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इतिहास पर परदा PDF Print E-mail
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Wednesday, 30 July 2014 11:32

निवेदिता सिंह

जनसत्ता 30 जुलाई, 2014 : कहते हैं कि इतिहास बदला नहीं जा सकता। जो बीत चुका हो, उस पर किसका आधिपत्य चल पाएगा। लेकिन यह धारणा एक झटके से टूट जाती है, जब हम इन दिनों टीवी पर प्रसारित होने वाले कुछ धारावाहिक देखते हैं। इन धारावाहिकों में परोसी जा रही कहानियों से हम एक ऐसे ‘इतिहास’ से रूबरू होते हैं, जो कभी घटित नहीं हुआ या जो स्पष्ट नहीं है। इन दिनों दो अलग-अलग टीवी चैनलों पर ‘महाराणा प्रताप’ और ‘जोधा अकबर’ नाम से धारावाहिकों का प्रसारण हो रहा है। महाराणा प्रताप और अकबर दोनों पात्र ऐतिहासिक हैं। लेकिन इन धारावाहिकों में जो दिखाया जा रहा है, उसे देख कर बेहद अफसोस होता है कि बाजार अपने मुनाफे के लिए अब क्या हमारे इतिहास को भी अपनी मर्जी से तोड़-मरोड़ कर बेचेगा! 

जब इन धारावाहिकों में कहानियों के असंगत होने पर कुछ लोगों की ओर से आपत्ति जताई गई और ‘जोधा अकबर’ की विषय-वस्तु को लेकर प्रदर्शन भी हुए तो इसके निर्माता की ओर से कहा गया कि यह कहानी का नाट्य-रूपांतर है। इतिहास में भले अकबर को एक महान योद्धा और कुशल प्रशासक के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन हमारे धारावाहिक निर्माताओं के मुताबिक अकबर अपने राज्य के कामकाज के बजाय अपनी बेगम रुकैय्या और जोधा में ही उलझे रहते हैं। वहीं महाराणा प्रताप अपनी दो प्रेमिकाओं और उनके पिता राणा उदय सिंह हमेशा अपनी पत्नियों के बीच व्यस्त दिखाई देते हैं। यही नहीं, कहानी में राणा उदय सिंह को एक महान योद्धा और कुशल रणनीतिकार के रूप में दिखाया गया है। जबकि इतिहास में वे एक महान पिता राणा सांगा के नाकारा पुत्र के तौर पर जाने जाते हैं। ऐसा लगता है कि ये धारावाहिक इतिहास से जुड़ी घटनाओं पर आधारित नहीं, बल्कि चालू मसाला फिल्में हैं और कहानी इसी हिसाब से आगे बढ़ रही है। 

टेलीविजन के प्रसार का एक दुष्परिणाम यह है कि हमारी नई पीढ़ी इन्हीं प्रसारित धारावाहिकों को देख कर समझती-बूझती है और कई बार गलत-सही का फैसला भी उसी आधार पर करती है। हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इन टीवी धारावाहिकों को देख कर पलती-बढ़ती यह पीढ़ी महाराणा प्रताप और अकबर के बारे में अपनी क्या राय बना रही होगी! जाहिर है, उसके लिए आदर्श के तौर पर शाहरुख खान या आमिर खान हैं। दरअसल, जहां तक टीवी की पहुंच है, वहां तक हमारी किताबें नहीं पहुंच पाती हैं। वह भी इतने शानदार और आकर्षक तरीके से। ऐसे में नई पीढ़ी कैसे इन टीवी कहानियों की हकीकत का आकलन करेगी। 

इतिहास में यह दर्ज है कि जहां राजपूताने के लगभग सभी राजाओं ने एक-एक कर अपने हथियार मुगल शासकों के सामने डाल


दिए थे, वहीं महाराणा प्रताप पूरी जिंदगी मुगलों के खिलाफ लड़ते रहे, किसी से समझौता नहीं किया, किसी के सामने झुके नहीं। दूसरी ओर, अकबर ने विदेशी होने के बावजूद भारत को एकसूत्र में जोड़ने की कोशिश की और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया। धारावाहिक में दिखाया जा रहा है कि महाराणा प्रताप और बैरम खां के बीच कई बार लड़ाई हुई और हर बार बैरम खां बुरी तरह हारा। यही नहीं, इसमें यहां तक दिखाया गया कि अकबर ने सब कुछ छोड़ कर मेवाड़ को जीतने के लिए सारी ताकत झोंक दी। जबकि इतिहास में दर्ज तथ्य के अनुसार बैरम खां और महाराणा प्रताप का कहीं आमना-सामना नहीं हुआ। यही बात अकबर और महाराणा प्रताप पर लागू होती है। इतिहासकार सतीश चंद्र के मुताबिक, जब महाराणा प्रताप राजा बने, तभी अकबर ने उनके सामने दोस्ती का प्रस्ताव रखा था। इससे पहले अकबर ने मेवाड़ को बहुत ज्यादा महत्त्व नहीं दिया था। लेकिन धारावाहिक में बचपन से ही दोनों के बीच युद्ध दिखाया जा रहा है। 

सवाल है कि एक समूची पीढ़ी के दिमाग में इतिहास की गलत व्याख्या भरने के लिए क्या इन टीवी चैनलों के साथ-साथ ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं के आधार पर धारावाहिक बनाने वालों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? मेरा मानना है कि कानूनी और सामाजिक, दोनों स्तरों पर इनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। लेकिन वे कानूनी अड़चन से बचने के लिए सिर्फ चंद लाइनें लिख कर अपना कर्तव्य पूरा मान लेते हैं कि यह चैनल किसी ऐतिहासिकता का दावा नहीं करता है! लेकिन ऐतिहासिक चरित्रों और घटनाक्रम में जिस तरह मनमर्जी तरीके से तोड़मरोड़ किया जाता है, उसमें क्या यह सफाई काफी है? क्या आज के छोटे-छोटे बच्चे और किशोर इन कहानियों को इतिहास के सच से जोड़ कर नहीं देखेंगे-समझेंगे? बात चाहे व्यक्तिगत जीवन की हो या राजनीतिक, इस पहलू को लेकर टीवी चैनल न अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही अपनी लापरवाही के सामाजिक नुकसानों का अंदाजा लगा पाते हैं।


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