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Thursday, 31 July 2014 11:03

जनसत्ता 31 जुलाई, 2014 : दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। उस घटना के खिलाफ दिल्ली में इतना नागरिक आक्रोश उभरा कि महीने भर विरोध-प्रदर्शन होते रहे। देश के दूसरे हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरे। मीडिया भी काफी सक्रिय दिखा। इस सब का असर यह हुआ कि यौनहिंसा संबंधी कानूनों की समीक्षा के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की। समिति की सिफारिशों के मद््देनजर यौनहिंसा से संबंधित कानून और कड़े किए गए। लेकिन इस सबसे जो उम्मीद की गई थी, वह पूरी होना तो दूर, उलटे लड़कियों और स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में दिल्ली में भी बढ़ोतरी दिखाई देती है और कई दूसरे महानगरों और राज्यों में भी। यह और साफ होता जा रहा है कि ऐसी घटनाओं का एक बड़ा आयाम समाज में आ रही विकृतियां हैं। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली में पंद्रह साल की एक नाबालिग के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार है। इस मामले के पांच आरोपियों में दो नाबालिग हैं और उसके पड़ोसी भी। आरोपियों ने इस घटना का एमएमएस भी बनाया और लड़की को धमकी दी कि अगर उसने इस बारे में मुंह खोला तो ली गई तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी जाएंगी। एक हफ्ते तक उसने किसी को कुछ नहीं बताया। पर तबीयत बिगड़ने पर उसके परिवार से हकीकत छिपी न रह सकी। पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, हो सकता है बाकी भी कुछ दिनों में पकड़ लिए जाएं। ऐसे बहुत-से मामले धमकी या डर की वजह से छिपे रह जाते हैं। इस मामले में भी ऐसा हो सकता था। लेकिन कई मामलों में सच्चाई सामने न आने देने के लिए आरोपियों को ज्यादा हथकंडे नहीं आजमाने पड़ते, पीड़ित और उसके परिवार की ‘इज्जत’ चली जाने का डर उनकी मंशा पूरी कर देता है। 

इस तरह बलात्कार ऐसा अपराध है, जिसमें न्याय की राह में समाज की मानसिकता ही सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। इसी के चलते कई बार पड़ोसी और


रिश्तेदार तक यह अपराध करने का दुस्साहस जुटा पाते हैं, वे सोचते हैं कि मामले को दबाए रखने में ही पीड़िता का परिवार अपनी भलाई समझेगा। लेकिन अब शिकायतें दर्ज कराने का रुझान थोड़ा बढ़ा है, जो कि अच्छी बात है। पर सवाल है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं जिसमें लड़कियां स्कूल और आस-पड़ोस और यहां तक कि घर में भी सुरक्षित नहीं हैं! पिछले दिनों बंगलुरु के एक अभिजात स्कूल में छह साल कीबच्ची के साथ स्कूल के ही दो कर्मचारियों ने बलात्कार किया, जिससे विचलित होकर इस महानगर के लोग कई दिन विरोध-प्रदर्शन करते रहे। उनके आक्रोश की गूंज थमी नहीं थी कि बंगलुरु में करीब इतनी ही उम्र की एक और बच्ची के साथ बलात्कार का मामला सामने आ गया। उत्तर प्रदेश या बिहार के किसी पिछड़े जिले के देहात से ऐसी खबर आती है तो उसे लड़कियों-औरतों को मुंहअंधेरे शौच के लिए दूर जाने की समस्या से भी जोड़ कर देखा जाता है। निश्चय ही उनके लिए घर की चौहद््दी में शौच की सुविधा होनी चाहिए। लेकिन फिर बंगलुरु या दिल्ली या किसी और महानगर-शहर में यौनहिंसा को कैसे रोकेंगे। बलात्कार की बहुत-सी घटनाओं का जान-पहचान के दायरे में होना यह बताता है कि भरोसे के सारे तार टूट रहे हैं। कानून-व्यवस्था की खामियों के साथ-साथ इस अपराध के दूसरे पहलुओं की बाबत भी समाज में चेतना जगानी होगी। 


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