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पाठ या कुपाठ PDF Print E-mail
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Wednesday, 30 July 2014 11:39

जनसत्ता 30 जुलाई, 2014 : जहां भी भाजपा सत्ता में होती है, पाठ्यक्रमों में मनमाने फेरबदल करने से बाज नहीं आती। भारतीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर वह अक्सर हिंदुत्व और उसमें व्याप्त रूढ़ियों को बढ़ावा देने, दूसरे धर्मों के प्रति नफरत पैदा करने और इतिहास, विज्ञान आदि की पढ़ाई में तथ्यों की बलि चढ़ा कर अपनी भ्रांत धारणाएं थोपने में लग जाती है। गुजरात के सरकारी स्कूलों में दीनानाथ बत्रा की लिखी नौ किताबों को अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने का फैसला इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है। इन किताबों में बताया गया है कि भारत अब भी अखंड है, इसलिए भारत का नक्शा बनाते समय पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश आदि को भी इसमें शामिल करना चाहिए। इसी तरह भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियां गिनाते हुए महाभारत में कुंती-पुत्रों के जन्म और संजय की दिव्य दृष्टि जैसे उदाहरणों के जरिए पश्चिमी वैज्ञानिकों की स्टेम सेल प्रत्यारोपण खोज और टेलीविजन के आविष्कार आदि को नकारने की कोशिश की गई है। नैतिक शिक्षा के नाम पर इन पुस्तकों में बस गाय को रोटी खिलाने, देवी-देवताओं की पूजा करने आदि की सीख दी गई है। गौरतलब है कि दीनानाथ बत्रा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शिक्षा संबंधी संस्था शिक्षा भारती की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। इन पुस्तकों का प्रकाशन गुजरात राज्य पाठ्यपुस्तक बोर्ड ने किया है और इन पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षामंत्री भूपेंद्रसिंह चूड़ासमा के प्रशंसा-पत्र भी छपे हैं। जाहिर है, ये पुस्तकें गुजरात सरकार के सुनियोजित प्रयासों का परिणाम हैं। 

हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ऐसा हस्तक्षेप नया नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की पुस्तकों में इतिहास संबंधी पाठों में तथ्यात्मक बदलाव किए गए थे और विश्वविद्यालयों में ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू की गई थी। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के स्कूलों में नैतिक और शारीरिक शिक्षा के नाम पर संघ की मंशा के अनुरूप पाठ तैयार कराए गए। संघ का मानना है कि पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में वामपंथी विचारधारा के लोगों का वर्चस्व रहा है और उन्होंने जान-बूझ कर या पश्चिम के


अंध-प्रभाव में अपने देश के इतिहास, संस्कृति, विज्ञान आदि से जुड़े गलत तथ्य पेश किए हैं। इस तरह वह अपने ढंग से पाठ्यपुस्तकें तैयार कराने और पढ़ाई-लिखाई का परंपरागत तरीका लागू करने का प्रयास करता रहा है। मगर सवाल है कि क्या ये बदलाव मान्य शिक्षाविदों से विचार-विमर्श का नतीजा हैं? इस तरह की पुस्तकें  पाठ्यक्रम में शामिल करके संघ और भाजपा नई पीढ़ी का कैसा मानस बनाना चाहते हैं? हमारा संविधान नैतिक शिक्षा के नाम पर दूसरे धर्मों को मानने वालों की आस्था पर चोट करने की इजाजत नहीं देता। फिर, आज जब पूरी दुनिया में विज्ञान, इतिहास, संस्कृति आदि के क्षेत्र में ढेरों प्रामाणिक शोध उपलब्ध हैं, संघ के पूर्वग्रह आधारित बेतुके पाठों के जरिए विद्यार्थी उनसे कैसे तालमेल बिठा पाएंगे? खासकर विज्ञान के क्षेत्र में मिथकों के जरिए रास्ता नहीं बनाया जा सकता। शिक्षा का मकसद समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहअस्तित्व को प्रगाढ़ करना और प्रगति के नए द्वार खोलना भी होता है, मगर संघ के लिए शायद यह मायने नहीं रखता। इतिहास के बारे में अपनी बेसिर-पैर की धारणाएं थोपने से न इतिहास बदल जाएगा, न आधुनिक वैज्ञानिक खोजों को प्राचीन भारत में हुई बता कर उनकी सच्चाई पर परदा डाला जा सकता है। पर इस तरह विद्यार्थियों और आने वाली पीढ़ी को जो नुकसान होगा, उसकी कल्पना की जा सकती है।  


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