है। इस विलंब से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त भार पड़ता है, क्योंकि घिसटते रहने से परियोजनाओं की लागत बढ़ती जाती है। महत्त्वाकांक्षी ढांचागत परियोजनाओं के पिछड़ने से उनकी लागत करीब एक लाख करोड़ रुपए बढ़ चुकी है। यानी इतनी अतिरिक्त रकम सरकार को उन पर खर्च करनी पड़ेगी। फिर, यह अभी का आकलन है। भविष्य में होने वाली देरी के मद्देनजर इनकी लागत और भी बढ़ सकती है। सरकारी खजाने पर पड़ने वाला यह अतिरिक्त बोझ अंतत: करदाताओं के साथ अन्याय है। 

लोकसभा में पेश की गई सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट में करीब एक लाख करोड़ रुपए के अतिरिक्त भार की बात सिर्फ बड़ी ढांचागत परियोजनाओं की बाबत कही गई है। अगर अन्य परियोजनाओं के भी क्रियान्वयन का हिसाब लगाया जाए और राज्यों के भी योजनागत विलंब का वित्तीय आकलन हो तो सार्वजनिक धन के बेजा व्यय की कैसी भयावह तस्वीर उभरेगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अमल में देरी से अनियमितता की गुंजाइश भी बढ़ती है। इस सब के बावजूद, क्रियान्वयन में विलंब के लिए कभी किसी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई। बिना किसी जांच-परख के बढ़ी हुई लागत के कारण आबंटन बढ़ा दिया जाता है। लक्ष्य से पीछे चलने वाली परियोजनाओं में सबसे ज्यादा रेलवे की हैं। हाल में रेल किराए में चौदह फीसद और माल भाड़े में साढ़े छह फीसद की वृद्धि की गई और रेलवे की माली हालत सुधारने के लिए इसे जरूरी बताया गया। लेकिन यह कब


बताया जाएगा कि रेलवे की योजनागत लेटलतीफी की कितनी कीमत मुसाफिरों को चुकानी पड़ रही है! रेल, सड़क, बिजली आदि आधारभूत संरचना के क्षेत्रों में होने वाली देरी का नुकसान वहीं तक सीमित नहीं रहता, दूसरे विकास-कार्यक्रमों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। कानून-व्यवस्था की समस्या से लेकर भूमि अधिग्रहण में आ रही मुश्किलों और पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में होने वाली देरी तक ढांचागत परियोजनाओं के समय से पूरा न हो पाने की कई वजहें रिपोर्ट में रेखांकित की गई हैं। 

मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने और पर्यावरणीय मंजूरी में तेजी लाने का इरादा जता चुकी है। जबकि खुद पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में काफी उदारता से पर्यावरणीय मंजूरी दी गई, लाखों एकड़ वनक्षेत्र औद्योगिक और खनन परियोजनाओं के हवाले कर दिए गए; स्वीकृत परियोजनाओं के बरक्सनामंजूर प्रस्तावों का अनुपात महज ढाई फीसद रहा। नया भूमि अधिग्रहण कानून पिछले साल संसद से पारित हुआ, जबकि बहुत सारी परियोजनाएं बरसों पहले से पीछे चल रही हैं। इसलिए भूमि अधिग्रहण के सिलसिले में पुनर्वास और बेहतर मुआवजे के प्रावधानों और पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों को निशाना बनाने के बजाय योजना संबंधी अनुशासन और प्रशासन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में वैसे भी तमाम कार्यक्रम बदइंतजामी और लेटलतीफी के शिकार हैं जिनका भूमि अधिग्रहण या पर्यावरणीय मंजूरी से कोई लेना-देना नहीं है। 


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