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नेपाल के साथ PDF Print E-mail
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Tuesday, 29 July 2014 11:06

जनसत्ता 29 जुलाई, 2014 : पड़ोसी देशों में भूटान और नेपाल ऐसे देश हैं जिनके साथ हमारे संबंधों में कहीं अधिक स्थिरता रही है। यही नहीं, भूटान की तरह नेपाल के साथ भी भारत के संबंध विशिष्ट रहे हैं। दोनों देशों की साढ़े अठारह सौ किलोमीटर लंबी सीमा खुली हुई है और दोनों तरफ से मुक्त पारगमन होता रहा है। नेपाल के विदेशी निवेश में सबसे बड़ा हिस्सा भारत का है, सैंतालीस फीसद। लाखों नेपाली भारत में रहते हैं और तीन हजार नेपाली छात्रों को भारत छात्रवृत्ति देता है। वर्ष 1950 में हुई मैत्री संधि इस खास रिश्ते का आधार रही है। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की तीन दिन की नेपाल यात्रा से सौहार्दपूर्ण संबंध की इस निरंतरता को बल मिला है। पर इतनी उपलब्धि तो भारत के किसी भी प्रतिनिधि के नेपाल दौरे से होती। सुषमा स्वराज की नेपाल यात्रा इससे अधिक साबित हुई है तो इसके खासकर दो कारण हैं। एक तो यह कि भारत-नेपाल संयुक्त आयोग को पुनर्जीवन मिला और कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की सहमति बनी। दूसरे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन अगस्त को नेपाल जाने वाले हैं।

विदेशमंत्री के दौरे ने इसके लिए उपयुक्त माहौल बनाने की भी भूमिका निभाई। सुषमा स्वराज ने कहा कि नेपाल भारत की विदेश नीति की प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। इस तरह की बात मोदी चीन के संबंध में भी कह चुके हैं। कूटनीति में ऐसे वक्तव्य अक्सर अवसर के तकाजे या औपचारिकता का पुट लिए होते हैं। पर नेपाल को अहमियत दिए जाने की बात इससे भी जाहिर है कि सत्रह साल बाद कुछ ही दिनों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की नेपाल यात्रा होगी। इससे पहले, 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल काठमांडो गए थे। बहरहाल, तेईस साल बाद हुई संयुक्त आयोग की बैठक में सुरक्षा और सरहद से लेकर आपसी व्यापार, निवेश और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। यह तय हुआ कि इन संभावनाओं को मूर्त रूप देने के मकसद से दोनों तरफ के कुछ विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाएगी। यों नेपाल से द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत का क्रम हमेशा चलता रहा है, पर संयुक्त आयोग की बहाली से इस सिलसिले को अधिक व्यवस्थित रूप दिया जा सकेगा। नेपाल के विदेशमंत्री महेंद्र बहादुर


पांडे के साथ बैठक के अलावा सुषमा स्वराज वहां के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत सभी प्रमुख राजनेताओं से भी मिलीं। पुरानी दोस्ती के बावजूद नेपाल से भारत के रिश्ते में एक पेच रहा है। वहां के अनेक राजनीतिकों की शिकायत रही है कि भारत बराबरी का व्यवहार नहीं करता, कई बार अंदरूनी मामलों में दखल भी देता है। 

सुषमा स्वराज की इस यात्रा से पहले भी वहां एक बार फिर यह बहस जोर पकड़ चुकी थी। यों कुछ ऐसे लोग होंगे जिनका निहित स्वार्थ भारत-विरोधी भावनाएं भड़काने में रहता हो, और उन्हें स्थायी रूप से संतुष्ट कर पाना शायद संभव न हो पाए। पर जब बहुत-से दूसरे लोग भी भारत के अनुचित हस्तक्षेप का आरोप लगाते हैं, तो हमारेलिए यह चिंता का विषय होना चाहिए। नेपाल की ऊर्जा परियोजनाओं में भारत की मदद केप्रस्ताव का पत्र लीक हो जाने से मीडिया में इस चर्चा ने इतना तूल पकड़ा कि भारतीय दूतावास को बयान जारी कर सफाई देनी पड़ी। इस तरह का माहौल भारतीय विदेशमंत्री के दौरे के लिए बहुत अनुकूल नहीं कहा जा सकता। पर यह शंकाओं को दूर करने और भरोसा मजबूत करने का मौका भी था। सुषमा स्वराज ने इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर नेपाल के लोगों को मैत्री संधि को लेकर कुछ अंदेशे हैं तो भारत इस संधि पर खुले मन से बात करने के लिए तैयार है। इस तरह का आश्वासन यूपीए सरकार के समय भी दोहराया गया था। लिहाजा, देखना यह है कि स्थायी रूप से शंकाओं का निपटारा कैसे हो।


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